A tired man came home late fromhis whole day hard work,..SON: Dad,may i ask a question?...DAD : Yes?...SON: How much do you make an hour?...DAD: Thats not your business...SON: Please tell me,..DAD: ok,$20 per hour,..SON: Dad may i please borrow$10?...Dad got angry n' shouted on the kid,to go to bed,..the little boy went to the n' shut the door. After a while man got calm & he went to kids room n said,.."sorry for being so hard,heres ur $10 u asked for...kid smiled,..ooh,th ank you!..:) so much daddy!...then boytook out some coins he had kept under the pillow..he counted them n'said,.."i have a $20 now,can a buy an hour of your time?.."please come early 2morow i would like to have dinner with you,..
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A tired man
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क्या ऐसे ही हम 2020 तक महाशक्ति बनेंगे ?
आज अनवरत पर आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी का यह आलेख पढ़ रहा था .मैं द्विवेदी जी के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ क़ि आज-कल मॉस मीडिया में नित्य प्रति कर्मकांड को लेकर तरह- तरह की चर्चा और सुझाव आते रहते हैं जो क़ि पढ़े-लिखे समाज के लिए कोई शुभ संकेत नही है.
आजाद भारत के 64 वर्ष बीत चुके हैं और वैज्ञानिक जागरूकता अभी भी सोचनीय स्थिति में है। प्रति वर्ष देश की प्रगति आख्या के सरकारी शब्द अन्तर्मन को झकझोरते रहते हैं, परन्तु अन्धविश्वास एवं अज्ञानता के कई एक उदाहरण पूरी दुनिया के समक्ष हमारी प्रगति को अंगूठा दिखाते चलते हैं। मीडिया भी इसे खूब महत्व देती है?, मानो तर्क का यही आखिरी पड़ाव हो। यह इस महान देश के लिए भी कितनी असहज करने वाली बात है कि हम 2020 तक महाशक्ति बनने का दावा कर रहे हैं,समूची दुनिया को हम अंतरिक्ष विज्ञान ,अर्थव्यवस्था में चुनौती देने की स्थिति में हैं, वहीं अभी पिछले कुछ वर्ष पूर्व ही मुम्बई शहर के माहिम से बड़ोदरा के तीपल तट तक और बरेली से लेकर समूचे उत्तर भारत में लोगों का भारी हुजूम कहीं समुद्र के जल को मीठा होना चमत्कार मान रहा था या फिर हमारे देवी-देवता पुनः अपने भक्तों और श्रद्धालुओं के हाथों दुग्धपान कर रहे थे। इन घटनाओं को प्रबुद्ध समाज में न तों अनदेखी की जा सकती है और न ही यह उपहास का कारण है। यह गम्भीर चिन्तन एवं मनन का विषय है कि आज मीडिया के क्षेत्र में भी ऐसे जागरूक लोगों की जरूरत है,जो कि नीर-क्षीर का विवेचन कर समाचारों को सार गर्भित रूप में प्रस्तुत कर सकें । आज मनोरंजन के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है वह सब कुछ ठीक है? यह अपने आप में एक सवाल है। इस महान देश पर आज सांस्कृतिक हमले का बिगुल बज चुका है और क्योंकि हम अभी तक सबको साक्षर नहीं बना पाये हैं, इसलिए यह सब जानकर भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में हमारा सब कुछ दांव पर लगा है . अतः आम जन तक वैज्ञानिक जागरूकता के प्रसार के लिए यह आवश्यक है कि जन माध्यमों (मास मीडिया) के माध्यम से वैज्ञानिक संदेश जन-जन तक पहुंचाया जाये ,न की अवैज्ञानिक अवधारणा को मूल विज्ञान नीति 1958 में भारत के पहले प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने आम आदमी तक वैज्ञानिक मनोवृत्ति के प्रसार की पुरजोर वकालत की थी, किन्तु आज भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया हैं। वर्तमान समय में जनमाध्यम (इलेक्ट्रानिक एवं प्रिण्ट मीडिया) वैज्ञानिक जागरूकता के नजरिये से अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। दशकों पूर्व जन माध्यमों में लुप्त हो चुकी अवैज्ञानिक खबरें आज मीडिया की सुर्खियों में हैं। भूत-प्रेत,शकुन-अपशकुन,व्याह शादी में कुण्डली मिलान,रोग-व्याधियों का देवी-देवताओं से सम्बन्ध,ग्रह-नक्षत्रों के दुष्प्रभाव,तान्त्रिकों का महाजाल एवं अन्याय पुरातन अवैज्ञानिक धारणायें आज इन जन माध्यमों के जरिए अपनी पुनर्वापसी कर रही हैं.
आज इलेक्ट्रानिक मीडिया में देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठत चैनलों पर जो कि सबसे तेज होने का दावा कर रहे हैं,वे नाग-नागिन,भूत-प्रेत,डाक बंगलों का रहस्य,सूर्य-चन्द्रग्रहण को अनिष्टकारी बताते हुए या तमाम ऐसी अवैज्ञानिक खबरों को 24 घण्टे प्रसारित करते हैं जिनका कि सच से दूर तक वास्ता नहीं होता। परन्तु इन चैनलों के संवाददाता अपने सीधे प्रसारण में इस विश्वास के साथ बात करते हैं कि कैसे नाग के हत्यारे की फोटो नागिन की आँखों में चस्पा होती है,कैसे सूर्य-चन्द्रग्रहण अमुक राशि वाले व्यक्तिओं के लिए घातक होगा या फिर कैसे डायन भेष बदलकर गांवों में आ रही है एवं उससे बचने का क्या उपाय है? आदि-आदि। निश्चित रूप से विज्ञान विधि से अप्रशिक्षित ये संवाददाता इस तरह से जाने-अनजाने इस देश को अंधे युग की ओर ले जा रहे हैं। मीडिया में हाल के महीनों से अवैज्ञानिक खबरों को प्रदर्शित करने की जैसे होड़ लगी थी । वह भी ऐसी खबरें जिनका कि कोई वैज्ञानिक सच नहीं है। जैसे-’चीते की खाल बरामद-चार बन्दी’, (बताते चलें कि भारत के जंगलों में चीते के विलुप्त हुए कई दशक बीत चले हैं), ’अनिष्टकारी होगा सूर्यग्रहण’, ’पवित्र मरियम की मूर्ति से सुगंधित इत्र का स्राव’, ’माहिम (मुंबई) में चमत्कार से मीठा हुआ समुद्र का पानी’, ’राची में हनुमान की मूर्ति ने आँखें तरेंरीं’, ’गणेश जी ने पुनः शुरू किया दुग्ध पान’, ’घरों पर जो ओ३म् नहीं लिखेगा-डायन मार डालेगी’,’तंत्र-मंत्रों से इलाज कराइए’ एवं ’इच्छाधारी नागिन’ ने पांच बार डसा’आदि आदि।ऐसी खबरें समाज को किस ओर ले जा रही हैं, यह गम्भीर चिंतन का विषय है। कब तक हम ऐसे कृत्यों से अपने आपको एवं पूरे समाज को महिमा मंडित करने का दावा कर पूरे राष्ट्र को कलंकित करते रहेगें? 21 सितम्बर 1995 को देव प्रतिमाओं ने अपने भक्तजनों के हाथों दुग्धपान किया , पूरे देश की तत्कालीन मीडिया ने उसे खूब प्रचारित किया। कन्याकुमारी से काश्मीर तक केवल यही खबर तैर रही थी। देश में हाई एलर्ट की स्थिति थी,तब राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग,भारत सरकार, के वैज्ञानिक दल ने जिसमें डॉ मनोज पटैरिया भी शामिल थे, इस चमत्कार के सच को जनता के सामने रखा था। वैज्ञानिक दल का मानना था कि वास्तव में प्रत्येक द्रव का अपना पृष्ठ तनाव होता है,जो कि द्रव के भीतर अणुओं के आपसी आकर्षण बल पर निर्भर करता है और इसका आकर्षण बल उस ओर भी होता है, जिस पदार्थ के सम्पर्क में आता है। देव प्रतिमाओं के दूध पीने में भी ऐसा ही हुआ है। जैसे ही दूध संगमरमर पर सीमेंट या अन्य चीजों से बनी मूर्तियों के सम्पर्क में आया वह तुरन्त मूर्तियों के सतह पर विसरित हो गया,जिससे श्रद्धालुओं को लगता है कि चम्मच से मूर्ति ने दूध खींच लिया है जबकि हकीकत में दूध की पतली सी धार नीचे से निकलती रहती है जो कि लोग विश्वास के कारण देख नहीं पाते। जब दूध में रंग,रोली मिलाकर देखा जाय तो रंगीन धार स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। इस में कोई वास्तविकता नहीं है यह वैज्ञानिक नियमों के अन्तर्गत सामान्य प्रक्रिया है जिसे अज्ञानता के चलते लोग चमत्कार का नाम दे रहे हैं।इसमें सबसे दःखद पहलू यह है कि इस बात को हम अभी भी भारतीय जनता तक नहीं पहुंचा पाये हैं। आश्चर्य है कि अभी भी हमारी भोली-भाली जनता अज्ञानता के मोहपाश में जकड़ी है। वह अपनी कुंभकर्णी निद्रा का त्याग ही नहीं कर पा रही है या फिर हम वास्तव में अपने वैज्ञानिक संदेशों एवं उपलब्धियों को उन तक पहुंचा नहीं पा रहे हैं।
इसके साथ ही एक और चमत्कार ने तो कुछ वर्ष पूर्व देश को और भी शर्मसार किया था। पेयजल का मुद्दा जन स्वास्थ से जुड़ा है। मुम्बई म्युनिसपल कारपोरेशन एवं अन्य सरकारी संगठनों द्वारा की गयी घोषणा के बाद कि माहिम के तट पर तथाकथित मीठा जल स्वास्थ के लिए हानिकारक है एवं उसे पीने से तबियत खराब हो सकती है,लेकिन लोग थे कि मानते ही नहीं थे, पिये ही जा रहे थे। निश्चित रूप से यह चमत्कार नहीं है
वैज्ञानिकों ने इसकी पुष्टि कर दी कि यह बारिश का पानी हैं। संचार माध्यमों ने इसको अपनें तरीके से खूब प्रसारित भी किया . ऐसी अज्ञानता से देश अँधेरे में ही जायेगा. सवाल यह है कि हम दुनिया में अगली पंक्ति के नायक इसी अज्ञानता के बदौलत होगें। हमारी शिक्षा प्रणाली या फिर नेतृत्व देने वाले लोग , कौन इसका जवाब दे। महामहिम पूर्व राष्ट्रपति जी के 2020 तक महाशक्ति बनने के ख्वाब को हम क्या ऐसे ही पूरा करेंगे? जब तक विशाल आबादी वाले इस महान देश के जन-जन में वैज्ञानिक चेतना का समावेश नहीं होगा तब तक महाशक्ति बनने का दावा करना कितना बेमानी लगता है और जब हम 64 वर्ष बीतने के बाद भी तथाकथित जागरूकता और प्रगति की आकडे़बाजी में फॅसे है,भौतिक धरातल पर जागरूकता की यह हालत है तो कैसे भविष्य में त्वरित सुधार की उम्मीद कर सकते हैं। आजादी के वर्षो को गिनने से तो रिटायर होने का समय आता दिखता है,ज्ञान सीखने का नहीं। भविष्य की आहट बहुत भयावह है। यदि हमें दुनिया के देशों की कतार में आगे बैठना है तो ज्ञान की शक्ति चाहिए,वैज्ञानिक जागरूकता चाहिए न कि अन्ध विश्वास ।दुष्यंत कुमार जी की ये पंक्तिया सम्भवतःसटीक हैं कि-
कहाँ तो तय था चिरांगा हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।।
समाप्त.
आखिर इन मर्दों को शर्म क्यों नहीं आती?
किसी भी समाज मैं यदि आप यह चाहते हैं की असंतुलन ना पैदा हो तो हमेशा काम इन्साफ से लेना चाहिए. आज महिलाओं को ऐसा लगता है की यह पुरुष प्रधान समाज है और हमेशा महिलाओं की आज़ादी छीनने की कोशिश की जाती है. मेरा ख्याल है कि यह पूरा सच नहीं इसलिए कुछ सवालों को यहाँ सामने रख के इस लेख द्वारा सच समझने कि कोशिश कर रहा हूँ. आशा है आप सब भी अपने विचार सामने रखेंगे.
मैं इस बात से सहमत हूँ कि इस समाज मैं महिलाओं के साथ बहुत जगहों पे ज्यादती होती है, ज़ुल्म भी होता है और औरत मजबूरी की हालत मैं सब कुछ चुपचाप सहन करती है.इसका एक बड़ा कारण इस समाज मैं महिला को आत्मनिर्भर होने ना देना है. माता पिता दोनों अधिकतर घरों मैं लड़के को तो बहुत पढ़ते हैं लेकिन लड़कियों को जल्द ही किसी घर भेजने कि फ़िराक मैं लग जाते हैं. उसकी शिक्षा पे बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता.
एक बच्चा जब इस दुनिया मैं आता है तो सबसे पहले बड़ा होने पे देखता है की उसके पिता जी तो अपने घर मैं रहते हैं और माता जी अपना घर छोड के पिता जी के घर आ गयीं. वो यह भी देखता है की अमीर हो या ग़रीब बेटियां शादी के बाद घर छोड़ देती हैं. सवाल यह उठता है की बेटा क्यों नहीं शादी के बाद अपना घर छोड के अपने ससुराल जा बसता? क्यों बेटी को शादी बाद माता पिता अपना घर रहने को नहीं देते? क्यों शादी के बाद पत्नी को अपने पति का ही सर नेम लगाना होता है.
शादी ले लिए लड़की चाहिए लेकिन सभी माओं और उनके बेटों कि शर्त होती है कि लड़की कुंवारी होना चाहिए. फिर तलाक शुदा या बेवा से शादी कौन करेगा? मर्द शायद आज तक यह नहीं समझ पाया कि स्त्री की सुन्दरता उसके शरीर मैं नहीं किरदार मैं हुआ करती है. किसी की बीवी मर जाए तो भी रिश्तों की लाइन यही औरतें शादी के लिए लगा लेती हैं लेकिन किसी विधवा कि शादी आसानी से नहीं हुआ करती. क्यों?
इसी प्रकार बेटा यदि कमाऊ हो तो माँ बाप के बुढ़ापे का सहारा बनता है लेकिन बेटी यदि कमाऊ भी है तो भी शादी के बाद उसकी कमाई पे उसको पढ़ने लिखाने वाले माँ बाप का अधिकार नहीं रह जाता? क्यों?
इन सबका कारण समाज का पुरुष प्रधान होना हो सकता है लेकिन जब बात औरत पे ज़ुल्म कि आती है तो यह भी सवाल उठता है कि क्या बहु पे ज़ुल्म करने वाली सास औरत नहीं होती या गर्भ मैं बेटी है इसका पता लगने पे भ्रूण हत्या के लिए उकसाने वाली सास औरत नहीं होती? क्या अपने बेटों के लिए केवल कुंवारी लड़की तलाशने वाली माँ औरत नहीं होती? कारण औरतों पे ज़ुल्म का कुछ भी हो लेकिन इसका हल निकालना आवश्यक है और जहाँ तक मैं समझता हूँ इसका हल बेटे और बेटी दोनों को एक जैसी शिक्षा देना और एक जैसा आत्मनिर्भर बनाने कि कोशिश करना है.
आश्चर्य की तो बात यह है की इस मुद्दे पे महिलाएं भी चुप या कम बोलती नज़र आती हैं, ना आज़ादी का मुद्दा उठता है और ना बराबरी की बात हुआ करती है? ऐसे बहुत से उदाहरण हैं और सभी का ज़िक्र यहाँ संभव नहीं. क्यूँ? सारी आज़ादी कुछ महिलाओं को कम वस्त्रों मैं घूमने और घर के बाहर केवल टाइम पास या ऐश ओ आराम के लिए नौकरी करने में ही नज़र आती है?
क्या अपनी ओलाद की अच्छी परवरिश करना, उसको दूध पिलाना, घर को संभालना और जब तक ज़रुरत ना हो नौकरी के बदले घर की जिम्मेदारियों को उठाना क्या ग़ुलामी कहलाती है? यह भी एक बड़ा सवाल है?
कुदरत ने मर्द और औरत को शारीरिक रूप से अलग अलग बनाया है. और उसी प्रकार समाज मैं संतुलित तरीके से रहने के लिए उनकी जिम्मेदारियां भी अलग अलग तै की गयी हैं. एक औरत यदि बच्चे को जन्म देती है तो दूध भी उसी मां को पिलाना होता है यह फैसला तो कुदरत का किया हुआ है . अब यदि यह फैसला समाज करता है की औरत बच्चों की परवरिश करे और पुरुष धन कमा के लाए तो इसमें बुराई तो मुझे नहीं दिखती. हाँ यदि किसी कारण वश औरत को नौकरी करने या व्यापार करने के लिए जाना पड़े तो इसमें भी कोई बुराई नहीं. लेकिन बच्चों को किसी और के सहारे छोड़ना , बच्चे को दूध भी ना पिलाना केवल इस लिए की बाहर नौकरी करना है आज़ादी के नाम पे कहाँ तक सही है.पुरुष और स्त्री को जैसा कुदरत ने उनका शरीर बनाया है उसके अनुसार अपना अपना फ़र्ज़ निभाते हुए एक दूसरे का साथ देते हुए जीवन गुज़ारना चाहिए.
अब दूसरा सवाल है की औरत और मर्द को कैसे कपडे पहनना चाहिए? समाज मैं जब कोई मर्द या औरत एक दूसरे से सोशल कोन्टक्ट बनाये तो इसका आधार किरदार की सुन्दरता को बनाना चाहिए ना कि शरीर कि सुन्दरता को. हम इस समाज मैं लोगों पे अपनी छाप छोड़ने के लिए अधिकतर अपने शरीर कि खूबसूरती को पेश करने कि कोशिश किया करते हैं और जाने अनजाने मैं मुसीबतों मैं घिर जाते हैं. क्यों आज एक औरत भी खुद को शरीर की सुन्दरता से तराजू मैं तौलती है? क्यों वो यह नहीं कहती की मेरा जिस्म नहीं मेरा किरदार देखो?
स्वच्छ शरीर,साफ़ कपडे और अच्छा किरदार किसी भी व्यक्ति की अच्छी पहचान बनाने के लिए काफी होता है. यदि औरत या मर्द एक दूसरे को अपनी तरफ आकर्षित करना चाहते हैं तो शरीर की सुन्दरता का सहारा लिया जाना चाहिए और फिर एक दूसरे के शरीर कि ज़रूरतों को पूरा भी करना चाहिए. यह सही नहीं कि आप शरीर दिखा के आकर्षित तो करें सभी को और पास आने पे बुरा भला कहें. मोर भी तभी नाचता है जब मोरनी को अपनी तरफ आकर्षित करना होता है.
पुरुष का जिस्म औरत को और औरत का जिस्म मर्द को आकर्षित करता है यह कुदरत का निजाम है.कुदरत के निजाम के खिलाफ जाके अपनी जिस्म कि नुमाएश करना और जाने अनजाने मैं एक दूसरे को अपनी और बेवजह आकर्षित करना औरत और मर्द दोनों के लिए सही नहीं है.
हमारे समाज कि सबसे अजीब बात तो यह है कि हम कहते यही हैं कि शारीरिक सम्बन्ध केवल शादी के बाद बनाया जाता है लेकिन १२-१४ साल कि उमर से ही अपनी शारीरिक सुन्दरता एक दूसरे को दिखा के जाने या अनजाने मैं आकर्षित किया करते हैं और नतीजे मैं २५-३०% युवा शादी के पहले ही शारीरिक सम्बन्ध बना चुके होते हैं और ४० से ५०% शारीरिक घनिष्ठता काएम कर चुके होते हैं.
यह आवश्यक नहीं कि केवल जिस्म कि खूबसूरती का दिखाना बलात्कार,कौटुम्बिक व्यभिचार,समलैंगिक रिश्ते इत्यादि का एक अकेला कारण है लेकिन इसका प्रतिशत सभी कारणों मैं सब से अधिक है.
जब भी जंग हुई है लूट के नाम पे या तो धन दौलत का नाम आया है या फिर औरत का नाम लिया गया. धन कि बात तो समझ मैं आयी लेकिन यह औरत को लूट का सामान किसने बना दिया? आज भी यही होता आ रहा है कि यदि कहीं डाका पड़े, चोरी हो या दुश्मनी निकाली जाए तो ख़बरों मैं धन का लूटा जाना और बलात्कार ही सुनने मैं आता है. शायद इसी कारण से हर इंसान अपने धन दौलत और अपने घर कि औरतों को बुरी नज़रों से बचा के रखने कि कोशिश करता है.
पुरुष का स्त्री के प्रति यह लगाव शायद इस कारण से भी हो सकता है कि यह भी सत्य है कि मर्द फितरती तौर पे polygamous होता है और औरत Monogamous. कारण कुछ भी हो लेकिन औरत कि मर्ज़ी के खिलाफ उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने कि कोशिश करना निंदनीय है और एक बड़ा जुर्म है. मर्द और औरत दोनों अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक दूसरे कि मर्जी के साथ भी रस्ते निकाल सकते हैं.
शर्म कि बात है इस समाज के लिए कि जो औरत माँ ,बहन और बेटी के रूप मैं इज्ज़त पाती है उसी को लूट का सामान बना लिया है. अकेले और मजबूर देखा नहीं कि कभी प्यार के फरेब से कभी ज़ोर ज़बरदस्ती से और कभी लूट के उसको बेईज्ज़त किया.
यदि पुरुष यह चाहता है कि इस समाज मैं उसकी माँ बहन और बेटियां सुरछित रहें तो उसे अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना होगा और पर नारी पे बुरी नज़र डालने से भी खुद को रोकना होगा. पुरुषों को भी अपने शरीर की नुमाईश कि आज़ादी नहीं इसलिए ऐसे कपड़ों को पहनने से बचें जिस से पर नारी आकर्षित हो सकती हो.
महिलाओं को भी यह ख्याल रखना होगा कि औरत कोई नुमाइश कि चीज़ नहीं ,इसलिए अपनी बेटियों को जिस्म कि अनावश्यक नुमाइश से खुद को रोकें और अपने बहुओं को बेटी समझें ,भ्रूण हत्या जैसे पाप मैं भागीदारी ना करें. आज़ादी नाम है समाज मैं इज्ज़त से जीने का ना कि अर्धनग्न घूमने का . यह मेरा शरीर है मैं जैसा चाहूँ वैसा रखूँ ,जो चाहूँ वो पहनू ,ना मर्द के लिए सही है और ना औरत के लिए, क्यों कि हम जंगलों मैं रहने वाले कम अक्ल जानवर नहीं समाज मैं रहने वाले अक्ल मंद इंसान हैं.
मैंने अपने ब्लॉग बेज़बान पे एक पोल किया और नतीजा बेहतरीन आया. यह जान के ख़ुशी हुई कि 80% महिलाएं और पुरुष आज भी इस समाज मैं जानते है कि औरत कि इज्ज़त किस मैं है.
अपनी तारीफ सुनना सभी को अच्छा लगता है.
अक्सर देखने मैं यही आता है की इस समाज मैं इमानदार, अच्छे किरदार वाले या गरीब और कमज़ोर की तारीफ करने वाले कम ही मिला करते हैं और ताक़तवर ,पैसे वालों की, जालिमों की झूटी तारीफ डर से या जाती फाएदे के लिए करने वाले बहुत मिला करते हैं. हमारा यह मिजाज़ ही समाज मैं एक असंतुलन पैदा करता है. ऐसा बुरा इंसान जिसकी झूटी तारीफ की जा रही हो अक्सर खुद को अपनी नज़र मैं अच्छा समझने लगता है जिस से उसके कभी सुधरने की आशा भी ख़त्म हो जाया करती है.
यही कारण है की आज हमारे समाज मैं अधिकतर गरीब या इमानदार कमज़ोर हो के गुमनामी की ज़िंदगी बसर करने पे मजबूर है और ज़ालिम, पैसेवाला, समाज को चला रहा है और नायक बन बैठा है.
हम भ्रष्टाचार की बातें बहुत करते हैं उसके खिलाफ आवाज़ भी उठाते है लेकिन यह भूल जाते हैं यह समाज हमने स्वम ही बनाया है और यदि हम अपनी ग़लती सुधार लें तो यह भ्रष्टाचार खुद ब खुद कम हो जाएगा.
इसलिए ध्यान रहे ब्लॉगजगत हो , आप का समाज हो , या किसी को नेता का चुनाव ,कभी ताक़तवर, ज़ालिम, काला धन कमाने वाले या ग़लत तरीके से शोहरत हासिल करने वाले की ना तो झूटी तारीफ करें और ना ही उसका साथ दें .उसको अवश्य सराहें जिसका किरदार अच्छा हो, इमानदार हो, तभी आप इस समाज मैं अमन और शांति काएम करने मैं अपना सहयोग दे सकेंगे.
यहाँ कौन किसका साथ दे रहा है और क्यों ?
मेरे पिछले लेख़ में किसी ने टिप्पणी में कहा था कि जायज़ या ना जायज़ कुछ नहीं होता और उनकी इस टिप्पणी पे मुझे इस लेख़ कि प्रेरणा मिली. हम जिस समाज में रहते हैं वहां हर रोज़ कुछ ना कुछ घटता रहता है. इंसान एक सामाजिक प्राणी है और एक दूसरे से मिल जुल कर रहता है. ऐसे में कभी किसी का समर्थन करना कभी किसी के खिलाफ बोलना , कभी किसी पे पीछे चलना जैसी बातें देखी जाती रही हैं.
guidence ऐसा बहुत बार होता है कि किसी मुद्दे पे एक समूह तो समर्थन कर रहा होता है लेकिन दूसरा उसके खिलाफ बोल रहा होता है. धर्म कि बात करें तो दिखाई देता है कि महाभारत हुई और कुछ ने कौरवों का साथ दिया कुछ ने पांडवों का. कर्बला कि जंग हुई तो किसी ने इमाम हुसैन (अ.स) का साथ दिया और किसी ने ज़ालिम यजीद का. जब किसी धर्म को अपनाने कि बात आयी तो कोई हिन्दू बन गया कोई मुसलमान, कोई ईसाई तो कोई नास्तिक. आज के समय कि राजनीती कि बात करें तो कोई कांग्रेसी बना बिठा है, कोई बीजेपी वाला कोई सभी के पीछे चलने से इनकार कर रहा है.
ऐसा इस कारण से होता है कि देखने में तो हम इंसान एक जैसे ही दिखते हैं लेकिन हमारा ज्ञान, हमारी अज्ञानता, हमारी तरबियत ,हमारी अंतरात्मा की बुराईयाँ जैसे काम , क्रोध , लोभ , मोह , इर्ष्या , द्वेष और अहंकार हमारी सोंच को एक दूसरे से अलग कर देता है.
अधिकतर इंसान अपने अपनी जान पहचान का इस्तेमाल करते हुए उस व्यक्ति कि बातों से सहमती जताते नज़र आते हैं जो या तो उन जैसा होता है या फिर उनके लिए फायदेमंद होता है. यह वो लोग हैं जिनकी अंतरात्मा इन्हें बताती है की वो ग़लत व्यक्ति का साथ दे रहे हैं लेकिन चूंकि इनका फायदा उसी में में यह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को नहीं सुनते. अक्सर कुछ लोग उसके खिलाफ भी बोलते दिखाई देते हैं जो हमारे दोस्त का दुश्मन होता है जो की अच्छी बात है लेकिन यह जानना भी आवश्यक हुआ करता है की क्या हमारा दोस्त हक़ पे है?
ऐसे लोगों के लिए सत्य क्या है? समाज के हक़ में क्या है? इत्यादि बातें कोई मायने नहीं रखती. इन्हें तो अपना फायदा ही सबसे अहम् लगता है. ऐसे लोग आज के युग में अधिक मिला करते हैं और यही लोग भ्रष्टाचारियों, दुराचारियों, और जालिमों की ताक़त हुआ करते हैं.
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो समाज, देश और दूसरे इंसानों के लिए क्या सही है क्या ग़लत क्या है यह देख के फैसला करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अज्ञानता वश सही , ग़लत का फर्क ना कर पाने के कारण अक्सर ग़लत का साथ दे जाते हैं क्यों कि बुरा इंसान ही अक्सर शरीफ का चेहरा लगा के समाज में लोगों के बीच अपनी अच्छाई और बडाई करता देखा जाता है. ज्ञानी इनको इनके कर्म से पहचान लेता है और अज्ञानी इनकी बातों पे विश्वास कर के इनका साथ दे जाता है. यह समाज का वो हिस्सा हैं जिसे भीड़ कहा जा सकता है. इसी भीड़ का साथ लेने के लिए, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, ज़ालिम अपने चेहरे पे समाजसेवी का मुखोटा लगा ने की कोशिश किया करते हैं. इसीलिये कहा गया है कि अज्ञानता से बड़ा हमारा कोई दुश्मन नहीं.
जो लोग दूसरों के भले को देख के फैसला करते हैं वो लोग ही सही मायने में इंसान होते हैं और कामयाब भी होते हैं. ऐसा इंसान यदि किसी धर्म से जुड़ा है तो सही मायने में धार्मिक भी कहलाता है. यहाँ यह भी बताता चलूँ कि ज्ञान का मतलब डिग्रीयां जमा करना नहीं होता और कामयाबी का मतलब अपने पीछे भीड़ का जमा कर लेना नहीं हुआ करता. जिसके ज्ञान से ,तजुर्बे से अधिक से अधिक लोगों का फायदा हो वही ज्ञानी कहलाता है और वही सही मायने में कामयाब भी होता है लेकिन यह काम सही मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं.
हमारे जीवन में यह मार्गदर्शन कभी हमारी माँ करती है, कभी गुरु करता है, कभी धार्मिक किताबों में लेखे उपदेश या हमारा धार्मिक गुरु करता है. यही कारण है कि अपने बच्चे के लिए ऐसी माँ का लाने कि फ़िक्र करो जो आप कि ओलाद के लिए सही मार्गदर्शक साबित हो, ऐसे गुरु के पास भेजो जो उसका सही मार्गदर्शन करे और धार्मिक उपदेशों कि अहमियत भी बताता रहे.
महात्मा गांधी कहते हैं कि हमारा शरीर ही कुरुक्षेत्र है. क्या सही है क्या ग़लत है? क्या करें क्या ना करें? किसका साथ दें ,किसका ना दें? अपना फायदा देखें या परोपकार को अहमियत दें? इत्यादि .हमारे मन में हर समय इन सभी विचारों का युद्ध होता रहता है. हमारा ज्ञान हमारा अपनी अंतरात्मा की बुरायीओं के बच सकने कि ताक़त ,हमारा निस्वार्थ कर्म और हमारे सच्चे मित्र और मार्गदर्शक हमें सत्य क्या है? कब किसका साथ देना है इस बात को समझाने में सहायक होते हैं.
अर्जुन को मित्र के रूप में कृष्ण जैसा मार्गदर्शक मिला. आप चाहें तो आप भी आज भगवद गीता से मित्रता करके कृष्ण जैसा मित्र पा सकते हैं. आप कुरान जैसी हिदायत की किताब को पढ़ के अल्लाह से मित्रता कर सकते हैं. बस एक बार आप एकांत में बैठकर कामना, स्वार्थ से परे चिंतन करके तो देखें.
जिस दिन हम ऐसा कर सके यकीन जानिए इस समाज से भ्रष्टाचार, दुराचार खुद ही ख़त्म हो जाएगा क्यों की इनका साथ देते वाला कोई नहीं बचेगा.
guidence ऐसा बहुत बार होता है कि किसी मुद्दे पे एक समूह तो समर्थन कर रहा होता है लेकिन दूसरा उसके खिलाफ बोल रहा होता है. धर्म कि बात करें तो दिखाई देता है कि महाभारत हुई और कुछ ने कौरवों का साथ दिया कुछ ने पांडवों का. कर्बला कि जंग हुई तो किसी ने इमाम हुसैन (अ.स) का साथ दिया और किसी ने ज़ालिम यजीद का. जब किसी धर्म को अपनाने कि बात आयी तो कोई हिन्दू बन गया कोई मुसलमान, कोई ईसाई तो कोई नास्तिक. आज के समय कि राजनीती कि बात करें तो कोई कांग्रेसी बना बिठा है, कोई बीजेपी वाला कोई सभी के पीछे चलने से इनकार कर रहा है.
ऐसा इस कारण से होता है कि देखने में तो हम इंसान एक जैसे ही दिखते हैं लेकिन हमारा ज्ञान, हमारी अज्ञानता, हमारी तरबियत ,हमारी अंतरात्मा की बुराईयाँ जैसे काम , क्रोध , लोभ , मोह , इर्ष्या , द्वेष और अहंकार हमारी सोंच को एक दूसरे से अलग कर देता है.
अधिकतर इंसान अपने अपनी जान पहचान का इस्तेमाल करते हुए उस व्यक्ति कि बातों से सहमती जताते नज़र आते हैं जो या तो उन जैसा होता है या फिर उनके लिए फायदेमंद होता है. यह वो लोग हैं जिनकी अंतरात्मा इन्हें बताती है की वो ग़लत व्यक्ति का साथ दे रहे हैं लेकिन चूंकि इनका फायदा उसी में में यह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को नहीं सुनते. अक्सर कुछ लोग उसके खिलाफ भी बोलते दिखाई देते हैं जो हमारे दोस्त का दुश्मन होता है जो की अच्छी बात है लेकिन यह जानना भी आवश्यक हुआ करता है की क्या हमारा दोस्त हक़ पे है?
ऐसे लोगों के लिए सत्य क्या है? समाज के हक़ में क्या है? इत्यादि बातें कोई मायने नहीं रखती. इन्हें तो अपना फायदा ही सबसे अहम् लगता है. ऐसे लोग आज के युग में अधिक मिला करते हैं और यही लोग भ्रष्टाचारियों, दुराचारियों, और जालिमों की ताक़त हुआ करते हैं.
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो समाज, देश और दूसरे इंसानों के लिए क्या सही है क्या ग़लत क्या है यह देख के फैसला करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अज्ञानता वश सही , ग़लत का फर्क ना कर पाने के कारण अक्सर ग़लत का साथ दे जाते हैं क्यों कि बुरा इंसान ही अक्सर शरीफ का चेहरा लगा के समाज में लोगों के बीच अपनी अच्छाई और बडाई करता देखा जाता है. ज्ञानी इनको इनके कर्म से पहचान लेता है और अज्ञानी इनकी बातों पे विश्वास कर के इनका साथ दे जाता है. यह समाज का वो हिस्सा हैं जिसे भीड़ कहा जा सकता है. इसी भीड़ का साथ लेने के लिए, भ्रष्टाचारी, दुराचारी, ज़ालिम अपने चेहरे पे समाजसेवी का मुखोटा लगा ने की कोशिश किया करते हैं. इसीलिये कहा गया है कि अज्ञानता से बड़ा हमारा कोई दुश्मन नहीं.
जो लोग दूसरों के भले को देख के फैसला करते हैं वो लोग ही सही मायने में इंसान होते हैं और कामयाब भी होते हैं. ऐसा इंसान यदि किसी धर्म से जुड़ा है तो सही मायने में धार्मिक भी कहलाता है. यहाँ यह भी बताता चलूँ कि ज्ञान का मतलब डिग्रीयां जमा करना नहीं होता और कामयाबी का मतलब अपने पीछे भीड़ का जमा कर लेना नहीं हुआ करता. जिसके ज्ञान से ,तजुर्बे से अधिक से अधिक लोगों का फायदा हो वही ज्ञानी कहलाता है और वही सही मायने में कामयाब भी होता है लेकिन यह काम सही मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं.
हमारे जीवन में यह मार्गदर्शन कभी हमारी माँ करती है, कभी गुरु करता है, कभी धार्मिक किताबों में लेखे उपदेश या हमारा धार्मिक गुरु करता है. यही कारण है कि अपने बच्चे के लिए ऐसी माँ का लाने कि फ़िक्र करो जो आप कि ओलाद के लिए सही मार्गदर्शक साबित हो, ऐसे गुरु के पास भेजो जो उसका सही मार्गदर्शन करे और धार्मिक उपदेशों कि अहमियत भी बताता रहे.
महात्मा गांधी कहते हैं कि हमारा शरीर ही कुरुक्षेत्र है. क्या सही है क्या ग़लत है? क्या करें क्या ना करें? किसका साथ दें ,किसका ना दें? अपना फायदा देखें या परोपकार को अहमियत दें? इत्यादि .हमारे मन में हर समय इन सभी विचारों का युद्ध होता रहता है. हमारा ज्ञान हमारा अपनी अंतरात्मा की बुरायीओं के बच सकने कि ताक़त ,हमारा निस्वार्थ कर्म और हमारे सच्चे मित्र और मार्गदर्शक हमें सत्य क्या है? कब किसका साथ देना है इस बात को समझाने में सहायक होते हैं.
अर्जुन को मित्र के रूप में कृष्ण जैसा मार्गदर्शक मिला. आप चाहें तो आप भी आज भगवद गीता से मित्रता करके कृष्ण जैसा मित्र पा सकते हैं. आप कुरान जैसी हिदायत की किताब को पढ़ के अल्लाह से मित्रता कर सकते हैं. बस एक बार आप एकांत में बैठकर कामना, स्वार्थ से परे चिंतन करके तो देखें.
जिस दिन हम ऐसा कर सके यकीन जानिए इस समाज से भ्रष्टाचार, दुराचार खुद ही ख़त्म हो जाएगा क्यों की इनका साथ देते वाला कोई नहीं बचेगा.
अपने जायज़ रिश्तों के प्रति वफादार रहिये
हमारी संस्कृति में एक नारी को माँ, बहन, पत्नी, पुत्री और पुरूष को पिता,भाई,पति.और पुत्र के रूप मैं देखा जाता है और जायज़ रिश्तो के इस रूप को इज्ज़त भी मिला करती है. नारी पे यदि कोई सबसे बड़ा ज़ुल्म इस पुरुष प्रधान समाज ने किया है तो वो है उसे भोग कि वस्तु बना के इस्तेमाल करना. वैश्यावृति इसका एक बेहतरीन उदाहरण है. औरत के कमज़ोर पड़ते ही मर्द द्वारा स्त्री के शरीर का इस्तेमाल करने जैसी बातें आम होती जा रही हैं.
जब ज़बरदस्ती किसी मर्द ने किसी महिला के शरीर को इस्तेमाल करना चाहा तो यह बलात्कार कहलाया. जब स्त्री ने अपने फायदे के लिए, पैसे के लिए मर्द को शरीर सौंप दिया तो सौदा कहलाया और शरीर का सौदा करने वाली महिला वैश्या कहलाई. इस तरह का सौदा मर्ज़ी और मजबूरो दोनों हालत मैं होना संभव है.
मायानगरी मुंबई मैं एक इलाका है कमाठीपुरा जो एशिया के सबसे बड़े वेश्यावृति केन्द्र के रूप में जाना जाता है. .इस इलाके की तंग गलियों से गुजरते हुए आपको हर समय उत्तेजक वस्त्रों मैं मर्दों को रिझाती , बुलाती लड़कियां दिखाई दे जाएंगी. सुना गया है कि यहाँ नाबालिग लड़कियों से ले कर अधेड़ उम्र तक कि वेश्याएं मिल जाती हैं जिनको यहाँ लाकर ट्रेनिंग दी गयी होती है कि पुरुषों को कैसे रिझाओ और यह काम वो मैडम करती हैं जो इनकी पूरी कमाई इनसे ले कर इनपे ज़ुल्म करती हैं और बदले मैं इनका पेट भरती हैं. यह इलाका इतना मशहूर है कि जब जब अमरीका का कोई राष्ट्रपति मुंबई आया तो उसने इस इलाके को देखने कि ख्वाहिश अवश्य कि जो सुरक्षा कारणों से कभी पूरी ना हो सकी.
यहाँ आयी वेश्याओं का दर्द उस समय सामने आता है जब वैश्यावृत्ति समुदाय से जुड़े परिवारों के कल्याण,पुनर्वास व उत्थान हेतु क़दम उठाई जाते हैं लेकिन उस इलाके से बाहर आने पे समाज, उनका गाँव यहाँ तक कि उनके माँ बाप भी इनको स्वीकार नहीं करते और मज़बूरन इन्हे इन्ही बदनाम गलियों में रहना पड़ता है. इन्हें स्वीकार ना करने का बड़ा कारण शायद यह है कि अधिकतर वेश्याएं छोटी शहरों या गांवों से आती है जहाँ स्त्री और पुरुष के नाजायज़ रिश्तों को समाज कुबूल नहीं करता. औसतन इनकी उम्र ३५ साल से अधिक कम ही हुआ करती है. यहाँ आयी बहुत सी लड़कियां तो वो हुआ करती हैं जिनको उनके ग़रीब घर वालों ने ही बेच दिया, बहुत सी लड़कियां ग़लत हाथों मैं पड के गुमराह हो गयीं और घर से भाग गयीं किसी के साथ और बेच दी गयीं.
कभी अँगरेज़ सैनिकों का ‘कम्फर्ट जोन’ रहा यह कमाठीपुरा आज भी 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है और नारी पे ज़ुल्म कि कहानी खुल के कह रहा है लेकिन समाज इनको अपनाने को तैयार नहीं है. वेश्यावृत्ति के दलदल में फंसी यहाँ की महिलाओं का दुःख का कोई अंत नज़र नहीं आता. यह तो उनकी बात हुई वैश्यावृति जिनकी मजबूरी बन चुका है. इनका एक इलाका है और इनसे समाज को सेक्स से सम्बंधित बिमारीयों का खतरा बना रहता है. लेकिन इन इलाकों मैं ना जा कर इनसे बचा जा सकता है.
आज के युग मैं वैश्यावृति का एक नया रूप सामने आने लगा है वो हैं समाज के लोगों के बीच रहते हुए हुए वैश्यावृति करना. आज महानगरों मैं अक्सर ट्यूशन क्लास के नाम पे, डांस क्लास के नाम पे वैश्यावृति के अड्डे सुनने मैं मिल जाया करते हैं. बहुत से ऐसे घरों के बारे मैं भी सुनने मैं मिला करता है जहाँ सामने से लोगों को लगता है कि यह कोई परिवार रहता है लेकिन होता यह है वो काल गर्ल्स का अड्डा. आज कल के कॉल सेंटर कि रात कि नौकरियों ने ऐसी स्त्रीयों का काम आसान कर दिया है क्यों कि ऐसे परिवार वाले लोगों को यही बताते हैं कि लड़की कॉल सेंटर मैं काम करती है जबकि वो कॉल सेंटर के नाम पे रात मैं अपने ग्राहकों के पास आया जाया करती है. आज पैसे का महत्व बढ़ता जा रहा है और बड़े शहरों मैं जहाँ समाज के बंधन कम हुआ करते हैं लड़कियों का ऐसे धंधे मैं शौकिया लग जाने कि खबरें अक्सर प्रकाश मैं आया करती हैं.
महानगरों से निकल कर अब यह धंधा छोटे शहरों तक जा पहुंचा है. मुगेरी लाल के हसीन सपने दिखा के ,अच्छी नौकरियों का लालच दे के, फ्रेंडशिप के नाम पे , ग़रीब घरों कि महिलाओं को इस वैश्यावृति के काम मैं लाया जा रहा है. फ़ोन पे फ्रेंडशिप के नाम पे अश्लील बातें और अश्लीलता परोसने का काम भी देखने को मिल जाया करता है. ऐसे वैश्यावृति के ठिकाने समाज के शरीफ कालोनी ,सोसाइटी मैं ही चलने के कारण और टेलेफोन और इन्टरनेट के इस्तेमाल के कारण लोगों के सामाजिक व नैतिक पतन का खतरा बढ़ता जा रहा है.
हमारे इस समाज मैं पति पत्नी, जैसे जायज़ रिश्ते तो पहचाने जाते हैं लेकिन उन रिश्तो का क्या जब स्त्री और पुरुष अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से अपने शरीर को एक दूसरे को सौंप देते हैं. ऐसे शारीरिक सम्बन्ध एक समय मैं कई लोगों से भी बन जाया करते है. यह रिश्ते आम तो अवश्य होते जा रहे हैं लेकिन न तो मान्य है और न ही सामान्य है. इसीलिए इसका कोई सही नाम तक हमारा समाज नहीं दे सका है.समाज रिश्तों से बना करता है और मनुष्य जंगली नहीं एक सामाजिक प्राणी है.
ऐसे रिश्ते भी आज हमारे सामाजिक और नैतिक पतन का कारण बनते जा रहे हैं यह रिश्ते सही है या गलत इसका फैसला तो इसी बात से हो जाता है कि इन रिश्तों का अंत हमेशा दुखद ही हुआ करता है. ऐसे रिश्तों मैं ग़लती हमेशा दोनों की ही हुआ करती है. आज़ादी के नाम पे रिश्तों के बंधन से इनकार करना आदिमानव तुग मैं वापस लौट जाने जैसा है. इन बुराईयों से बचने का एक ही तरीका है कि आप अपने जायज़ रिश्तों के प्रति वफादार रहिये क्यों की यह प्यार का बंधन ही सही मायने मैं आज़ादी है.
जब औरत घर की जिम्मेदारियां ना संभालना चाहे तो क्या करें?
इंसान को जीने के लिए इस दुनिया मैं बहुत कुछ करना पड़ता है. बचपन से बच्चों को पढाया लिखाया जाता केवल इसलिए है कि समाज मैं इज्ज़त से सर उठा के जी सकें. अपनी अपनी सलाहियत के अनुसार हर इंसान अपने रोज़गार का रास्ता चुन लेता है. कोई व्यापार करने लगता है, कोई विज्ञान मैं महारत हासिल करता है तो कोई बैंकिंग मैं और उसी के अनुसार नौकरी कर लेता है. इस प्रकार इंसान का जीवन दो ख़ास हिस्सों मैं बंट जाता है . पहला उसका घर और परिवार और दूसरा उसकी नौकरी या व्यापार.
किसी के पास अच्छा व्यापार या नौकरी है और उसका घर भी अच्छे से चल रहा है तो वो इंसान एक सुखी इंसान कहलाता है.लेकिन इन दोनों सुखों को पाने के लिए इन्सान को बहुत सी कुर्बानियां देती पड़ती हैं, मेहनत करनी पड़ती है. इसमें औरत या मर्द का कोई सवाल नहीं आता बल्कि जैसा कि मैंने कहा अपनी अपनी सलाहियतो का इस्तेमाल करते हुए करते हुए औरत और मर्द इन सुखों को पाने कि कोशिश करते हैं.
यकीनन यदि किसी घर मैं पति और पत्नी दोनों घर पे बैठ के रोटियां पकाएं , बच्चों की परवरिश मैं ही लगे रहें तो उनको यह सब करने के लिए धन कहाँ से आएगा? और यदि दोनों नौकरी करने लगें तो घर का सुकून ख़त्म हो जाता है क्यों कि केवल धन से ना तो औलाद की सही परवरिश संभव है और ना ही शाम के २ घंटो मैं घर को संभालना संभव है.
सबसे बेहतर तरीके से वही घर चलता है जहाँ एक धन कमाने के लिए घर से बाहर जाए और दूसरा घर पे रह ते हुए औलाद की परवरिश और घर तथा समाज के दूसरे कामों को अंजाम दे. कौन किस काम को करेगा इसका फैसला उनकी सलाहियत करेगी ना कि हमारी जिद.
यह औरत ही है जो अपने गर्भ मैं ९ महीने अपने बच्चे को रखती है और जन्म होने पे उस बच्चे को दूध पिलाना होता है. ऐसे मैं बच्चा अपनी माँ से लगा रहता है और वो जैसी परवरिश करती है वैसा बनता चला जाता है. यह दोनों काम किसी मर्द के लिए करना संभव नहीं यह सभी जानते हैं.ऐसे मैं इस बात कि जिद करना कि हम घर को नहीं संभालेंगे ,बस बाहर जा के धन कमायेंगे कहाँ तक उचित है?
मर्द को ना गर्भ मैं बच्चे रखने हैं, ना दूध पिलाना है. शारीरिक रूप से भी अधिक मज़बूत है तो यदि वो बाहर के काम करे, मजदूरी करे, नौकरी करे ,व्यापार करे तो इसे ना इंसाफी तो नहीं कहा जा सकता? यहाँ ना तो किसी गुलामी की बात है और ना ही किसी ज़ुल्म कि बात है. यह बात है पति और पत्नी के समझोते की जिसके नतीजे मैं दोनों पारिवारिक सुख का अनुभव करते हुई सुखी जीवन व्यतीत करते हैं.
यदि किसी अलग परिस्थिति में या मजबूरी में यह आवश्यक हो जाए कि पत्नी नौकरी करे या ऐसी औरत जिसके कोई औलाद नहीं, घर पे पड़े पड़े क्या करे तो यकीनन उसे भी अपने व्यापार मैं साथ देना चाहिए और नौकरी कर के कुछ और धन कमाने कि कोशिश करनी चाहिए.
लेकिन पति कमाने में सक्षम है, व्यापार भी बढ़िया है फिर भी अपने औलाद के प्रति , घर के प्रति ज़िम्मेदारी को महसूस ना करते हुए बाहर नौकरी करने कि जिद ,या किसी और काम मैं समय गंवाने की जिद क्या घर का सुकून और चैन ख़त्म नहीं कर देगी?
माना कि घर कि जिम्मेदारियों को निभाना आसान नहीं, घर मैं बंध के रह जाना पड़ता है , अक्सर बुज़ुर्ग महिलाएं घर की बहु को ना जाने क्या क्या सुना देती हैं, बहुत बार खराब पति होने पे पति की चार बातें घर की सभी ज़िमेदारियां निभाने के बाद भी सुननी भी पड़ती है लेकिन यह हर घर मैं तो नहीं होता?
क्या नौकरी मैं मर्द को ज़िल्लत का सामना नहीं करना पड़ता? क्या खराब अफसर के आ जाने पे बुरा भला नहीं सुनना पड़ता? यह तो जीवन है जिसमें इस तरह कि बातें होती रहती रहती हैं. इसका बहाना बना के यदि मर्द नौकरी की ग़ुलामी से भागने लगे और औरत घर मैं रहके अपनी जिमेदारियों को निभाने को ग़ुलामी का नाम देते हुए उस से से भागने लगे तो यकीन जानिए मानसिक शांति जिसके लिए हम सब कुछ करते हैं ख़त्म हो जाएगी. आज तरक्की के युग में ऐसे घरों की संख्या दिन बा दिन बढती जा रही है.
ध्यान रहे अकारण जिद घरों को बसाते नहीं उजाड़ देते हैं. कुछ लोग तो इतने अव्यवहारिक अपनी जिद मैं हो जाते हैं कि तरक्की के नाम पे महिलाओं को शादी ना करने तक का मशविरा दे डालते हैं.
पति और पत्नी को अपनी जिद छोड़ के अपनी अपनी सलाहियतो, परिस्थियों के अनुसार काम को बाँट लेना चाहिए और सुख से जीवन व्यतीत करना चाहिए. यही वास्तविक तरक्की कहलाती है.
अगले जनम मोहे बिटिया नहीं कीजों
औरत माँ है बेटी है पत्नी है पूज्य है, जहां पर नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं " यत्र नारी पूज्यंते, रमंते तत्र देवता "लेकिन इन सबका क्या अर्थ हुआ यदि किसी समाज में महिलाओं को उनके जीवन की सही आज़ादी से वंचित किया जा रहा हो? नारी और पुरूष में प्राकृतिक भिन्नताएं हैं इसी कारण से नारी पुरुष सामान नहीं लेकिन बराबरी का दर्जा मिलना ही चाहिए और कहीं कहीं तो नारी को पुरुष से भी ऊंचा स्थान देना चाहिए. धार्मिक किताबों मैं भी बहुत सी जगहों पे नारी को पुरुष से ऊंचा स्थान दिया गया है.
यदि वही उच्च स्थान केवल किताबों में ना रह के हकीअत में दिया जाता तो आज हमारे समाज में जो दुर्व्यवहार स्त्रीयों के साथ होता है ,ना हो रहा होता. स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे को साथ रहने मैं सुख की प्राप्ति होती है. ऐसे मैं महिला एक इंसान ना रह के भोग की वस्तु कब और कैसे बन गयी इस बारे मैं हमारे आज के समाज को अवश्य सोंचना चाहिए.
महिलाओं को भी इस बात पे विचार करने की आवश्यकता है की मर्द की बराबरी और आज़ादी के सही मायने मैं क्या अर्थ हैं. औरत का शरीर मर्द से अलग है उसके पहनावा अलग है. मर्द की तरह पैंट शर्ट को पहनना आज़ादी नहीं, अर्धनग्न वस्त्रों को पहन के खुद को भोग की वस्तु बना लेने पे मर्द को मजबूर करना आज़ादी नहीं बल्कि आज़ादी है अपनी ख़ुशी से अपना जीवन साथी तलाश करना, दहेज़ को शादी मैं रुकावट ना बनने देना ,पुरुष के जैसे ही शिक्षा हासिल करना , घर के फैसलों मैं आप की बात को भी अहमियत दी जाए इस बात की कोशिश करना.
लड़की गर्भ मैं आयी तो डर कि गर्भ मैं ही उसकी हत्या ना कर दी जाए. सवाल यह उठता है की क्या यह काम मर्द करता है और औरत जिसके गर्भ मैं लड़की है मजबूर होती है भ्रूण हत्या करवाने के लिए या एक औरत भी नहीं चाहती की उसकी औलाद एक बेटी हो? दूसरा बड़ा सवाल है कि जब यह मर्द औरत एक दूसरे को सुख ही देते हैं तो क्या कारण है कि औरत कि भ्रूण हत्या कर दी जाए? क्या नुकसान कोई माता पिता को उसके जन्म से होता है? कहीं दहेज़ इसका कारण तो नहीं? और अगर यह भी एक कारण है तो इसे बदलने कि कोशिश क्यों नहीं कि जाती? इसी बदलना ,भ्रूण हत्या से बेहतर है
जब पढ़ाई का समय आया तो बेटे की पढ़ाई पे अधिक ध्यान दिया जाने लगा और बेटी को दूसरे नम्बर पे रखते हुए , उसी दूसरे की अमानत समझते हुए उसकी शादी की फ़िक्र की जाने लगी. यह फैसला अभी माता पिता दोनों मिल कर लेते हैं.
बेटी जवान हुई तो गली मोहल्ले के मर्दों का डर यहाँ तक की बड़े बूढों से , मर्द रिश्तेदारों से भी खतरा. एक कैदी बन के रह जाती है एक जवान औरत की ज़िंदगी. यहाँ फिर एक सवाल की क्यों मर्द परायी स्त्री का मोह नहीं त्याग पाता? और मजबूरन औरत को एक कैदी की ज़िंदगी जीने पे मजबूर होना पड़ता है.
नौकरी की तो दफ्तरों मैं लालची नज़रों का सामना, सहयोगी अफसरों द्वारा औरत को अपनी वासना का शिकार बनाने की कोशिशें. शादी हुई तो सास का खौफ, पति की जी हुजूरी करना. दूसरों की ख़ुशी के लिए औरत के फैसले उसकी ख्वाहिशें दब के रह जाया करती हैं .विधवा हो गयी तो तिरस्कार, मनहूस की डिग्री ,दोबारा शादी करने की आज़ादी नहीं.
जब की यही औरत जब माँ बनती है तो औलाद को उससे अधिक मुहब्बत देने वाला कोई नहीं होता. औलाद के लिए भी उसकी माँ की जगह कोई नहीं ले सकता. बहुत बार देखा गया है की बेटी जितना अपने माता पिता का ख्याल रख लेती है बेटा नहीं रख पाता. औलाद की परवरिश, उसकी तरबियत अगर एक माँ सही ढंग से ना करे तो वो औलाद जिसपे मर्द फख्र करता है की उनकी निशानी है उसका वंश चलाएगी , बर्बाद हो जाए और बंश पे भी दाग़ लग जाए.
ज़रा ध्यान से देखें माँ की ममता, पत्नी का प्यार, बहन और बेटी का सहयोग इस मर्द को जीवन मैं शक्ति प्रदान करता है और वंही दूसरी और यही नारी एक कैदी सा या एक वैश्या सा जीवन बिताने पे मजबूर की जाती रही है.हद तो यह है कि पत्नी के रूप मैं भी पति द्वारा बलात्कार क़ी शिकार होती है और चुप रहने पे मजबूर होती है.
कुछ सवाल हैं जिनका जवाब हमको ही तलाशना होगा.
हमारे समाज मैं नारी के इस हाल के लिए कौन ज़िम्मेदार है? सही मायने मैं एक औरत की आज़ादी किसे कहते हैं? जब हमारे जीवन की गाडी नारी के सहयोग के बिना नहीं चल सकती तो यह नारी इतनी कमज़ोर क्यों? जब हमारे धर्मो मैं कहा गया है की जहां पर नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं तो फिर इस नारी की आँखों मैं डर और आंसू क्यों?
जिस दिन हमारा समाज नारी को उसकी सही जगह देना सीख लेगा उसे भोग की वस्तु की जगह एक इन्सान , ममता की देवी मानते हुई उसका सम्मान करना सीख लेगा उस दिन शायद महिलाएं भी अपनी सही आजादी का अर्थ समझ ने लगेंगी और एक ऐसा समाज सामने आएगा जहाँ औरत की आँखों मैं डर और आंसू की जगह ख़ुशी और चेहरे पे बेशकीमती मुस्कराहट देखने को मिला करेगी.और उसके चेहरे क़ी यही मुस्कराहट मर्द का जीवन है
बंदरिया
एक पेड़ पर एक बंदरिया रहती थी। वह बड़ी नेक और उदार थी। पेड़ के पास एक कुटिया थी। वहीं एक बुढ़िया रहती थी। वह बुढ़िया बहुत गरीब थी। एक दिन उसके पास चूल्हे के लिए लकड़ी नहीं थी, तो वह कागज जलाकर रोटियां बनाने लगी। कागज बार-बार बुझ जाते और बुढ़िया की रोटी कच्ची ही रह जाती। पेड़ पर बैठी बंदरिया यह देख रही थी। वह भागकर टाल पर गई और कुछ लकड़ियां उठा लाई। उसने लकड़ियां बुढ़िया को दे दीं। जब बुढ़िया की रोटियां खूब फूलने लगीं, तो बंदरिया रोटियों के चारों तरफ नाचने लगी। बूढ़ी ने पूछा - ‘ए बंदरिया, तू मेरी रोटी पर क्यों नाच रही है?’ बंदरिया बोली - ‘ए दैया, मैं टाल पे गई, टाल पे से लकड़ी लाई, लकड़ी मैंने तुझको दी, तूने उसकी रोटी बनाई, अब तू मुझे रोटी नहीं देगी?’बूढ़ी ने बंदरिया को हंसकर दो रोटी दे दी। रोटी लेकर बंदरिया आगे चल पड़ी। आगे उसे एक कुम्हार मिला। उसका बच्चा रोटी के लिए रो रहा था मगर कुम्हार का एक भी मटका नहीं बिका था, तो रोटी कहां से आतीं? बंदरिया ने कुम्हार से बच्चे के रोने का कारण पूछा और उसे दो रोटियां दे दीं। अब बंदरिया कुम्हार के मटके पर नाचने लगी। कुम्हार ने पूछा, ‘ऐ बंदरिया, तू मेरे मटके पर क्यों नाच रही है?’ बंदरिया बोली, ‘ए दैया, मैं टाल पे गई, टाल पे से लकड़ी लाई, लकड़ी मैंने बूढ़ी को दी, बूढ़ी ने उसकी रोटी बनाई, रोटी मैंने तुझे दी, अब तू मुझे एक मटका नहीं देगा?’ कुम्हार ने हंसकर बंदरिया को एक मटका दे दिया। मटका लेकर वह आगे चल पड़ी। आगे एक दूधवाला सिर पर हाथ टिकाए बैठा था। उसकी भैंसें पास खड़ी थीं। बंदरिया ने उसकी उदासी का कारण पूछा, तो वह बोला, ‘क्या बताऊं, मैं भैंसों को तो ले आया हूं मगर दूध निकालने का बर्तन तो घर पर ही भूल आया हूं। अब कैसे दूध निकालूं और कैसे बेचूं?’
मजाक कैसा?
एक धनी व्यक्ति ने झेन गुरु सेंगाई को कुछ लिख कर देने के लिए कहा जो उसके और उसके परिवार के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी समृद्धिकारक हो।
सेंगाई ने एक बड़े से कागज़ पर लिखा – “पिता मरता है, बेटा मरता है, पोता मरता है”
यह देखकर धनी व्यक्ति बहुत क्रोधित हुआ। वह बोला – “मैंने आपसे परिवार की खुशहाली के लिए कुछ लिखने को कहा था। ऐसा गन्दा मजाक आप मेरे साथ कैसे कर सकते हैं?”
“यह कोई मजाक नहीं है” – सेंगाई ने कहा – “अगर तुम्हारा बेटा तुम्हारे सामने मर जाए तो यह तुम्हें बहुत दुःख देगा। इसी प्रकार यदि तुम्हारा पोता तुम्हारे जीवित रहते मर जाए तो यह तुम्हें और तुम्हारे पुत्र दोनों को अपार दुःख देगा। जो कुछ मैंने लिखा है, यदि उस तरह से पीढ़ी-दर-पीढ़ी तुम्हारे परिवार में होता जाए तो तुम्हारे परिवार में वास्तविक समृद्धि कायम रहेगी। यही जीवन का प्राकृतिक नियम है।”
अन्ना से कुछ प्रश्न
आत्म चिंतन कीजिये और इन सवालों का उत्तर जानने की कोशिश कीजिये
१)अन्ना जी ने अनसन स्टार्ट किया था इस बात पे की प्रधान मंत्री और न्याय पालिका लोकपाल में लाया जाये लेकिन मांग का जिक्र आब क्यूँ नै करते..क्यूँ अनसन इन मांगो के बिना तोडा दिया ? क्यूँ उन मांगो पे अनसन तोडा जो उनकी मांगो में थी ही नहीं
खुद कांग्रेस नेता शकील अहमद ने कहा की अन्ना ने हमे नहीं बल्कि हम ने अन्ना को झुका दिया , हम ने अन्ना को उनकी सभी प्रमुख मांगो से झुका दिया , और उन्हें ३ सद्दी से मांगो पर ला दिया , हमने उनकी मांग नहीं मानी की प्रधानमंत्री , न्यायपालिका लोकपाल में आये , कांग्रेस ने सरकारी बिल को वापस नहीं लिया , ३० अगस्त तक लोपाल भी पास नहीं किया , हमने स......ांसदों को लोकपाल में भी नहीं लिया , हमने जो ३ घटिया मांगे मानी वो
(1)सिटिज़न चार्टर लागू करना - जो की कई राज्यों में पहले से है
(2)निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना,
(3)राज्यों में लोकायुक्तों कि नियुक्ति करना. - जो की पहेले से है
2) बुखारी जैसे देश द्रोही का साथ लेने घर तक गए लेकिन बाबा रामदेव जी का साथ लेने से मन क्र दिया और उन्हें मंच पे आने से भी मन कर दिया था उसके बाद भी बाबाजी गए और सुप्पोर्ट किया...
३) क्यूँ अन्ना मुस्लिम तुस्टीकरण के लिए बुखारी के घर तक गए और भारत माता की फोटो मंच से हटा दी.क्या आब वो भी गांधी न्जैसे महान बन के देश के टुकड़े करवाना चाहते हैं ?ये मुस्लिम तुस्टीकरण क्यूँ जबकि मुस्लिम्स पह्के से ही सुप्पोर्ट कर रहे थे
४) बीजेपी और मोदी और संघ का साथ लेके आब इनका विरोध करके क्या ये टीम अनन्ना की कांग्रेस के साथ डील तो नहीं है की जिससे बीजेपी के वोट्स बट जाएँ और कांग्रेस फिर से दूसरी पार्टियों के साथ मिलके सारकार बना ले और इसके बदले कांग्रेस अन्ना को दूसरा गांधी बना दे ??
५)टीम अन्ना में भूषण और अरुंधती रॉय जैसे लोग क्यूँ हैं जो आतंकवादी और अलगाववादी को सुप्पोर्ट करते हैं ???
६) अन्ना मोदीजी के उपवास के क्यूं खिलाफ हैं?
७) अन्ना अडवाणी की रथ यात्रा जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ है, वो उसके बारें में इतने
मूर्खतापूर्ण बयान क्यूं दे रहें है?
8)इसके बाबत वो या उनकी टीम ही बोल सकती है, बाकि और कोई नहीं?
९) अन्ना ने जन लोकपाल के नाम का ड्रामा क्यूं किया, जबकि हकीकत में कुछ हुआ नहीं.
हालाँकि वो होना नहीं था पर फिर भी, जनता को क्यूं गुमराह किया?
१०) जब मुसलमान जनता देश के साथ है, फिर बुखारी जैसे सड़क छाप देश द्रोही नेता को मनाने का कदम क्यूं उठाया गया?...
११)किस आधार पर सोनिया गाँधी को सलाह दी गयी की वो इंदिरा गाँधी की तरह बने? एक
तरफ अन्ना ढींगे हांकते है की हम किसी पार्टी का समर्थन नहीं कर रहें फिर इंदिरा गाँधी
का उधारण क्यूं? जबकि इंदिरा गाँधी हर तरह से एक भ्रष्ट महिला थी.और अगर कांग्रेस में
से ही उधारण देना था तो शास्त्रीजी का क्यूं नहीं? उनके २ साल के राज में एक भी घोटाला
नहीं हुआ?
१२)बीजेपी को भ्रष्टाचार में Ph.D और कांग्रेस को graduate !! किस आधार पर? कांग्रेस के ६० सालो की लूट उन्हें बीजेपी के ६ साल के सुशासन से कर दी और बीजेपी को कांग्रेस से जादा बड़ा करप्ट बताया ...क्यूँ ???
अन्ना को अगर जानकारी नहीं है तो क्यूं दिग्विजय सिंह की तरह बात कर रहें है. अन्ना अगर अनपढ़ हैं, अगर इतिहास और भूगोल नहीं पढ़े हैं, ना सही पर इनकी टीम के सदस्य तो पढ़े
लिखे हैं उनसे पूछ कर इस तरह के मूर्खतापूर्ण वक्तव्य दिए होते
१३) जब अन्ना की रसोई ABVP वाले चला रहें थे, तब अन्ना ने क्यूं नहीं बंद करवाई?
१४) अन्ना/टीम इतनी मूर्खतापूर्ण बातें क्यूं और कैसे बोल लेती है? इनको देख कर अनानयास ही दिग्विजय, मनहूस और कपिल चप्पल की याद आ जाती है.
१५) बीजेपी, रामदेव, संघ, ABVP की मदद से ही अन्ना के आन्दोलन को ताकत मिली, अन्ना ये बात कब पहचानेंगे?
१६)क्या वो जानते हैं, कांग्रेस के किस नेता का इस "अन्ना की नौटंकी" के पीछे दिमाग है? क्यूंकि अन्ना/टीम में इतनी काबिलियत नहीं है की ऐसी नौटंकी प्लान कर सकें, ये तो
किसी बहुत ही नीच और निकृष्ट आदमी की सोच हो सकती है?
१७) जब महारास्त्र में राज ठाकरे उत्तर भारतीयों को मार मार के भगा रहा था तब अन्ना ने राज ठाकरे का सुप्पोर्ट क्यूँ किया था...क्यूँ अन्ना ने उस समय उत्तर भारतीयों के लिए अनसन क्यूँ नहीं किया था ????
१८) २ जी घोटाला केवल डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी जी के कारन पकड़ा गया और आज भी राजा से ले के चिदंबरम टाक डॉ सुब्रमयम स्वामी के कारन हुआ. क्यूँ टीम अन्ना ने २ जी के बारे में एक शब्द नहीं कहा आज तक ???
१९) क्यूँ टीम अन्ना ने NGO और MEDIA को लोकपाल से बहार रखा जबकि इस देश के प्रधान मंत्री से ले के सुप्रीम कोर्ट के जज तक लोकपाल के दायरे में आने को कहा ..केवल इसलिए की अन्ना और केजरीवाल के खुद के ट्रस्ट है और इन्हें आपनी इमेज बनाने के लिए मीडिया का सप्पोर्ट चाहिए था
मैंने और इस देश की जनता ने भी समर्थन, अन्ना/टीम की वजह से नहीं बल्कि, उनके आन्दोलन के उद्देश्य को देख कर दिया था. परन्तु अब इस उद्देश्य में खोट दिखने लगी है.
और इन सवालो का जवाब न तो टीम अन्ना देती है और न ही उनके भक्त ...में उनके भक्तो और सभी देश भक्तो से भी निवेदन करूँगा की आप साब लोग हर एक पॉइंट को धयान से सोचिये ...वंदे मातरम .......................जय माँ भारती ........
कामवासना ओर प्रेम
कामवासना अंश है प्रेम का, अधिक बड़ी संपूर्णता का। प्रेम उसे सौंदर्य देता है। अन्यथा तो यह सबसे अधिक असुंदर क्रियाओं में से एक है। इसलिए लोग अंधकार में कामवासना की और बढ़ते है। वे स्वयं भी इस क्रिया का प्रकाश में संपन्न किया जाना पसंद नहीं करते है। तुम देखते हो कि मनुष्य के अतिरिक्त सभी पशु संभोग करते है दिन में। कोई पशु रात में कष्ट नहीं उठाता; रात विश्राम के लिए होती है। सभी पशु दिन में संभोग करते है; केवल आदमी संभोग करता है रात्रि में। एक तरह का भय होता है कि संभोग की क्रिया थोड़ी असुंदर है। और कोई स्त्री अपनी खुली आंखों सहित कभी संभोग नहीं करती है। क्योंकि उनमें पुरूष की अपेक्षा ज्यादा सुरुचि-संवेदना होती है। वे हमेशा मूंदी आंखों सहित संभोग करती है। जिससे कि कोई चीज दिखाई नहीं देती। स्त्रियां अश्लील नहीं होती है, केवल पुरूष होते है ऐसे।
इसीलिए स्त्रियों के इतने ज्यादा नग्न चित्र विद्यमान रहते है। केवल पुरूषों का रस है देह देखने में; स्त्रियों की रूचि नहीं होती इसमें। उनके पास ज्यादा सुरुचि संवेदना होती है। क्योंकि देह पशु की है। जब तक कि वह दिव्य नहीं होती, उसमें देखने को कुछ है नहीं। प्रेम सेक्स को एक नयी आत्मा दे सकता है। तब सेक्स रूपांतरित हो जाता है—वह सुंदर बन जाता है। वह अब कामवासना का भाव न रहा,उसमें कहीं पार का कुछ होता है। वह सेतु बन जाता है।
तुम किसी व्यक्ति को प्रेम कर सकते हो। इसलिए क्योंकि वह तुम्हारी कामवासना की तृप्ति करता है। यह प्रेम नहीं, मात्र एक सौदा है। तुम किसी व्यक्ति के साथ कामवासना की पूर्ति कर सकते हो इसलिए क्योंकि तुम प्रेम करते हो। तब काम भाव अनुसरण करता है छाया की भांति, प्रेम के अंश की भांति। तब वह सुंदर होता है; तब वह पशु-संसार का नहीं रहता। तब पार की कोई चीज पहले से ही प्रविष्ट हो चुकी होती है। और यदि तुम किसी व्यक्ति से बहुत गहराई से प्रेम किए चले जाते हो, तो धीरे-धीरे कामवासना तिरोहित हो जाती है। आत्मीयता इतनी संपूर्ण हो जाती है कि कामवासना की कोई आवश्यकता नहीं रहती। प्रेम स्वयं में पर्याप्त होता है। जब वह घड़ी आती है तब प्रार्थना की संभावना तुम पर उतरती है।
ऐसा नहीं है कि उसे गिरा दिया गया होता है। ऐसा नहीं है कि उसका दमन किया गया, नहीं। वह तो बस तिरोहित हो जाती है। जब दो प्रेमी इतने गहने प्रेम में होते है कि प्रेम पर्याप्त होता है। और कामवासना बिलकुल गिर जाती है। तब दो प्रेमी समग्र एकत्व में होते है। क्योंकि कामवासना, विभक्त करती है। अंग्रेजी का शब्द ‘सेक्स’ तो आता ही उस मूल से है जिसका अर्थ होता है, विभेद। प्रेम जोड़ता है; कामवासना भेद बनाती है। कामवासना विभेद का मूल कारण है।
जब तुम किसी व्यक्ति के साथ कामवासना की पूर्ति करते हो, स्त्री या पुरूष के साथ, तो तुम सोचते हो कि सेक्स तुम्हें जोड़ता है। क्षण भर को तुम्हें भ्रम होता है एकत्व का, और फिर एक विशाल विभेद अचानक बन आता है। इसीलिए प्रत्येक काम क्रिया के पश्चात एक हताशा, एक निराशा आ घेरती है। व्यक्ति अनुभव करता है कि वह प्रिय से बहुत दुर है। कामवासना भेद बना देती है। और जब प्रेम ज्यादा और ज्यादा गहरे में उतर जाता है तो और ज्यादा जोड़ देता है तो कामवासना की आवश्यकता नहीं रहती। तुम इतने एकत्व में रहते हो कि तुम्हारी आंतरिक ऊर्जाऐं बिना कामवासना के मिल सकती है।
जब दो प्रेमियों की कामवासना तिरोहित हो जाती है तो जो आभा उतरती है तुम देख सकते हो उसे। वह दो शरीरों की भांति एक आत्मा में रहते है। आत्मा उन्हें घेरे रहती है। वह उनके शरीर के चारों और एक प्रदीप्ति बन जाती है। लेकिन ऐसा बहुत कम घटता है।
लोग कामवासना पर समाप्त हो जाते है। ज्यादा से ज्यादा जब इकट्ठे रहते है; तो वे एक दूसरे के प्रति स्नेहपूर्ण होने लगते है—ज्यादा से ज्यादा यही होता है। लेकिन प्रेम कोई स्नेह का भाव नहीं है, वह आत्माओं की एकमायता है—दो ऊर्जाऐं मिलती है। और संपूर्ण इकाई हो जाती है। जब ऐसा घटता है। केवल तभी प्रार्थना। संभव होती है। तब दोनों प्रेमी अपनी एकमायता में बहुत परितृप्त अनुभव करते है। बहुत संपूर्ण कि एक अनुग्रह का भाव उदित होता है। वे गुनगुनाना शुरू कर देते है प्रार्थना को।
प्रेम इस संपूर्ण अस्तित्व की सबसे बड़ी चीज है। वास्तवमें, हर चीज हर दूसरी चीज के प्रेम में होती है। जब तुम पहुंचते हो शिखर पर, तुम देख पाओगे कि हर चीज हर दूसरी चीज को प्रेम करती है। जब कि तुम प्रेम की तरह की भी कोई चीज नहीं देख पाते। जब तुम धृणा अनुभव करते हो—धृणा का अर्थ ही इतना होता है कि प्रेम गलत पड़ गया है। और कुछ नहीं। जब तुम उदासीनता अनुभव करते हो, इसका केवल यही अर्थ होता है कि प्रेम प्रस्फुटित होने के लिए पर्याप्त रूप से साहसी नहीं रहा है। जब तुम्हें किसी बंद व्यक्ति का अनुभव होता है,उसका केवल इतना अर्थ होता है कि वह बहुत ज्यादा भय अनुभव करता है। बहुत ज्यादा असुरक्षा—वह पहला कदम नहीं उठा पाया। लेकिन प्रत्येक चीज प्रेम है।
सारा अस्तित्व प्रेममय है। वृक्ष प्रेम करते है पृथ्वी को। वरना कैसे वे साथ-साथ अस्तित्व रख सकते थे। कौन सी चीज उन्हें साथ-साथ पकड़े हुए होगी? कोई तो एक जुड़ाव होना चाहिए। केवल जड़ों की ही बात नहीं है, क्योंकि यदि पृथ्वी वृक्ष के साथ गहरे प्रेम में न पड़ी हो तो जड़ें भी मदद न देंगी। एक गहन अदृष्य प्रेम अस्तित्व रखता है। संपूर्ण अस्तित्व, संपूर्ण ब्रह्मांड घूमता है प्रेम के चारों और। प्रेम ऋतम्भरा है। इस लिए कल कहा था मैंने सत्य और प्रेम का जोड़ है ऋतम्भरा। अकेला सत्य बहुत रूखा-रूखा होता है।
केवल एक प्रेमपूर्ण आलिंगन में पहली बार देह एक आकार लेती है। प्रेमी का तुम्हें तुम्हारी देह का आकार देती है। वह तुम्हें एक रूप देती है। वह तुम्हें एक आकार देती है। वह चारों और तुम्हें घेरे रहती है। तुम्हें तुम्हारी देह की पहचान देती है। प्रेमिका के बगैर तुम नहीं जानते तुम्हारा शरीर किस प्रकार का है। तुम्हारे शरीर के मरुस्थल में मरू धान कहां है, फूल कहां है? कहां तुम्हारी देह सबसे अधिक जीवंत है, और कहां मृत है? तुम नहीं जानते। तुम अपरिचित बने रहते हो। कौन देगा तुम्हें वह परिचय? वास्तव में जब तुम प्रेम में पड़ते हो और कोई तुम्हारे शरीर से प्रेम करता है तो पहली बार तुम सजग होते हो। अपनी देह के प्रति कि तुम्हारे पास देह है।
प्रेमी एक दूसरे की मदद करते है अपने शरीरों को जानने में। काम तुम्हारी मदद करता है दूसरे की देह को समझने में—और दूसरे के द्वारा तुम्हारे अपने शरीर की पहचान और अनुभूति पाने में। कामवासना तुम्हें देहधारी बनाती है। शरीर में बद्धमूल करती है। और फिर प्रेम तुम्हें स्वयं का, आत्मा का स्वय का अनुभव देता है—वह है दूसरा वर्तुल। और फिर प्रार्थना तुम्हारी मदद करती है अनात्म को अनुभव करने में,या ब्रह्म को, या परमात्मा को अनुभव करने में।
ये तीन चरण है: कामवासना से प्रेम तक, प्रेम से प्रार्थना तक। और प्रेम के कई आयाम होते है। क्योंकि यदि सारी ऊर्जा प्रेम है तो फिर प्रेम के कई आयाम होने ही चाहिए। जब तुम किसी स्त्री से या किसी पुरूष से प्रेम करते हो तो तुम परिचित हो जाते हो अपनी देह के साथ। जब तुम प्रेम करते हो गुरु से, तब तुम परिचित हो जाते हो अपने साथ। अपनी सत्ता के साथ और उस परिचित द्वारा, अकस्मात तुम संपूर्ण के प्रेम में पड़ जाते हो।
स्त्री द्वार बन जाती है गुरु का, गुरु द्वार बन जाता है परमात्मा का अकस्मात तुम संपूर्ण में जा पहुंचते हो, और तुम जाते हो अस्तित्व के अंतरतम मर्म में।
सादगी
पता है दुनिया में सबसे मुश्किल काम क्या है ?
सादगीको समजना सबसे मुश्किल है ...दस डिजिट की गिनती आसान है पर दस बटा दो कितना ये आजकी पीढ़ी के लिए बिना गणकयंत्र बताना मुश्किल है ...ऐसा क्यों ? कहीं ऐसा तो नहीं की ऊपर चोटी की चाहतमें हम जमीं पर रहना भूल रहे है ???
आज कल मेक ओवर का जमाना है ..अपने रंग रूप को बिलकुल बदल सकते हो आप ...थोड़े पैसे होने चाहिए पर मनको बदलने का कोई ब्यूटी पार्लर खुला नहीं अब तक ...तनाव कम करने के नुस्खेके नाम पर वजन कम करने के नाम पर वही सादे जीवन जीने के लिए नए तरीके से लोगो को सिखाया जाता है जो पाश्चात्य जीवनकी असर में हमारी जिंदगीके मुलभुत सिध्धांत भूल रहे है ...
शायद आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की पिछले इक्कीस साल से मैंने अपने चेहरे पर पावडर भी नहीं लगाया ...लिपस्टिक दूर की बात है ...घर के बर्तन को छोड़ सारे काम खुद ही करती हूँ ...ना मुझे कोई जिम जाने की जरूरत पड़ी है ना कोई क्रीम की ...मेहनत की लाली चेहरे पर रहती है ...जाड़े के दिनोंमें कच्चे दूध की मलाई का जादू काम करता है .....जरूरत पड़े तो साइकिल चलाते भी शर्म नहीं महसूस होती ....ये सादगी की मजाक भी उडाई जाती है पर मुज पर कोई असर नहीं होता .....
इंसान को तंदुरस्त रहने का एकदम सादा नुस्खा एक ही है ...जिसे पढ़कर शायद सब यही कहेंगे की ये पोसिबल नहीं पर ये सच है :
रोज एक ही टाइम पर सुबहमें जाग जाओ ...खाने पिने का वक्त भी एक ही रखो ...रात को एक ही वक्त पर सो जाओ ..अपनी दिनचर्या के क्रम में छेड़खानी करना छोड़ दो ...पुरे छ घंटे की नींद ले लो ...शायद ही डॉक्टर की जरूरत पड़े ....ये आजमाया हुआ नुस्खा है .....साधारण बुखार हो तो एंटी बायोटिक दवाओं की जगह सादी दवाई लो ...शरीर को भारी दवाओं का आदि मत बनाओ ...जिंदगी ही तो सब कुछ है ...जब जिंदगी ही ना रहे तो सब कुछ पास हो पर इसका मतलब नहीं ....
’बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो ईमानदार नहीं हैं’
इस देश में मन्दिरों-मस्जिदों के लिए दंगे हुए हैं, टेक्स बढ़ाए जाने पर आवाज़ें उठी हैं, किसी फ़िल्म को बैन करने की मांग को लेकर तोड़-फोड़ हुई है. यहां तक की वैलेन्टाइन डे के विरोध में भी चीखना चिल्लाना हुआ है. लेकिन ’भ्रष्टाचार’ को आज़ादी के 65 साल बाद भी लड़ाई का बड़ा मुद्दा नहीं माना जाता था. आज बिना किसी स्वार्थ के पांच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के बुज़ुर्ग भी एक साथ, एक मुद्दे के लिए, एक आवाज़ में साथ आए हैं. इसे जोश कहा जा सकता है वक़्ती जुनून भी कहा जा सकता है. लेकिन इसे हलका नहीं माना जा सकता. उन हालात में जब प्रधानमंत्री अपने पास जादुई छड़ी ना होने का अफ़सोस करते रहते हैं और गठबंधन की सरकार होने की मजबूरी पर रोते रहते हैं ऐसे में सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि अगर आप बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो आप इमानदार नहीं हैं. आज कई लोग जन लोकपाल बिल के साथ खड़े नहीं हैं उनका मानना है कि किसी एक कानून से बदलाव नहीं लाया जा सकता या फिर देश में पहले ही भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये कई कानून हैं ज़रूरत है उनको मज़बूत बनाने की. अन्ना को नौटंकी बताने वाले अलग अलग तबकों से हैं जैसे ओबामा के भारत आने पर सड़कों पर उतरने वाले लोग, नक्सल कार्यवाई के विरोध में ग्रहमंत्री को काले झंडे दिखाने वाले लोग, इंडिया के क्रिकेट मैच हार जाने पर भिन्नाने वाले लोग. कई लोगों का ये भी मानना है कि अन्ना के पीछे विदेशी ताकतें हैं वर्ना कोई समाजिक कार्यकर्ता इतना समर्थन कैसे जुटा सकता है. कई ये भी कहते हैं कि ये आंदोलन ब्राहमणवादी है इसमे दलितों और अल्पसंख्यकों की जगह नहीं है. यहां तक कि ससंद पर भरोसा करने की हिदायत भी दी जा रही है.
पहली बात, किसी भी बड़े बदलाव की शुरूआत एक छोटे से कदम से ही होती है, ऐसा नहीं है कि एक कानून बना, कुछ कागज़ात साइन हुए और समाज बदल जाएगा, देश में हर कोई स्वस्थ और सुखी हो जाएगा. सवाल है पहला कदम बढ़ाने की. राइट टू इन्फ़ॉरमेशन या इलेक्शन कमिशन का अपने पैरों पर खड़ा होना इस बात का सुबूत है. संविधान में बेशक ऐसे कानून हैं जो भ्रष्टाचार की नकेल खींच सकते हैं पर एक छोटा सा छेद भी नाव को डुबाने के लिए काफ़ी होता है. उस छेद को ’लूप होल’ कहते हैं.
दूसरी बात, अमरीका हमारा दुश्मन है या चीन हम पर भारी हो रहा है मानने वाला तबका ये क्यूं भूल जाता है कि घर का भेदी लंका ढाए. जब तक हम खुद अपने बीच से अपनी ही जड़ें खोखली करने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर नहीं निकाल लेते तब तक किसी भी दुश्मन से लड़ने में हम नाकाम ही होंगे. हर शख़्स यही मानता है कि भ्रष्टाचार एक दीमक है पर इसके लिए हमें आपसी मतभेद को किनारे रखना होगा, दो अलग अलग सोच रखने वाले भाई अगर अपनी मां को मौत की कगार पर देखें तो पहला हाथ उसे अस्पताल ले जाने के लिए बढ़ना चाहिए नाकि ये तय करने के लिए कि पड़ोसी हमारे आंगन में पैर पसार रहा है.
तीसरी बात, लोगों के बीच जोश भरना सबसे आसान काम भी है और सबसे मुश्किल भी. नौकरी पेशा लोग जब अपने ऑफ़िस के बाद कंधे पर बैग लटकाए केंडलमार्च करते हैं, घर में बैठ कर टीवी पर सास-बहू सीरियल देखने वाली औरतें या फिर छात्र-छात्राएं कॉलेज कैंपस की जगह तिहाड़ जेल के सामने रात बिताते हैं तो इतना तो तय हो जाता है कि ये लड़ाई सबकी है. शहर के आस-पास बसे गांव से लोग जब खुद चल कर अन्ना को देखने आते हैं. बूढ़ी औरतें, मां-बाप अपने बच्चों को साथ लिए जब एक इन्सान में उम्मीद की किरन देखते हैं तो ये भी साफ़ होता है कि भ्रष्टाचार वाकई आम इंसान को चोट देता है. ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि जन लोकपाल के लिए हो रहे आंदोलन में शामिल सभी लोग इसकी पेचीदगियों को समझें, इनकी सीधी समझ तो इतना ही बताती है कि जब मैं किसी सरकारी दफ़्तर में जाऊं तो सौ रुपय चपरासी को और हज़ार रुपय अफ़सर को ना देने पड़ें. राजनितिक पार्टियां अगर ’राजनैतिक’ पार्टियां होतीं तो वो ज़रूर समझतीं कि भाषण सुनने के लिए लोगों को पैसा देकर बुलाना ज़रूरी नहीं होता.
चौथी बात, जैसे हर मुसलमान उग्रवादी नहीं होता वैसे ही हर ब्राहमण गोल पेट वाला खाऊ इन्सान नहीं होता. जब हम स्त्रियों, मुसलमानों या दलितों के लिए किसी भी तरह के पुर्वाग्रहों का विरोध करते हैं तो उच्चजाति के लिए दीवार क्यूं नहीं तोड़ सकते. कुर्सी पर बैठने वाला किसी क्षेत्र और जाति का नहीं होता, वो बस अपनी जेबें भरना जानता है यही उसका मज़हब है.
पांचवी बात, किसी भी बड़े आंदोलन में एक नेता ज़रूर होता है. जिसे देख कर आम जन समूह आगे बढ़ सके. अन्ना और उनके सहयोगी इस बात को बखूबी जानते हैं. लोगों के बीच कोई भी फ़ैसला अन्ना के नाम से ही जाना चाहिए वो इस बात की बारीकी को समझते हैं, यहां ’पहले मैं’ की होड़ नहीं है. इतिहास के पन्नों पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलेगा कि हर बड़े आन्दोलन के पीछे एक आवाज़ होती है जो उसे दिशा देती है. बिना आवाज़ के समूह का मतलब ही नहीं रह जाता.
ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार को खुद से मिटाने की ज़रूरत है तभी समाज से इसका खात्मा हो सकेगा लेकिन हम ये क्यूं भूल जाते हैं कि यहां आरटीआई के लिए काम करने वालों को गोली मारी जाती है, यहां अपनी ज़मीन के लिए लड़ने वाले किसानों की दिन-दहाड़े पिटाई होती है, यहां मंत्रियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनती हैं और आम इन्सान को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, पढ़ाई के लिए लोन मांगने पर बैंक मैनेजर को घूस खिलानी पड़ती है, यहां मिड-डे मील अफ़सर खा जाते हैं और सारी इमानदारी सड़कों के गढ्ढों में लुड़क जाती है. ऐसे में आप अकेले इमानदारी की मशाल कब तक जलाए रख सकते हैं. ज़रूरत है एक-जुट होने की नाकि एक दूसरे पर टूटने की.
किसी इन्सान की अच्छाई या बुरायी को कैसे आंका जाता है? उसके काम से, उसके पिछले कर्मों से या उसके सामाजिक जीवन की उप्लब्धियों से. रालेगांव सिद्धि की कामयाबी में अन्ना की लगन को लोग याद नहीं करना चाहते ना करें, 1990 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण पाने में भी गड़बड़ी देखते हैं तो भी ठीक है, उनके अनशनों के सबब आज तक 4 से 5 मंत्रियों को मंत्रीपद से हटाया जा चुका है वो भी लोग चाहें तो नकार सकते हैं. सूचना के अधिकार कानून में भी उनके योगदान को भुलाना चाहते हैं तो भुला दें. पर क्या मेग्सेसे पुरुस्कार पाने वाले, आरटीआई के मूवमेंट में अहम भूमिका निभाने वाले और टाटा स्टील में अपनी नौकरी छोड़ कर समाज के लिए काम करने वाले अरविन्द केजरीवाल को भी शक की नज़र से ही देखेंगे. या दिल्ली पुलिस में जान फूंकने वाली, सैंकड़ों पुरस्कार पाने वाली और हमेशा सही और सटीक बात कहने-करने वाली किरन बेदी को भी अगर शक्की निगाहों से देखेंगे तो बस एक ही बात कही जा सकती है. मेरी मां हमेशा कहती है ’जिसका खुद का इमान कमज़ोर होता है वो हर किसी पर शक करता है’.
फिर तनहाई
उनके पास कारवां था , उनके पास हुजूम था ,
उनके पास भीड़ थी , मेरे पास तनहाई थी .......
उनके पल औरोंके थे , मेरे पास सिर्फ मेरा वक्त था ....
मैं खुद के साथ थी तभी मैं तनहा ना थी तनहाईके आलममें भी ...
हर कोई मेरे दिल को झख्म देकर जाता रहा ,
मैं सहती रही क्योंकि उसे अपना माना था मैंने ,
मैं सहती रही क्योंकि उनका साथ देने का वायदा किया था मैंने ,
फिर भी झख्म जब नासूर की शक्ल इख्तियार करने लगा ,
मैंने अपने दिल को समजा लिया ,
गम किसीसे बांटकर तकलीफ कम नहीं होती कभी ,
बस ये तो सिर्फ दिल को हल्का करने का बहाना होता है ...
देख सड़क पर उस अजनबी को जो तेरा कोई नहीं ,
उससे कोई तुझे तकलीफ नहीं या झख्म खाने का डर ....
बस जो तेरे इर्दगिर्द घेरे है उन्हें उसी अजनबी सा समज ले ,
बस इस भीड़ में खुद को तनहा ही कर ले ...
बस सुकून ....
दूर दूर तक सुकून .....
बहुत जी लिए तुमने इस जिंदगीको औरोंकी ख़ुशी की खातिर ,
अब आजमा भी ले की उन्हें तेरी परवाह है कितनी ???
या है भी या नहीं ????
दिलों की नई कहानी – भाग 1
चलिए प्यार क्या है कैसे होता है, क्यूं होता है इस सब के बारें में तो यहां सभी लिख रहे है पर प्यार में कैसे कैसे दौराहे आ जाते है उसको में अपनी कहानियों से दर्शाने की कोशिश कर रहा हूं.
कहानी निशा की है. एक सीधी साधी लड़की जिसकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव है. उसके पिता कार चलाते है जो की ट्रांस्पोर्ट के काम में लगी हुई है. घर आराम से चलता है. 12वीं पास करने के बाद निशा एक जगह जॉब करने लगती है. घर वालों के मना करने के बावजूद भी वह सेल्फ रिस्पेक्ट के लिए ऐसा करती है. इसी दौरान उसे अपने मोहल्ले में रहने वाले ललित से प्यार हो जाता है. प्यार उसकी जिंदगी में सपनों का नया मुकाम लेकर आता है. ललित और निशा चोरी चोरी अपने प्यार को आगे बढ़ाते है. ललित कॉलेज जाता है तो निशा बालकनी में आकर उसे निहारते हुए निगाहों से टाटा बाए बाए कहती है और शाम को जब निशा ऑफिस सॆ आती है तो मोहल्ले के गेट पर ललित अपनी निगाहे बिछा उसका स्वागत करता है.
इसी तरह दोनों का प्यार सबकी नजरों से छुपछुपा कर आगे बढ़ता है. उनका प्यार जमाने के प्यार की तरह नहीं होता. उनके बीच सिर्फ प्यारी बातें होती है और मिलने की इच्छा दिल के कोने में होती है. कभी कभार अकेले मिल भी जाएं तो दोनों अपनी सीमाओं में ही रहते है. ऐसे में एक दिन ललित की बहन की शादी होती है. निशा पहली बार साड़ी पहनती है जिसे देख ललित का दिल बहुत हिचकौले खाने लगता है.
घर से भागकर शादी करने का भी विचार दोनों के दिमाग में आता है पर दोनों अपने दिलों के गेट पर ताले लगा कर जिन्दगी में सफर में आगे बढ़ने का सोचते है. ललित की शादी हो जाती है और निशा अपनी जॉब में दिल लगाकर काम करने लगती है. पर दिल जब एक बार किसी से लग जाता है तो उसे छोड़्ना नामुमकिन हो जाता है. शादी के कुछ दिनों बाद ही ललित दुबारा निशा से बात करने लगता है. निशा को भी इसमें बुरा नहीं लगता. उसे तो बस प्यार से मतलब हैं.
अनुसूया/Anusuya
अनुसूया अत्रि-ऋषि की पत्नी हैं। उनकी पति-भक्ति अर्थात् सतीत्व का तेज इतना अधिक था कि उसके कारण आकाशमार्ग से जाते देवों को उनके प्रताप का अनुभव होता था। इसी कारण उन्हें 'सती अनुसूया' भी कहा जाता हे। एक बार ब्रह्म, विष्णु और महेश ने उनके सतीत्व की परख करने की सोची, जो कि अपने आप में एक रोचक कथा है।
नारद जी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के पास पहुँचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया. इस पर त्रिदेवियों के मन में अनुसूया के प्रति ईर्ष्या पैदा हो गई। उन देवियों ने अनुसूया के पातिव्रत्य को नष्ट करने के लिए अपने पतियों को उनके पास भेजा।ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर यतियों के वेष धर कर अत्रि के आश्रम में पहुँचे और ‘‘भवतु भिक्षां देहि'' कह कर द्वार पर खड़े हो गये। उस समय तक अत्रि महामुनि अपनी तपस्या समाप्त कर आश्रम को लौटे न थे। वे अतिथि-सत्कार की जिम्मेदारी अनुसूया पर छोड़ गये थे। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। उस समय कपट यति एक स्वर में बोले, ‘‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है। तुम नग्न होकर परोसोगी, तभी जाकर हम भोजन करेंगे।''
अनुसूया ने ‘ओह, ऐसी बात है' यह कहते हुए उन पर जल छिड़क दिया। इस पर तीनों अतिथि तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल गये। अनुसूया के हृदय में वात्सल्य भाव उमड़ पड़ा। शिशुओं को दूध-भात खिलाया। त्रिमूर्ति शिशु रूप में अनुसूया की गोद में सो गये। अनुसूया तीनों को झूले में सुला कर बोली-‘‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गये, मेरे भाग्य को क्या कहा जाये। ब्रह्माण्ड ही इनका झूला है। चार वेद उस झूले के पलड़े की जंजीरें हैं। ओंकार प्रणवनाद ही इन के लिए लोरी है।'' यों वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी।
उसी समय कहीं से एक सफ़ेद बैल आश्रम में पहुँचा, और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर फुर्र से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुँचे। नारद अनुसूया से बोले- ‘‘माताजी, अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियाँ यहाँ पर आ गई हैं। ये अपने पतियों के वियोग के दुख से तड़प रही हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।''
अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘‘माताओ, उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।'' तीनों देवियों ने चकित होकर देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गाढ़ी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं, तब नारद ने उनसे पूछा-‘‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? आप लजाइये नहीं, जल्दी गोद में उठा लीजिये।'' देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया।
वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खडे हो गये। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियाँ शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इस तरह सटकर खड़े हो गये, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गये हों।
उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आये। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे । कालांतर में त्रिमूर्तियों के अंश से अत्रि के तीन पुत्र हुए - सोम (ब्रह्मा), दत्तात्रेय (विष्णु) और दुर्वासा (शिव)। कहीं कहीं दत्तात्रेय को त्रिमूर्तियों का समुच्चय रूप भी कहा गया है।
रानी लक्ष्मीबाई/ Lakshmibai
बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएँ लिखीं। यहाँ की ललनाएँ भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं। इन्हीं में से एक नाम है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई।
19 नवंबर, 1835 ई. के दिन काशी में मोरोपन्त जी की पत्नी भागीरथी बाई ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री का नाम मणिकार्णिक रखा गया परन्तु प्यार से मनु पुकारा जाता था। मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। मनु के पिता मोरोपन्त जी मराठा पेशवा बाजीराव की सेवा में थे। चूँकि घर में मनु की देखाभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए जहाँ चञ्चल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया। लोग उसे प्यार से "छबीली" बुलाने लगे।
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्प अवस्था में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।
समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। झाँसी के राजा गंगाधार राव के साथ मनु का विवाह बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई।
रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने किले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की।
राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से अतीव प्रसन्न थे।
रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा कर एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया।
कुछ समय पश्चात् रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। शोकाकुल राजा गंगाधर राव भी बीमार रहने लगे एवं मृतप्राय हो गये। दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पाँच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। गोद लेने के दूसरे दिन ही राजा गंगाधर राव की दु:खद मृत्यु हो गयी।
इसी के साथ रानी पर शोक का पहाड़ टूट पड़ा। झाँसी का प्रत्येक व्यक्ति रानी के दु:ख से शोकाकुल हो गया।
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसलिए झाँसी पर अब अंग्रेजों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेजों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। किले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी का सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।
रानी के किले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज सेनापित ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेजों ने किले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।
अंग्रेज आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम साँस तक किले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना किले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।
घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उदघोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेजों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेजों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज सैनिक उनके समीप आ गए।
रानी ने पुन: अपना घोड़ा दौड़ाया। दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज घुड़सवार वहां आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार गौस खाँ अब भी रानी के साथ था। उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।
स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही बाबा गंगादास की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।
रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह १८ जून १८५९ का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं -
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थीं।।
मीरा
मीराबाई कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। उनका जन्म १५०४ ईस्वी में जोधपुर के ग्राम कुड्की में हुआ था। उनके पिता का नाम रत्नसिंह था। उनके पति कुंवर भोजराज उदयपुर के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हे पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु मीरां इसके लिये तैयार नही हुई . वे संसार की ओर से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। कुछ समय बाद उन्होंने घर का त्याग कर दिया और तीर्थाटन को निकल गईं। वे बहुत दिनों तक वृंदावन में रहीं और फिर द्वारिका चली गईं। जहाँ संवत १५६० ईस्वी में उनका देहांत हुआ।
मीराबाई ने कृष्ण-भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है। जीवन परिचय
कृष्णभक्ति शाखा की हिंदी की महान कवयित्री मीराबाई का जन्म संवत् १५७३ में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में हुआ था। इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं विवाह के थोड़े ही दिन के बाद आपके पति का स्वर्गवास हो गया था। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन- प्रति- दिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं।
आनंद का माहौल तो तब बना, जब मीरा के कहने पर राजा महल में ही कृष्ण मंदिर बनवा देते हैं। महल में भक्ति का ऐसा वातावरण बनता है कि वहां साधु-संतों का आना-जाना शुरू हो जाता है। मीरा के देवर राणा जी को यह बुरा लगता है। ऊधा जी भी समझाते हैं, लेकिन मीरा दीन-दुनिया भूल कृष्ण में रमती जाती हैं और वैराग्य धारण कर जोगिया बन जाती हैं प्रचलित कथा के अनुसार मीरां वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन के लिये गईं। गोस्वामी जी सच्चे साधु होने के कारण स्त्रियों को देखना भी अनुचित समझते थे। उन्होंने अन्दर से ही कहला भेजा कि हम स्त्रियों से नहीं मिलते, इस पर मीरां बाई का उत्तर बडा मार्मिक था। उन्होने कहा कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं, यहां आकर जाना कि उनका एक और प्रतिद्वन्द्वी पैदा हो गया है। मीरां का ऐसा मधुर और मार्मिक उत्तर सुन कर जीव गोस्वामी नंगे पैर बाहर निकल आए और बडे प्रेम से उनसे मिले। इस कथा का उल्लेख सर्वप्रथम प्रियादास के कवित्तों में मिलता है - 'वृन्दावन आई जीव गुसाई जू सो मिल झिली, तिया मुख देखबे का पन लै छुटायौ
मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग आपको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को पत्र लिखा था :-
स्वस्ति
श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई। बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।। घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई। साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।। मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई। हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।
मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-
जाके प्रिय न राम बैदेही। सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।। नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ। अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।
रचित ग्रंथ
मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की–
* बरसी का मायरा
* गीत गोविंद टीका
* राग गोविंद
* राग सोरठ के पद
इसके अलावा मीराबाई के गीतों का संकलन “मीराबाई की पदावली’ नामक ग्रन्थ में किया गया है।
मीराबाई की भक्ति
मीरा की भक्ति में माधुर्य- भाव काफी हद तक पाया जाता था। वह अपने इष्टदेव कृष्ण की भावना प्रियतम या पति के रुप में करती थी। उनका मानना था कि इस संसार में कृष्ण के अलावा कोई पुरुष है ही नहीं। कृष्ण के रुप की दीवानी थी–
बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरति, साँवरि, सुरति नैना बने विसाल।।
अधर सुधारस मुरली बाजति, उर बैजंती माल।
क्षुद्र घंटिका कटि- तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल।।
मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं - गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी। इन्होंने अपने बहुत से पदों की रचना राजस्थानी मिश्रित भाषा में ही है। इसके अलावा कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में भी लिखा है। इन्होंने जन्मजात कवियित्री न होने के बावजूद भक्ति की भावना में कवियित्री के रुप में प्रसिद्धि प्रदान की। मीरा के विरह गीतों में समकालीन कवियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविकता पाई जाती है। इन्होंने अपने पदों में श्रृंगार और शांत रस का प्रयोग विशेष रुप से किया है। इनके एक पद –
मन रे पासि हरि के चरन।
सुभग सीतल कमल- कोमल त्रिविध - ज्वाला- हरन।
जो चरन प्रह्मलाद परसे इंद्र- पद्वी- हान।।
जिन चरन ध्रुव अटल कींन्हों राखि अपनी सरन।
जिन चरन ब्राह्मांड मेंथ्यों नखसिखौ श्री भरन।।
जिन चरन प्रभु परस लनिहों तरी गौतम धरनि।
जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन।।
दास मीरा लाल गिरधर आजम तारन तरन।।
गार्गी/Gargi
गर्गवंश में वचक्नु नामक महर्षि थे जिनकी पुत्री का नाम वाचकन्वी गार्गी था। बृहदारण्यक उपनिषद् में इनका ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ बडा ही सुन्दर शास्त्रार्थ आता है।
एक बार महाराज जनक ने श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी की परीक्षा लेने के लिए एक सभा का आयोजन किया। राजा जनक ने सभा को संबोधित करके कहा: "हे महाज्ञानीयों, यह मेरा सौभाग्य है कि आप सब आज यहाँ पधारे हैं। मैंने यहाँ पर १००० गायों को रखा है जिन पर सोने की मुहरें जडित है। आप में से जो श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी हो वह इन सब गायों को ले जा सकता है।" निर्णय लेना अति दुविधाजनक था, क्योंकि अगर कोई ज्ञानी अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी माने तो वह ज्ञानी कैसे कहलाये?
तब ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से कहा: "हे शिष्यों! इन गायों को हमारे आश्रम की और हाँक ले चलो।" इतना सुनते ही सब ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्य ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी उपस्थित थी।
याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने के लिए गार्गी उठीं और पूछा "हे ऋषिवर! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं?"
याज्ञवल्क्य बोले, "माँ! मैं स्वयं को ज्ञानी नही मानता परन्तु इन गायों को देख मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है।" गार्गी ने कहा "आप को मोह हुआ, यह इनाम प्राप्त करने के लिए योग्य कारण नही है। आप को यह साबित करना होगा कि आप इस इनाम के योग्य हैं। अगर सर्व सम्मति हो तो में आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी, अगर आप इनके संतोषजनक जवाब प्रदान करें तो आप इस इनाम के अधिकारी होंगे।"
गार्गी का पहला सवाल बहुत ही सरल था। परन्तु उन्होंने अन्तत: याज्ञवल्क्य को ऐसा उलझा दिया कि वे क्रुध्द हो गए। गार्गी ने पूछा था, हे ऋषिवर! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल किसमें जाकर मिल जाता है?
अपने समय के उस सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवक्ल्य ने आराम से और ठीक ही कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है। फिर गार्गी ने पूछ लिया कि वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में। पर गार्गी तो अदम्य थी वह भला कहां रुक सकती थी? वह याज्ञवल्क्य के हर उत्तर को प्रश्न में तब्दील करती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और ब्रह्म लोक तक जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने फिर वही सवाल पूछ लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है? इस पर गार्गी को लगभग डांटते हुए याज्ञवक्ल्य ने कहा-’गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ यानी गार्गी, इतने सवाल मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा भेजा ही फट जाए।
गार्गी का सवाल वास्तव में सृष्टि के रहस्य के बारे में था। अगर याज्ञवल्क्य उसे ठीक तरह से समझा देते तो उन्हें इस विदुषी दार्शनिका को डांटना न पड़ता। पर गार्गी चूंकि अच्छी वक्ता थी और अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप हो जाना है, तो याज्ञवल्क्य की यह बात सुनकर वह परमहंस चुप हो गई।
पर अपने दूसरे सवाल में गार्गी ने दूसरा कमाल दिखा दिया। उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी से यानी याज्ञवल्क्य से दो सवाल पूछने थे तो उसने बड़ी ही शानदार भूमिका बांधी। गार्गी बोली, "ऋषिवर सुनो। जिस प्रकार काशी या विदेह का राजा अपने धनुष पर डोरी चढ़ाकर, एक साथ दो अचूक बाणों को धनुष पर चढ़ाकर अपने दुश्मन पर सन्धान करता है, वैसे ही मैं आपसे दो प्रश्न पूछती हूँ।" यानी गार्गी बड़े ही आक्रामक मूड में थी और उसके सवाल बहुत तीखे थे।
याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘पृच्छ गार्गी’ हे गार्गी, पूछो। गार्गी ने पूछा: " स्वर्गलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है और इन दोनों के मध्य जो कुछ भी है; और जो हो चुका है और जो अभी होना है, ये दोनों किसमें ओतप्रोत हैं?"
पहला सवाल स्पेस के बारे में है तो दूसरा टाइम के बारे में है। स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो सवालों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है? याज्ञवल्क्य बोले, ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ यानी कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है। गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षरतत्व के! इस बार याज्ञवल्क्य नें अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया। वें अन्तत: बोले, गार्गी इस अक्षर तत्व को जाने बिना यज्ञ और तप सब बेकार है। अगर कोई इस रहस्य को जाने बिना मर जाए तो समझो कि वह कृष्ण है। और ब्राह्मण वही है जो इस रहस्य को जानकर ही इस लोक से विदा होता है।
इस बार गार्गी भी मुग्ध थी। अपने सवालों के जवाब से वह इतनी प्रभावित हुई कि महाराज जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया। इतने तीखे सवाल पूछने के बाद गार्गी ने जिस तरह याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो उसने वाचक्नवी होने का एक और गुण भी दिखा दिया कि उसमें अहंकार का नामोंनिशान नहीं था। गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और सभा से विदा ली।
याज्ञवल्क्य विजेता थे- गायों का धन अब उनका था। याज्ञवल्क्य ने नम्रता से राजा जनक को कहा: "राजन! यह धन प्राप्त कर मेरा मोह नष्ट हुआ है। यह धन ब्रह्म का है और ब्रह्म के उपयोग में लाया जाए यह मेरी नम्र विनती है।" इस प्रकार राजा जनक की सभा के द्वारा सभी ज्ञानीओं को एक महान पाठ और श्रेष्ठ विचारों की प्राप्ति हुई।
ऐसी थी गार्गी वाचक्नवी, देश की विशिष्टतम दार्शनिक और युगप्रवर्तक।
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