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विजयदशमी की शुभकामनाएँ


छाया था आतंक हर तरफ़ रावण का साया था
जिसकी काली करतूतों ने सबको भरमाया था

अपने मद में चूर भंग अनुशासन करता था
उड़ता था आकाश दूसरों पर शासन करता था

मनमानी में भूल गया अन्याय न्याय की रेखा
सीता को हर ले जाने का परिणाम ना देखा

सोचा नहीं राम से भिड़ना जीवन घातक होगा
अहंकार जिस बल पर उसका खुद ही नाशक होगा

घटा महासंग्राम युद्ध में रावण का संहार हुआ
हुई अधर्म की हार धर्म का स्थापित संसार हुआ

सच है जग में अंत बुराई का एक दिन होना है
सच्चाई पर चलने वाला राम विजित होना है

हर विजयादशमी के दिन एक रावण जल जाता है
हर दशहरे पर राम विजय का हर्ष उभर आता है

यही कामना रावण का हो अंत राम की विजय
करें सभी जयघोष - सियावर रामचंद्र की जय!

भरे पटाखे रावण में











भरे पटाखे रावण में
लगी भीड़ चंपारण में

हल्ला गुल्ला धूम धड़ाका
मेला ठेला खूब जमा था

रामचंद्र ने छोड़ा तीर
रावण जला महा गंभीर

1मना दशहरे का त्योहार
सच की जीत दुष्ट की हार


दशहरे का मेला






मौसम बदल रहा था और हल्की-हल्की ठंड पड़ने लगी थी। इसी बीच न जाने कैसे छोटू बीमार पड़ गया। मुहल्ले के सारे बच्चों में उदासी छा गई। सबका दादा और शरारतों की जड़ छोटू अगर बिस्तर में हो तो दशहरे की चहलपहल का मज़ा तो वैसे ही कम हो जाता। ऊपर से अबकी बार मम्मियों को न जाने क्या हो गया था।


रमा आंटी ने कहा कि अबकी बार मेले में खर्च करने के लिए बीस रूपए से ज़्यादा नहीं मिलेंगे, तो सारी की सारी मम्मियों ने बीस रूपए ही मेले का रेट बाँध दिया। मेला न हुआ, आया का इनाम हो गया। बीस रूपए में भला कहीं मेला देखा जा सकता था? यही सब सोचते-सोचते हेमंत धीरे-धीरे जूते पहन रहा था कि नीचे से कंचू ने पुकारा -
'हेमंत, हेमंत चौक नहीं चलना है क्या?' हेमंत और सोनू भागते हुए नीचे उतरे और जल्दी से मोटर की ओर भागे जहाँ बैठा हुआ स्टैकू पहले ही उनका इंतज़ार कर रहा था।

दुर्गापूजा की छुटि्टयाँ हो गई थी। मामा जी के घर के सामने वाले पार्क में हर शाम को ड्रामा होता था। हेमंत, कंचू और सोनू इन छुटि्टयों में शाम को मामा जी के यहाँ जाते थे, जहाँ वे ममेरे भाई स्टैकू के साथ ड्रामा देखते, घूमते फिरते और मनोरंजन करते।

हर बार सबके नए कपड़े सिलते और घर भर में हंगामा मचा रहता। अबकी बार कंचू ने गुलाबी रंग की रेशमी फ्राक सिलाई थी और ऊँची एड़ी की चप्पलें ख़रीदी थीं। आशू और स्टैकू मिलकर बार-बार उसकी इस अलबेली सजधज के लिए उसे चिढ़ा देते।

उधम और शरारतों की तो कुछ बात ही मत पूछो जब सारे भाई बहन इकठ्ठे होते तो इतना हल्ला-गुल्ला मचता कि गर्मी की छुटि्टयों की रौनक भी हल्की पड़ जाती। इस साल भी बच्चों का वही नियम शुरू हो गया था। शाम को वे लोग शहर में लगी रंगीन बत्तियों की रौनक देखते हुए चौक पहुँचे और घर में घुसते ही खाने की मेज पर जम गए। मामी ने खाने का ज़बरदस्त इंतज़ाम किया था। आशू के पसंद की टिक्कियाँ, कंचू की पसंद के आलू और स्टैकू की पसंद की गर्मागर्म चिवड़े-मूँगफली की खुशबू घर में भरी थी। रवि की पसंद के सफ़ेद रसगुल्ले मेज़ पर आए तो सबको रवि की याद आ गई।
'रवि ओ रवि, नाश्ता करने आओ'
मामी ने ज़ोर से आवाज़ दी।
"आया माँ" रवि की आवाज़ सबसे ऊपर वाले कमरे से आई।
"अरे ये रवि ऊपर क्या कर रहा है? कंचू ने अचरज से पूछा।

मामी ने बताया कि अबकी बार नाटक में उसने भी भाग लिया है इसलिए वो ऊपर कार्यक्रम की तैयारी और रिहर्सल में लगा हुआ है।

थोड़ी देर में पूरा मेकअप लगाए हुए टींकू नीचे उतरा तो सभी उसे देखकर खिलखिला कर हँस दिए। टींकू ने शरमा कर मुँह फेर लिया। "हमें अपने नाटक में नहीं बुलाओगे" हेमंत ने पूछा।

"तो क्या तुम्हें हमारे नाटक के टिकट नहीं मिले? " रवि ने अचरज से कहा, "टिकट तो सारे स्टैकू के पास थे।"

"अरे हाँ जल्दी-जल्दी में टिकट मैं तुम्हें देना भूल गया, "स्टैकू ने गिनकर तीन टिकट आशु, सोनू और कंचू के लिए निकाले। सोनू ने पूछा, "बिना टिकट नाटक देखना मना है क्या?" रवि ने कहा "मना तो नहीं है लेकिन कुर्सियाँ हमने टिकट के हिसाब से लगाई हैं।

"अरे तुम लोगों का अभी तक नाश्ता नहीं ख़त्म हुआ, देखो, रामदल के बाजे सुनाई पड़ने लगे। नाश्ता ख़त्म करे बिना घूमने को नहीं मिलेगा। फिर रात के बारह बजे तक तुम लोगों का कोई अतापता नहीं मिलता।" मामी ने रसोई में से ही चिल्लाकर कहा।

जल्दी-जल्दी खा-पीकर वे सब ऊपर के छज्जे पर आ गए। मामा जी ने दल पर फेंकने के लिए ढेर-सी फूलों की डालियाँ ख़रीद ली थी। उन्होंने राम लक्ष्मण पर डालियाँ फेंकी, रामदल का मज़ा लिया और नीचे आ गए। पार्क में पहुँचे तो नाटक शुरू ही होने वाला था। सबने अपनी-अपनी कुर्सियाँ घेर ली। थोड़ी देर में दर्शकों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि पूरा पार्क भर गया। कुर्सियों के आसपास खड़े लोग कुर्सियों पर गिरे पड़ते थे, मानो तिल रखने को भी जगह नहीं थीं। इस सबसे घबराकर सोनू घर चलने की ज़िद करने लगा। थोड़ी देर तो वे लोग वहाँ बैठे पर जब उसने अधिक ज़िद की तो वे उठे और भीड़ में से किसी तरह रास्ता बनाते गिरते पड़ते सड़क पर आ गए।

खोमचे वाले हर जगह जमे हुए थे। चूरन, भेलपूड़ी, चाट, आइस्क्रीम और मूँगफली, सबने अपनी छोटी-छोटी ढेर-सी दुकाने खोल ली थीं। मिठाइयों और खिलौनों की भी भरमार थी। सड़क पर खूब हलचल थी और लाउड़स्पीकरों पर ज़ोर-ज़ोर से बजते हुए गाने कान फाड़े डालते थे।

आशू ने एक मूँगफली वाले से मुँगफली ख़रीद कर अपनी सारी जेबें भर लीं और सभी बच्चों ने अपने पसंद की चीज़ें ख़रीदीं। वे घर लौट कर आए तो मामा जी ने कहा, "अब तुम सब कार में बैठो, मैं तुम्हें घर छोड़ आऊँ?"

सिर्फ़ आइस्क्रीम और मूँगफल्ली में ही पंद्रह रुपए खर्च हो गए। फिर बीस रुपए में मेला कैसे देखा जाएगा। मामा जी ने हेमंत को उदास देखकर पूछा, "हेमंत बेटे, तुम्हें रोशनी और नाटक देखकर अच्छा नहीं लगा क्या? इतने उदास क्यों हो?''

सोनू और कंचू बोले, "मामा जी सिर्फ़ हेमंत ही नहीं, हम सभी बच्चे बहुत उदास हैं। एक तो छोटू को बुखार होने के कारण इस बार दशहरे पर हम अपनी फाइवस्टार सर्कस नहीं कर पा रहे हैं, दूसरे हम सबको मेले के लिए अबकी बार सिर्फ़ बीस रुपए मिलेंगे। इतने में मेला कैसे देखा जा सकता है?"

मामाजी मुस्करा कर बोले, "मेले में तुम्हें मिठाइयाँ ही ख़रीदनी होती हैं न? चलो भाई, अबकी बार मिठाई हम ख़रीद देंगे। बीस रुपए जमा करके तुम पुस्तकालय के सदस्य बन जाओ और नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ो तो साल भर तुम्हारा ज्ञान भी बढ़ेगा और मनोरंजन भी होगा।"

सोनू ने पूछा, "तो मामा जी, पुस्तकालय में कॉमिक्स भी मिलती हैं क्या?"
"हाँ, हाँ, सब तरह की किताबें होती हैं वहाँ। कॉमिक्स से लेकर विज्ञान तक हर विषय की। कल सुबह तैयार रहना, तो तुम्हें पुस्तकालय दिखा लाऊँगा।

बच्चे घर लौटे तो मेले की मिठाइयाँ भूलकर पुस्तकालय की बातें करने लगे। सामने दुर्गा जी के मंदिर में अष्टमी की आरती के घंटे बजने शुरू हुए तो दादी जी ने याद दिलाया, "आरती लेने नहीं चलोगे क्या?" यह पुकार सुन सभी बच्चे दादी जी के साथ आरती लेने चल दिए।

नेपाल का दशहरा













विजयादशमी का पर्व संसार के विभिन्न देशों में विभिन्न जातियों व समुदायों द्वारा अपने-अपने विशिष्ट ढंग से मनाया जाता है। वैसे तो यह दिवस अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है, जिसका आरंभ माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार पर हुआ था और बाद में राम की रावण पर विजय को दशहरे का रूप दे दिया गया, लेकिन यह पर्व मुख्यत: क्षत्रिय पर्व ही माना जाता है। तभी तो गोरखा या नेपाली समाज इसे बहुत ही उल्लासपूर्वक मनाते हैं।

नेपाल में विजयादशमी (टीका) के आगमन की भनक के साथ ही एक पारंपारिक गीत सुनाई पड़ने लगता है -
'दशैं आयो, खाऊंला-पिऊंला।
कहाँ वाट ल्याऊंला? चोरेर ल्याऊंला।
धत पाजी, पर जा!'
अर्थात दशमी आ गई, खाऊँगा-पीऊँगा, पर कहाँ से लाऊँगा? कहीं से चोरी कर ले आऊँगा। धत पाजी, तू दूर जा यानी चोरी करना पाप है। अंतिम पंक्ति नेपाली लोगों की ईमानदारी ज़ाहिर होती है, जो भूखे को चोरी करने से रोकती है।

बच्चों का गीत

नेपाल में दशमी आने के पहले माताएँ-दादियाँ बच्चों को गोद में बिठाकर उनकी छोटी-छोटी पाँचों अँगुलियाँ अपने हाथों में लेकर एक-एक अँगुली पकड़कर यह गीत सिखाती हैं। पहले कानी अँगुली पकड़कर कहेंगी -दशैं आयो। फिर उसके बाद वाली (अनामिका) अँगुली पर खाऊँला-पिऊँला, मध्यमा अंगुली- कहाँ बाट ल्याऊँला? उसके बाद तर्जनी यानी चोर अँगुली कहेगी- चोरेर ल्याऊँला। इस पर अँगूठा दूर हटता हुआ कहेगा - धत पाजी, पर जा!

दशहरा आते ही नेपाल के घर-घर में चहल-पहल शुरू हो जाती है। नेपाली दशमी के आगमन का आभास नागपंचमी से ही हो जाता है। दशमी ऐसे ही नहीं आती। नागपंचमी से लेकर और भी कई त्योहार उसे पास खींच लाते हैं - जैसे

त्योहारों का राजा विजयादशमी

होली या फाग का नेपाली जनजीवन में ज़्यादा महत्व नहीं है। दशमी त्योहारों का राजा है और अन्य त्योहार इसके दरबारी! अन्य त्योहार आते हैं तो मनाए जाते हैं, उन अवसरों पर कोई ख़ास तैयारी नहीं होती, लेकिन दशमी को बुलाया जाता है और इसके स्वागत की तैयारी धूमधाम से होती है। ग़रीब सीमित ढंग से और अमीर असीमित ढंग से, लेकिन है यह सबका त्योहार। इस अवसर पर मदिरा का भोग लगाना ज़रूरी होता है और बलि भी दी जाती है। घर में आनेवालों को 'भुट्नबजी' (भुना हुआ गोश्त, चिवड़ा) के साथ चावल का 'ऐला'(ठर्रा) पेश करने की परंपरा है।

सेनाएँ और कालरात्रि

नेपाल या गोरखा सेनाएँ बहुत ही अद्भुत ढंग से दशहरा मनाती हैं। वहाँ माँ काली तथा माँ दुर्गा की पूजा नौ दिनों तक की जाती है। नवरात्रि के प्रथम दिन विशाल मैदान में विशेष रूप से निर्मित पूजा-गृह में जौ की बिजाई के पश्चात माँ दुर्गा की मूर्ति के सामने पाँच फलों, जिनमें पेठा विशेष होता है, की बलि दी जाती है। इसके आठवे दिन कालरात्रि का आयोजन होता है। मध्य रात्रि में बारह बजे बैंड, शंख, नगाड़े आदि कालरात्रि के आगमन की सूचना देते हैं जो पशु-बलि के लिए निर्धारित समय के द्योतक हैं। कालरात्रि को पाँच फलों की बलि के पश्चात पशु बलि दी जाती है। शांति के संदेश के लिए कबूतरों को आकाश में भी छोड़ा जाता है। महिषासुर के प्रतीक एक हट्टे-कट्टे भैंसे की बलि के साथ यह समारोह चरमावस्था पर पहुँचता है। इस प्रकार विजयादशमी शस्त्रपूजा या महाबलिदान के रूप में मनाई जाती है।

पर्व की एकरूपता

नेपाल में ही नहीं, नेपाली या गोरखे संसार में कहीं भी हों, दशहरा समान रूप से मनाते हैं। नेपाल में ख़ासकर काठमांडु में इसका रूप कुछ और भव्य हो जाता है राजकीय समारोहों से। जनता में लोकप्रिय होने के लिए शाहवंश के राजाओं ने काठमांडु की कई धार्मिक परंपराओं को अपना लिया है और ये परंपराएँ जनजीवन, देश की सांस्कृतिक धरोहर का एक मुख्य अंग बन गई हैं जैसे कुमारी जात्रा, खडग पूजन, कोतबलि, टीका आदि। वहाँ पर किसी धार्मिक समारोह में वह राजा नहीं रह जाता। रहेगा भी तो कुछ दिन, कुछ मास या कुछ साल। स्थायी नहीं रह सकता। कुमारी देवी का टीका राजगद्दी का नवीनीकरण है। हर वर्ष करना ही होगा। उसी प्रकार टीका (विजयादशमी) वाले दिन राज दरबार में राजा प्रजा को अबीर, चावल, दही का टीका लगाते हैं। कोई ज़रूरी नहीं है कि सब काम छोड़कर आप पहले राजा से टीका लगवाने जाएँ। आपको जब भी अवकाश मिले, आप जाएँ। राजा बैठे रहते हैं, लोग आते रहते हैं। नेपाली जनजीवन का यह दर्शन खुलकर दशहरे में सामने आता है। खाओ, पीओ, जीओ! बस, और कुछ नहीं। कितनी साधारण-सी बात हर साल तुतलाते बच्चों को सिखाई जाती है, लय में - दशैं आयो, खाऊँला-पिऊँला और यह नेपाल में 'सांस्कृतिक ध्वनि' बन गई है। निरंतर प्रतिध्वनित होती है। तब तक प्रतिध्वनित होती रहेगी, जब तक आज का भौतिकवाद नेपाल में विद्यमान धार्मिक परंपराओं को स्मृति शेष न बना दें।

बंगाल की दुर्गापूजा









शरद ऋतु के आते ही हल्की-हल्की ठंड के साथ शुरू हो जाती है बंगाल में ख़रीदारी की धूम, दुर्गा महोत्सव की तैयारी। दुर्गा पूजा शुरू होने के कई महीने पहले से ही बाज़ार में लोगों की भीड़ और नए वस्त्राभूषण ख़रीदती महिलाओं का कलरव हर गली, हर मोड़ पर सुनाई देने लगता है।


आज महालया है। सुबह-सुबह उठ गया है सारा मुहल्ला। रेडियो पर चल रहा है चंडी पाठ और घर-घर से आ रही है आवाज़ 'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता' उनींदी आँखों से शाल ओढे घर का हर सदस्य सुन रहा है चंडी पाठ रेडियो के सामने बैठा। घर में टी.वी. होने पर भी रेडियो पर चंडी पाठ सुनने की प्रथा को तोड़ना आसान नहीं। चंडी पाठ में महिषासुरमर्दिनी की कथा एक मधुर और लयबद्ध सुर में संस्कृत और बांग्ला में मंत्रोच्चारण के साथ सुनाते हैं बीरेंद्र कृष्ण भद्र। आज वे तो जीवित नहीं मगर उनकी आवाज़ अमर है। कथा कुछ इस तरह से है -

असुर महिष ने घोर तपस्या की और ब्रह्म देव प्रसन्न हो गए। महिष ने अमरता का वरदान माँग लिया मगर ब्रह्म देव के लिए ऐसा वरदान देना संभव नहीं था तब महिषासुर ने वरदान माँगा कि अगर उसकी मृत्यु हो तो किसी औरत के हाथों। उसे विश्वास था कि निर्बल महिला उस शक्तिशाली का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ब्रह्म देव ने वरदान दे दिया और शुरू हो गया महिषासुर का उत्पात। सभी देवता उससे हार गए और इंद्र देव को भी अपना राजसिंहासन छोड़ना पड़ा। महिषासुर ने ब्राह्मणों और निरीह जनों पर अपना अत्याचार बढ़ा दिया। सारा जग त्राहि-त्राहि कर उठा और तब सभी देवों ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश दे कर देवी के रूप में एक महाशक्ति का निर्माण किया। नौ दिन और नौ रात के घमासान युद्ध के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और वो महिषासुरमर्दिनी कहलाईं। इस कथा को सुनते-सुनते चंडी पाठ के दौरान आँखों में पानी भर आना एक अदभुत मगर स्वाभाविक-सी बात है। महालया के दिन ही माँ दुर्गा की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आँखें बनाईं जाती हैं जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को भी याद करते हैं और उन्हें 'तर्पण' अर्पित करते हैं। महालया के बाद ही शुरू हो जाता है देवीपक्ष और जुट जाते हैं सब लोग त्यौहार की तैयारी में, ज़ोर-शोर से।

माना जाता है कि हर साल दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ अपने बच्चों गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ सिर्फ़ दस दिनों के लिए पीहर आती हैं। उनकी प्रतिमा की पूजा होती है सातवें, आठवें और नौवें दिन। छठें दिन या षष्ठी के दिन दुर्गा की प्रतिमा को पंडाल तक लाया जाता है। दुर्गा की प्रतिमाएँ एक महीने पहले से गढ़नी शुरू हो जाती हैं और उससे भी पहले से तैयार होने लगते हैं पंडाल। बंगाल का कुमारटुली प्रसिद्ध है दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ गढ़ने के लिए जहाँ मिट्टी से ये मूर्तियाँ बनाईं जाती हैं और विदेशों तक में भेजी जाती हैं। कलकत्ता में होने वाली दुर्गा पूजाओं में लगभग ८० प्रतिशत प्रतिमाएँ कुमारटुली से बन कर आती हैं। लकड़ी के ढांचे पर जूट और भूसा बाँध कर तैयार होता है प्रतिमा बनाने का आधार और बाद में मिट्टी के साथ धान के छिलके को मिला कर मूर्ति तैयार की जाती है। प्रतिमा की साज-सज्जा बड़ी मेहनत के साथ की जाती है जिसमें नाना प्रकार के वस्त्राभूषण उपयोग में लाए जाते हैं।

आजकल मूर्ति को सुंदर और कलात्मक बनाने के लिए न सिर्फ़ सिल्क के वस्त्र बल्कि अन्य अनेक तरह की वस्तुओं का प्रयोग होने लगा है। इसी तरह पंडाल भी न जाने कितने तरह के बनने लगे हैं। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर हो या पैरिस का ईफ़िल टावर- कलकत्ता में बाँस और कपड़े से बने ये दुर्गा पंडाल आप को धोखे में डाल सकते हैं। पंडाल को रोशनी से सजाया जाता है और सारा शहर जगमग कर उठता है। षष्ठी के दिन प्रतिमा को पंडाल में लाकर रखा जाता है और शाम को 'बोधन' के साथ दुर्गा के मुख से आवरण हटाया जाता है। महाषष्ठी के दिन घर की औरतें उपवास रखती हैं और शाम को मैदे से बनी पूरियाँ खाती हैं। उपवास तो नहीं मगर 'लुचि-तरकारी' यानि पूरी सब्ज़ी खाने के इस रस्म में घर के सभी लोग भाग लेते हैं। इस दिन नए कपड़े पहनने का रिवाज़ है और छोटे बच्चे नए कपड़े पहने हर जगह चहकते दिखाई देते हैं। पास के पंडाल में मूर्ति के दर्शन कर आना आज से शुरू होता है जो लगातार चार दिन तक चलता है।

दुर्गा पूजा के ये चार दिन। हर जगह खुशी और उल्लास। लोग हर रोज़ सुबह उपवास रख माँ दुर्गा के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करने दुर्गा पंडाल जाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। इन दिनों हर सुबह पुष्पांजलि के निर्धारित समय पर पंडाल पहुँचने के लिए घर में भागमभाग और पुष्पांजलि का कभी भी निर्धारित समय पर न हो पाना जैसे इन दिनों का हिस्सा होता है। सुबह-सुबह ही दुर्गा पंडाल में महिलाओं को लाल पाड़ की साड़ी पहने पूजा के काम में व्यस्त देखा जा सकता है। कोई महाभोग की तैयारी करती दिखाई देती हैं तो कोई फूल की माला गूँथती। लोगों की भीड़ और धूप बाती की आध्यात्मिक गंध के साथ ढाक (ढोल) की आवाज़ पूरे वातावरण को पवित्र कर देती हैं। माँ दुर्गा की आरती होती है और उसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है। दोपहर को सभी उपस्थित जनों को खिचड़ी और तरकारी का प्रसाद खिलाया जाता है। दुर्गा पूजा के इन दिनों में स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का पूरा अवसर मिलता है और हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

महाअष्टमी या नवरात्रि के आठवें दिन का अपना महत्व है। अष्टमी के दिन होती है संधिपूजा। संधिपूजा का एक निश्चित मुहूर्त होता है और उस मुहूर्त में बलि चढ़ाई जाती है। पुराने ज़माने में लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे मगर ये प्रथा अब ना के बराबर रह गई है। ज़्यादातर जगहों पर किसी फल जैसे कुम्हड़े आदि की बलि चढ़ाई जाती है। मंत्रोच्चारण के साथ १०८ जलते दीयों के बीच उस संधिक्षण की बलि के लिए लोग निर्जल उपवास रखते हैं और उन कुछ क्षणों के लिए सारा जग जैसे शांत हो जाता है। कहते हैं उस संधिक्षण में माँ के प्राण आते हैं। पूजा के नवें दिन या महानवमी को आरती भोग आदि के साथ-साथ शाम को पंडाल में तरह-तरह के कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। नवमी के दिन सुबह एक छोटी लड़की को साड़ी पहना कर सजाकर उसकी पूजा की जाती है जिसे 'कुमारी पूजा' कहते हैं। उस कुमारी पूजा को देख कर वहाँ उपस्थित हर दूसरी छोटी लड़की 'कुमारी' के भाग्य से ईर्ष्या करती है।

शाम को 'धूनुचि नाच' प्रतियोगिता में लड़के हिस्सा लेते हैं। 'धूनुचि' मिट्टी के बड़े सुराहीनुमा प्रदीप होते हैं जिनमें नारियल के छिलकों को जलाया जाता है और 'धूनो' नामक सुगंधित पदार्थ डाल कर उन प्रदीपों को हाथ में ले कर लड़के अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। एक साथ 4-5 धूनुचि ले कर और उसमें से गिरती आग के बीच नाचते ये जोशीले लड़के जैसे माँ दुर्गा को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बीच-बीच में उस गिरती आग को आसपास खड़े लोग ज़मीन पर से हटा देते हैं ताकि नाचने वाले का पाँव न पड़ जाए उन चिंगारियों पर। कभी-कभी इस मतवाले माहौल में लड़के ढाकिए से ढाक ले कर बजाने लगते हैं अपने को ज़मीन पर नहीं पाते। धूनुचि नाच के अलावा 'शंख वादन' प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें बिना साँस लिए सबसे देर तक जो शंख बजाता है उसे विजयी घोषित किया जाता है। शंख वादन प्रतियोगिता में साधारणत: महिलाएँ हिस्सा लेती हैं। अगले दिन दशमी को सुबह माँ दुर्गा की पूजा के साथ ही उन्हें मंत्रोच्चारण के साथ विसर्जित कर दिया जाता है मगर प्रतिमाओं का विसर्जन होता है शाम को जब हर प्रतिमा के साथ एक बड़ी भीड़ होती है। प्रतिमा के विसर्जन से पहले, विवाहित महिलाएँ माँ दुर्गा की प्रतिमा को सिंदूर लगाने पंडाल आती हैं और वहाँ होली की ही तरह सुहागिनें सिंदूर से खेलती हैं। माहौल कुछ ऐसा बन जाता है जैसे लाड़ली बेटी दुर्गा मायके से ससुराल जा रही हो और सभी उसे विदा करने आए हों।

विजयादशमी के दिन छोटे अपने से बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद लेते हैं और मुँह मीठा करते हैं। लोग एक दूसरे से मिलने सबके घर जाते हैं और ये प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रहती हैं। इस तरह संपूर्ण होती है दुर्गा पूजा और शुरू होता है फिर एक लंबा इंतज़ार साल भर का। कलकत्ता के अलावा भारत के अन्य प्रदेशों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी दुर्गा पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। अक्तूबर का महीना और शरद ऋतु की ठंड के आते ही जैसे मन में कहीं एक खुशी का-सा आभास होने लगता है। दुर्गा पूजा के संपूर्ण होते ही प्रतिमा के विसर्जन के बाद शांतिजल (एक तरह का पूजा का जल जो पुजारी बिल्वपत्र से सब पर छिड़कते हैं) लेने आए लोगों का नि:स्तब्ध पंडाल को देख मन का उदास हो जाना जैसे स्वाभाविक-सा जान पड़ता है। बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में चाहे राम के वनवास से आगमन पर दशहरा मनाया जाता हो या दुर्गा देवी द्वारा महिषासुर के वध को याद किया जाता हो भारतीय अपनी परिष्कृत सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में हर जगह गर्व के साथ इन परंपराओं का निर्वाह कर रहे हैं।

कुल्लू का दशहरा






कुल्लू घाटी में विजयदशमी के पर्व का परंपरा, रीतिरिवाज़, और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व है। पूरे भारतवर्ष में इस दिन रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण की प्रतिमाएँ जलाने का रिवाज़ हैं जिसमें अच्छाई की बुराई पर विजय दर्शायी जाती है। जिस दिन पूरे देश में दशहरे की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस उत्सव का ज्वार चढ़ने लगता है- रथ यात्रा की रम्यता, ख़रीदारी का उल्लास और धार्मिक परंपराओं की धूम इस ज्वार को विविधता से भर देती हैं।

कुल्लू में विजयदशमी के पर्व को इस तरह उत्सव मनाने की परंपरा राजा जगत सिंह के राज में १६३७ में हुई। फुहारी बाबा के नाम से जाने जाने वाले किशन दास नामक संत ने राजा जगत सिंह को सलाह दी कि कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा की स्थापना की जाय। उनके आदेश का पालन करते हुए जुलाई १६५१ अयोध्या से एक मूर्ति ला कर कुल्लू में रघुनाथ जी की स्थापना की गई। किंवदंती है कि राजा जगत सिंह किसी दुस्साध्य रोग से पीड़ित था। इस मूर्ति के चरणामृत सेवन से उसका रोग जाता रहा और धीरे-धीरे वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। इसके बाद राजा ने अपना जीवन और राज्य भगवान को अर्पण कर दिया। और इस तरह यहाँ दशहरे का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाने लगा। अश्विन महीने के पहले पंद्रह दिनों में राजा सभी ३६५ देवी-देवताओं को धालपुर घाटी में रघुनाथ जी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता देते हैं।

इस उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी, मनाली की हिडिंबा कुल्लू आती हैं जो राजघराने की देवी मानी जाती है। कुल्लू में प्रवेशद्वार पर राजदंड से उसका स्वागत किया जाता है और उनका राजसी ठाठ-बाट से राजमहल में प्रवेश होता है। हिडिंबा के बुलावे पर राजघराने के सब सदस्य उसका आशीर्वाद लेने आते हैं। इसके उपरांत धालपुर में हिडिंबा का प्रवेश होता है।

रथ में रघुनाथ जी की तीन इंच की प्रतिमा को उससे भी छोटी सीता तथा हिडिंबा को बड़ी सुंदरता से सजा कर रखा जाता है। पहाड़ी से माता भेखली का आदेश मिलते ही रथ यात्रा शुरू होती है। रस्सी की सहायता से रथ को इस जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है जहाँ यह रथ छह दिन तक ठहरता है। राज परिवार के सभी पुरुष सदस्य राजमहल से दशहरा मैदान की ओर धूम-धाम से रवाना हो जाते हैं।

सौ से ज़्यादा देवी-देवताओं को रंगबिरंगी सजी हुई पालकियों में बैठाया जाता है।

मंडी से कुल्लू जाने वाले हरियाली से घिरे रास्तों पर घर की बुनी सदरी और गोली टोपी से सजे पुरुषों के छोटे-छोटे जलूसों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कुछ के हाथ में दाँत की बनी गोल तुरही होती है और कुछ नगाड़ों को पीटते चलते हैं। बचे हुए लोग जब साथ में नाचते गाते हुए इस मंडली को संपूर्णता प्रदान करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे पहाड़ की घाटी के सन्नाटे में उत्सव का संगीत भर गया हो। पहाड़ के विभिन्न रास्तों से घाटी में आते हुए देवताओं के इस अनुष्ठान को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो सभी देवी-देवता स्वर्ग का द्वार खोल कर धरती पर आनंदोत्सव मनाने आ रहे हैं। जैसे-जैसे नगर नज़दीक आता है पर्व के शोर का रोमांच अपनी ऊँचाइयों को छूने लगता है। घाटी विस्तृत होने लगती है और भीड़ घनी होने लगती है।

उत्सव के छठे दिन सभी देवी-देवता इकट्ठे आ कर मिलते हैं जिसे 'मोहल्ला' कहते हैं। रघुनाथ जी के इस पड़ाव पर उनके आसपास अनगिनत रंगबिरंगी पालकियों का दृश्य बहुत ही अनूठा लेकिन लुभावना होता है। सारी रात लोगों का नाचगाना चलता है। सातवे दिन रथ को बियास नदी के किनारे ले जाया जाता है जहाँ कंटीले पेड़ को लंकादहन के रूप में जलाया जाता है। कुछ जानवरों की बलि दी जाती है। इसके बाद रथ वापस अपने स्थान पर लाया जाता है और रघुनाथ जी को रघुनाथपुर के मंदिर में पुर्नस्थापित किया जाता है। इस तरह विश्व विख्यात कुल्लू का दशहरा हर्षोल्लास के साथ संपूर्ण होता है।

धालपुर की धरती इस समय देश के कोने-कोने से आए व्यापारियों से भी भरी रहती है। प्रचार के तहत खाज़गी और राजकीय स्तर पर कई प्रदर्शनियाँ लगती हैं। रात में कला केंद्र में अंतर्राष्ट्रीय कला महोत्सव का भी आनंद लिया जाता है।

कुल्लू दशहरा घाटी में मनाए जाने वाले सभी त्यौहार और महोत्सवों का अंतिम त्यौहार है। त्योहारों की अगली शुरुआत मार्च के महीने से होती है।

असुरों की कहानियाँ






ब्रिटिश म्यूज़ियम स्थित रावण की प्रतिमा



युग-युगांतर से मर्यादा पुरुषोत्तम 'राम' के साथ उनके प्रबलतम प्रतिद्वंद्वी 'रावण' एवं लीला पुरुषोत्तम 'कृष्ण' के साथ 'कंस' का नाम भी अमर-अजर है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाश के साथ अंधकार और अमृत के साथ विष का स्मरण सहज ही हो आता है। नाम-राशियाँ एक होने पर भी 'कर्मों की विपरीतता' के कारण राम एवं रावण के व्यक्तित्वों में ज़मीन-आसमान का अंतर तो अवश्य आ गया है, किंतु एक के बिना दूसरे की सार्थकता ही जैसे नहीं लगती।




प्रतिनायक के रूप में
रामकथा के आदि महाकवि महर्षि वाल्मीकि ने अपने विश्व महाकाव्य 'रामायण ' में रावण को 'प्रतिनायक' के रूप में चित्रित किया है। इस तथ्य को दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो कह सकता हूँ कि महाकवि वाल्मीकि ने 'रावण' में मूलतः 'राम' के प्रतिरूप (ऑपोजिट सैल्यू) का ही चित्रण किया है। आदिकवि ने यदि 'राम' के चरित्र में 'शील-शक्ति सौंदर्य' की प्रतिष्ठा कराई है, तो रावण के चरित्र में भी इन्हें रक्खा है। वस्तुतः रामायण के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि ने पूर्णतः निरपेक्ष दृष्टि से नायक राम के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रतिनायक रावण का सजीव एवं तार्किक चित्रण करते हुए उसे रामभक्त महाकवि तुलसी की भाँति एक पराजित व्यक्ति की तरह उपेक्षा और घृणा का पात्र नहीं बनाया, बल्कि दुर्घर्ष संघर्ष करने वाले वीर योद्धा का रूप दिया है।

आदिकवि वाल्मीकि का रावण उद्भट वीर है, पराक्रमी योद्धा है और सर्वोपरि जिजीविषा का जीवंत रूप है। रामायण में राम-रावण का युद्ध सामान्य युद्ध नहीं है,

प्रत्युत महायुद्ध है-
''महदयुद्धं तुमुलं रोम हर्षणम'' (6 /110/16 )

रामायण के अनुसार, राम-रावण के महाभयंकर युद्ध में पृथ्वी पर 'महानाश' अवतरित हो जाता है। राम और रावण के बीच होने वाला प्रलयंकर युद्ध रावण को राम के प्रबलतम प्रतिपक्षी के रूप में लाकर खड़ा कर देता है। वाल्मीकि कहते हैं-
''गगन गगनाकारं सागर सागरोपमः!
राम रावणयोर्युद्धं राम रावणयोरिव!!''
(6/110/24)

यहाँ महाकवि ने अत्यंत भावमग्न होकर 'राम रावणयोर्युद्धं राम रावणयोरिव' कहकर मात्र 'अनन्वय अलंकार' का चमत्कार दिखाया हो, ऐसी बात कदापि नहीं, बल्कि महर्षि वाल्मीकि रावण को शक्ति संपन्नता की दृष्टि से राम के समकक्ष रखना चाहते हैं। यहाँ अपने मंतव्य के प्रमाण के रूप में मैं रावण की मृत्यु हो जाने के पश्चात विभीषण द्वारा कहलाए गए आदिकवि वाल्मीकि के सार्थक शब्द ''शस्तभृतांवर'' का उल्लेख कहना चाहूँगा, जिसके द्वारा कवि ने रावण को शौर्य एवं शक्ति का आगार बताया है।

रावणपरक दृष्टि
आदिकवि वाल्मीकि की इस निरपेक्ष कवि-दृष्टि की तुलना में भक्त कवि तुलसी दास ने राम के ब्रह्मत्व का सापेक्ष दृष्टिकोण लेकर राम के समक्ष रावण को पूर्णतः महत्वहीन पिद्दी-सा बना दिया है। सच यह है कि पूर्वाग्रह पूर्ण भक्त कवि तुलसी अनजाने ही रावण को महत्वहीन बनाते-बनाते राम को महत्वहीन बना बैठे हैं। वस्तुतः तुलसी राम के ब्रह्मत्व की महत्ता के समक्ष रावण को नगण्य चित्रित करके अपने युग को तो संभवतः ध्वनित कर गए, लेकिन आदि महाकवि वाल्मीकि की तुलना में उनकी रावणपरक दृष्टि सहज और संयत नहीं रह सकी। क्या अंगद का रावण की राज्यसभा में पाँव जमाना जैसे प्रसंग परोक्षतः राम को ही कहीं निर्बल नहीं बना जाते? प्रथम श्रेणी का सिद्ध पहलवान क्या कभी निम्न श्रेणी के छोटे पहलवान से भिड़ेगा? यदि भिड़कर जीत भी गया, तो दर्शकगण बेमेल कुश्ती कहकर हँसेंगे ही। यही स्थिति रामचरित्र मानस में राम-रावण युद्ध तक महाकवि तुलसी अनायास पैदा कर देते हैं। उनका चरित्र सहज संयत दीखता है। वाल्मीकि कहते हैं-
''एव चेतद कामांतु न त्वां स्प्रक्ष्यामि मैथिलि!
कामं कामः शरीरे में यथा कामं प्रवर्तताम!!''
(5/20/6)

रामायण की उक्त स्थिति की तुलना में भक्त कवि तुलसी रावण के शील का मूल्यांकन रामभक्त होकर ही करते हैं, तटस्थ कवि होकर नहीं कर पाते। जहाँ वाल्मीकि की दृष्टि में रावण की कामभावना रजस से शासित है, वहीं तुलसी ने उसे पूर्णतः तमस से संबद्ध करके रावण को कामी कह दिया है। इसी दृष्टि भेद के कारण रामायण का रावण महत्वाकांक्षी, धैर्यवान, वीर एवं साहसी सम्राट है, जबकि रामचरितमानस का रावण अत्याचारी, असंयमी, क्रोधी, कामी और नृशंस बना दिया गया है। रावण की मृत्यु के पश्चात मंदोदरी के मुख से अपने पराक्रमी वीर एवं यशस्वी पति रावण की तथाकथित कामुकता का भी अत्यंत गौरवपूर्ण उल्लेख जब हम पढ़ते हैं, तो आदिकवि के कवित्व पर मुग्ध हो उठते हैं-
''इंद्रियाणि पुण जित्वा जितं त्रिभुवनं त्वया!
स्मरादिभारिव तदैरमिंद्रियैरेव निर्जितः!!
(6/114/18)
अर्थात 'तुमने बलपूर्वक इंद्रियों को जीत कर त्रिभुवन विजित किया था, इसीलिए अब इंद्रियों ने सीता के बहाने तुम्हें जीत लिया है।''

संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि की ही तरह अपभ्रंश के आदि महाकवि स्वयंभू देव की दृष्टि भी रावण के चित्रण में सर्वत्र सहज और तटस्थ कवि की ही रही है। जैन-रामायण के नाम से विख्यात अपभ्रंश भाषा की रामकथा कृति ''पउम चरिउ'' में रावण के शील का चित्रण करते हुए एक अनूठी और विलक्षण उद्भावना करते हैं। स्वयंभू देव का रावण कैवल्य ज्ञानी संत अनंत रथ के समक्ष प्रतिज्ञा करता है-
''जं मइण समिच्छई चारु गत्तु!
तं मंड लिएभिण पर कलुत्तु!! (1/18/3)

''यदि कोई परस्त्री स्वयं इच्छा नहीं करेगी, तो मैं उसका भोग नहीं करंगा।'' क्या सृष्टि का समस्त शक्तियाँ होने के बाद भी रावण ने कभी बलात सीता का भोग करना चाहा? तब रावण पर कामुक होने का घृणित आरोप क्यों? अपभ्रंश के आदिकवि स्वयंभूदेव भी महाकवि वाल्मीकि की तरह ही रावण को दीप्तवीर एवं शीलवान सिद्ध करते हैं। 'पउम चरिउ' में जब लक्ष्मण रावण से सीता को लौट कर राम से क्षमा माँगने की बात कहते हैं, तो दीप्तवीर रावण कहता है-
''महु धइं पुणु आएं कवणु!
किं सीह हों होउ सहाउ अण्णु!!'' (79/22)

रावण लक्ष्मण से कहता है- क्या सिंह का स्वभाव बदल सकता है? इस प्रकार अनेक स्थानों पर हम रावण के तेजस्विता से परिपूर्ण चरित्र का दर्शन करते हैं।

रावण की तेजस्विता
तुलसीदास सर्वत्र रावण के दीप्त अहं को शठ की हठवादिता कहते हैं जबकि आदिकवि वाल्मीकि रावण के अहं में भी अपूर्व तेजस्विता देखते है और उसे वीर पुरुष का अहं मानते हुए कहते है- ''द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयंतुवस्याचित,'' लेकिन और अब अंत में, सौंदर्य चित्रण की दृष्टि से भी रावण के चित्रांकन का मूल्यांकन करते चलें। यहाँ आदिकवि वाल्मीकि की कवि-दृष्टि रावण की रूपराशि, तेजस्विता एवं संपन्नता को चित्रित करती है। दूसरी ओर, रावण की इस सहज सर्वलक्षणयुक्तता की तुलना में महाकवि तुलसी रामचरितमानस में रावण का चित्रण करते हुए उसे केवल निशाचर ही मानते हैं, कहीं भी सुंदर सुयोग्य प्रतिनायक नहीं मान पाते, जिससे वितृष्णा के साथ-साथ कहीं-कहीं तो क्षोभ भी उत्पन्न होता है। तुलसी के रावण का रूप अंगद को ऐसा दीखता है-
''अंगद दीख दसानन बैसे! सहित प्राण कज्जल गिरि जैसे!!
मुख नासिका नयन अरूकाना! गिरि कंदरा खोह समाना!!''
(लंकाकांड-18/46)

उक्त चित्रण में, रामभक्त तुलसी ने कज्जलगिरि जैसे तथा गिरि कंदरा खोह समाना जैसी उपमाएँ दशानन रावण के लिए प्रयुक्त की हैं, लेकिन अनेक काव्य-मर्मज्ञ, रसज्ञ, सामाजिक सह्रदय व्यक्ति उससे सहमत नहीं होते हैं। प्राच्य विद्याओं के अध्येता विद्वान वी.एस. श्रीनिवास ने रावण के लिए अत्यंत सार्थक शब्द कहे हैं- ''ग्रेटनैस विद आउट गुडनैस'' अर्थात ''गरिमारहित उच्चता''। क्या इन शब्दों से रावण के चरित्र का सही मूल्यांकन नहीं होता? इस पर आपत्ति संभव ही नहीं।

वस्तुतः लंकाधिपति रावण में भी शील-शक्ति-सौंदर्य की त्रिवेणी आदिकवि वाल्मीकि एवं अपभ्रंश के महाकवि स्वयंभू देव ने देखी और रावण को मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सबलतम एवं प्रबलतम प्रतिद्वंद्वी बनाकर रामकथा का सहज प्रतिनायक (एंटी हीरो) बनाया है, जबकि भक्त कवि तुलसीदास रावण को खलनायक (विलेन) बना देते हैं, जो कवित्व की दृष्टि से उतना गरिमापूर्ण नहीं लगता।

आख़िर रावण ही तो है जिसने राम को सचमुच राम बनाया है।

विजयदशमी के अवसर पर शस्त्र पूजा








हमारे देश में विजयादशमी के शुभ अवसर पर देवी पूजा के साथ-साथ शस्त्र पूजा की परंपरा भी कायम हैं। यह शस्त्र पूजा दशहरा के दिन ही क्यों की जाती है, इस संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु नवरात्र व्रत किया था, ताकि उनमें शक्ति की देवी दुर्गा जैसी शक्ति आ जाए अथवा दुर्गा उनकी विजय में सहायक बनें। चूँकि दुर्गा शक्ति की देवी हैं और शक्ति प्राप्त करने हेतु शस्त्र भी आवश्यक है, अत: राम ने दुर्गा सहित शस्त्र पूजा कर शक्ति संपन्न होकर दशहरे के दिन ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। तभी से नवरात्र में शक्ति एवं शस्त्र पूजा की परंपरा कायम हो गई।



शस्त्र पूजा के कारण ही दशहरे को मुख्य रूप से क्षत्रियों का पर्व माना गया है, क्यों कि राम भी क्षत्रिय थे और ख़ास तौर पर प्राचीन भारतीय व्यवस्था में सुरक्षा एवं युद्ध का कार्य क्षत्रिय करते थे।

इस प्रसंग से अन्य घटनाएँ भी जुड़ी हैं, जो शक्ति एवं शस्त्र पूजा की परंपरा को पुष्टि प्रदान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इंद्र भगवान ने दशहरे के दिन ही असुरों पर विजय प्राप्त की थी। महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारंभ हुआ था तथा पांडव अपने अज्ञातवास के पश्चात इसी दिन पांचाल आए थे, वहाँ पर अर्जुन ने धनुर्विद्या की निपुणता के आधार पर, द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। ये सभी घटनाएँ शस्त्र पूजा की परंपरा से जुड़ी हैं।

दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा भी की जाती है। इस सबंध में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं।

एक कथा के अनुसार जब राजा विराट की गायों को कौरवों से छुड़ाने के लिए अज्ञातवासी अर्जुन ने अपने अज्ञातवास के दौरान शमी की कोटर में छिपाकर रखे अपने गांडीव धनुष को फिर से धारण किया, तो पांडवों ने शमी वृक्ष की पूजा कर गांडीव धनुष की रक्षा हेतु शमी वृक्ष का आभार प्रदर्शन किया, तभी से शस्त्र पूजा के साथ ही शमी वृक्ष की पूजा भी होने लगी।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार राजा रघु के पास एक साधु दान प्राप्त करने हेतु आया। जब रघु अपने खज़ाने से धन निकालने गए, तो खज़ाना खाली पाया। फलत: रघु क्रोधवश इंद्र पर चढ़ाई करने को तैयार हो गए। इंद्र ने रघु के डर से अपने बचाव हेतु शमी वृक्ष के पत्तों को सोने का कर दिया। तभी से यह परंपरा कायम हुई कि क्षत्रिय इस दिन शमी वृक्ष पर तीर चलाते हैं एवं उससे गिरे पत्तों को अपनी पगड़ी में ले लेते हैं।

शस्त्र पूजा की यह परंपरा भारत की रियासतों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती रही हैं। रियासतों में शस्त्रों के साथ जुलूस निकाला जाता था। राजा विक्रमादित्य ने दशहरा के दिन ही देवी हरसिद्धि की आराधना, पूजा की थी। छत्रपति शिवाजी ने भी इसी दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न करके तलवार प्राप्त की थी, ऐसी मान्यता है। तभी से मराठा अपने शत्रु पर आक्रमण की शुरुआत दशहरे से ही करते थे।

महाराष्ट्र में शस्त्र पूजा आज भी अत्यंत धूमधाम से होती हैं और इसे 'सीलांगण एवं अहेरिया' के नाम से पुकारा जाता है। अर्थात मराठे इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा कर दसवें दिन 'सीलांगण' के लिए प्रस्थान करते थे। 'सीलांगण' का अर्थ होता है 'सीमोल्लंघन' अर्थात वे दूसरे राज्य की सीमा का उल्लंघन करते थे। इसमें सर्वप्रथम नगर के पास स्थित छावनी में शमी वृक्ष की पूजा की जाती थी, उसके पश्चात पेशवा पूर्व निश्चित खेत में जाकर मक्का तोड़ते थे और तब वहाँ उपस्थित लोग मिलकर उस खेत को लूट लेते थे। दशहरे के दिन एक विशेष दरबार भी लगाया जाता था, जिसमें बहादुर मराठों की पदोन्नति की जाती थीं।

राजपूतों (राजपूताना) में भी सीलांगण प्रथा प्रचलित थी। किंतु 'सीलांगण' से पूर्व वे 'अहेरिया' करते थे अर्थात इस दिन वे शस्त्र एवं शमी वृक्ष की पूजा कर विजय के रूप में दूसरे राज्य का 'अहेर' करते थे। अर्थात शिकार मानकर आक्रमण करते थे। साथ ही दुर्गा अथवा राम की मूर्ति को पालकी में रखकर जुलूस के रूप में सीमा पार करते थे। महिलाएँ भी इस अवसर पर पूजा करती हैं एवं व्रत रखती हैं।

जब सीमोल्लंघन वास्तविक युद्ध में बदल गया

सीमोल्लंघन की परंपरा कभी-कभी वास्तविक युद्ध का रूप ले लेती थी। सन १४३४ में जब बूँदी एवं चित्तौड़गढ़ के राज परिवार इसी तरह 'अहेरिया' खेल रहे थे उसी दिन हांडा सेनाओं ने सिसौदिया सेनाओं पर धावा बोल दिया जिसमे राणा कुंभा को अपनी जान गँवानी पड़ी।

इसी तरह की एक अन्य घटना अमरसिंह के समय हुई। अमरसिंह अपने पिता राणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात १५५० में चित्तौड़ की गद्दी पर आसीन हुए थे। उन्होंने अपने पहले दशहरे पर 'अहेरिया' खेलने के बजाय उत्ताला दुर्ग में रुके मुगल सैनिकों के शिकार का प्रण किया, जिसमें उनके कई सरदार मारे गए। राजपूतों में आज भी 'अहेरिया' की परंपरा है।

शस्त्र पूजा की परंपरा के अंतर्गत ही हैदराबाद, मैसूर, मध्य प्रदेश की रियासतें भी दशहरे के अवसर पर विशाल जुलूस निकालती थीं। विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेव राय के दशहरे एवं जुलूस का वर्णन तत्कालीन पुर्तगाली यात्री 'पेई' ने भी किया है। हैदर अली एवं टीपू सुलतान भी इस परंपरा को मनाते थे तथा इस दिन कुश्ती, मुक्केबाजी एवं हाथी दंगल आदि कार्यक्रमों का आयोजन भी होता था। इस दिन भैसों की बलि भी दी जाती थी, जो महिषासुर वध का प्रतीक माना जाता था।

भारतीय सेना में भी शस्त्र पूजा

चूँकि वर्तमान समय में रियासती व्यवस्था समाप्त हो गई है। अत: शस्त्र पूजा की यह परंपरा अब उस रूप में नहीं मनाई जाती है, किंदु इसका स्थान हमारी सेनाओं ने ले लिया है। भारतीय सेना ने सभी रेजीमेंटों में शस्त्र पूजा अत्यंत ही धूमधाम से की जाती है। विशेष तौर पर जाट, राजपूत, मराठा, कुमाऊँ एवं गोरखा रेजीमेंट तो शस्त्र पूजा अत्यंत उल्लास एवं धूमधाम से करते हैं। नवरात्र से प्रारंभ कर दशहरे के दिन अर्थात १० दिन तक सभी शस्त्रों की पूजा-अर्चना की जाती है। अंतिम दिन रात में ११ बजकर ५६ सेकैंड पर देवी दुर्गा के लिए काले बकरे की बलि दी जाती है। इस दिन सेना में बड़ा खाना होता है। शस्त्र पूजा के साथ हमारे सैनिक पंडित के निर्देश से शमी वृक्ष की पूजा भी करते हैं।

इस प्रकार आज भले ही रियासतों के रूप में शस्त्र पूजा की परंपरा कायम न हो, किंतु हमारी सेना के जवानों द्वारा की जानेवाली शस्त्र पूजा रियासतों के समय मनाई जानेवाली शस्त्र पूजा से कम नहीं हैं। इस दिन हमारे सैनिकों में एक नई शक्ति जागृत होती है, जो किसी भी शत्रु को कुचल देने में सक्षम हैं।

विजयादशमी पर विशेष




पर्व परिचय





विजयादशमी पर विशेष

जन रंजन भंजन सोक भयं
डॉ. सुधा पांडेय

आपदां पृहर्त्तारं दातारं सुख संपदाम्।
लोकाभिरामं श्री रामं भूयो भूयो नमोम्यहम्।।

श्रीराम की पूरी अवतारी लीला-मर्यादा की स्थापना, असत्य व आसुरी शक्तियों तथा प्रवृत्तियों पर सत्य और धर्म की विजय से मूल्यों की रक्षा की ही रही। ऐसी आदर्श श्रीराम से जन-जन का जुड़ाव इतना व्यापक, आत्मीय व आराध्य भाव का रहा है कि मर्यादा व शक्ति के संगम का वार्षिकोत्सव आनंद बन 'दशहरा' अर्थात 'विजयादशमी' सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व बन चुका है। 'शक्ति' के मूल तत्व की आत्मप्रेरणा से विजय अभियान प्रारंभ करने की प्रतीक बन विजयादशमी सूक्ष्म अर्थ में अधर्म पर धर्म तथा असत्य पर सत्य की विजय को ही रेखांकित, मंचित और प्रमाणित करती आई है।

शक्ति को मर्यादित रूप से प्रयोग करते हुए सत्य और धर्म के पथ पर अग्रसर व्यक्ति अवश्य ही विजयी होता है। अधर्म व अनीति में शक्ति प्रयोग कभी सफल नहीं हो सकता। यही संदेश देती विजयादशमी उत्सव स्वरूप में प्रतिवर्ष आनंद और पुनःस्मरण के भाव से रामलीलाओं और रावणदहन की पुनरावृत्ति करती आ रही है। चैत्र शुक्ल दशमी से धर्मराज पूजन से प्रारंभ प्रत्येक माह की दशमी व्रत पर्व रही है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दशावतार व्रत के पश्चात आश्विन शुक्ल दशमी 'विजयादशमी' है- 'नारद महापुराण' के अनुसार श्रीराम सहित उनके अनुजों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का पूजन आज किया जाता है।

इसे श्रवण नक्षत्र युक्त प्रदोषव्यापिनी, नवमी विद्धा लिया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजयप्रयाण, शमीपूजन और नवरात्र का पारण भी आज ही होता है- शरद ऋतु का प्रारंभ आज से ही माना जाता है। दशमी तिथि को जब सूर्यास्त के बाद तारे उदित होते हैं तब 'विजय' नामक मुहूर्त में आरंभ किया प्रत्येक कार्य सिद्ध होता है।

माता भगवती की आराधना कर वर्षाकाल की समाप्ति पर प्राचीन काल से ही राजतंत्रात्मक व्यवस्था में समारोहपूर्वक रामलीलाओं तथा शोभायात्राओं से राजाओं के विजय अभियान इसी तिथि से प्रारंभ होते थे। जन-जन तक इसे पहुँचाने और अनूठा लोक उत्सव ही बना देने का श्रेय रामकथा का ही रहा है। शस्त्र पूजन तथा शमी वृक्ष का पूजन और नीलकंठ पक्षी का दर्शन भी परंपरा रही है।

बनारस (रामनगर), कुल्लू का दशहरा और ढालपुर मैदान की रामलीला हो अथवा मैसूर राजघराने की अदभुत शोभा यात्रा-दशहरे की धूम तो स्थान-स्थान पर रामलीलाओं के मंचन और रामकथा गुणगान से सर्वत्र विस्तृत ही रहती आई है। भव्य आयोजनों और व्यावसायिक संदर्भों के बीच भी विजयादशमी अपने मूल संदेश के चलते तो साथ ही लोक उत्सव की रंगीन छटा के बीच दिनोंदिन लोकप्रिय ही होती गई है।

शक्ति यदि अनीति, अधर्म से संयुक्त हो, अमर्यादित और लोककल्याण हेतु न हो तो व्यर्थ होती है, पराजित होती है। शक्तिशाली रावण का वध और सौरज धीरज जेहि रथ चाका-सत्यशील दृढ़ ध्वजा पताका, के विजय रथ पर रथारूढ़ श्रीराम की विजय से यही संकेत और निर्देश प्रतीक रूप में देती विजयादशमी मात्र धूमधाम और लोक उत्सव को ही नहीं अपितु आत्मबल और प्रेरणा के साथ सदवृत्तियों के शक्ति संचयन का भी आवाहन करती आई है। श्रीराम का अनूठा आदर्श जन-जन को इससे प्रेरणा देता आया है। वस्तुतः प्रत्येक लोक पर्व अपने बाह्य परिदृश्य में जहाँ उमंग, उत्साह और आनंद मनाने की व्यक्ति की सामूहिकता की प्रवृत्ति से रंगबिरंगा दिखता है, वहीं मूल आंतरिक भाव-प्रेरणा-नव ऊर्जा तथा सद्प्रवृत्तियों को ग्रहण करने और पुष्ट करने में ही निहित रहता आया है। आदर्श प्रतीक के रूप में श्री राम विजयादशमी में जन-जन के आराध्य बनते हैं जैसे नवरात्रि में भगवती दुर्गा इसी प्रतीक शक्ति का केंद्र बन प्रत्येक को दिशा प्रदान करती हैं। रामचरित की महिमा का बखान तो तुलसी जी इसी संदर्भ में दे गए हैं-

समर विजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
विजय विवेक विभूति नित तिन्हहिं देहिं भगवान।।

मातृशक्ति के पूजन, आशीर्वाद और सत्य, नीति और धर्म पथ पर उसके मर्यादित प्रयोग से विजयी होते श्रीराम की वंदना वाल्मिकी भी अपनी रामायण में कर रहे हैं... सुग्रीव, विभीषण, अंगद और लक्ष्मण के माध्यम से...
ततस्तु सुग्रीव विभीषणांगदाः सुह्रद्विशिष्टाः सह लक्ष्मणस्तदा।
समेत्य दृष्टा विजयेन राघवं रणेभिरामं विधिनाभ्यपूजयन्।।





नवरात्र के अवसर पर
सुर-नर-मुनि-जन सेवत
डॉ. सुधा पांडेय

शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः।।
सर्वा बाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः।। (दुर्गासप्तशती-द्वादश अध्याय १२-१३)

पितरों के श्राद्धतर्पण के पश्चात देवी पक्ष अर्थात नवरात्रि की महापूजा का आगमन हो चुका है। वस्तुतः शारदीय नवरात्र, विजयादशमी और शरत्पूर्णिमा 'देवीपक्ष' की ही शास्त्रीय मान्यता के अंतर्गत है। माँ का महात्म्य श्रवण, पूजन और उनकी ही सेवा में प्रतिक्षण मन-क्रम-वचन से लगे भक्त उनके आगमन से पुनः प्रसन्नता, आशा और आकांक्षा के साथ-साथ अवर्णनीय आत्म-सुख में ही निमग्न दिखते हैं। नित्य पाठ, पुष्पांजलि और आरतियों से माँ की चरण-वंदना और उनके वात्सल्य रस से नहाते सभी उनके विविध रूपों की आराधना में ही व्यस्त दिखते हैं। सारा वातावरण ही 'मातृरुपेण संस्थिता' का ही प्राकट्य उपस्थित करता दिखता है। ऐसा प्रशस्त और व्यापक है शारदीय नवरात्र का महाउत्सव कि बस माता के ही जयकार और माता के ही जगरातों की शोभाछटा चहुँ ओर बिखरी दिखती है। घर-घर माँ के मंगल गीत हैं- माँ से अधिक और उनके अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है- सो बस मइया, माता, जननी, माँ-शेरावाँली- न जाने कितने भावविभोर करते संबोधनों, गीतों, कीर्तनों से नर-नारी बस उनके ही गान-ध्यान में डूबे हैं, ऐसी आत्मिक प्रसन्नता कि माँ को शृंगार कराने, सेवा और प्रसन्नता की जैसे होड़-सी लगी दिखती है।

आश्विनस्य सिते पक्षे नानाविधि महोत्सवैः।
प्रसादयेयुः श्री दुर्गा चतुर्वर्ग फलार्थिनः।।
(बृहत्सार सिद्धांत)

महासप्तमी, महाष्टमी की अर्धरात्रिकालीन महानिशापूजा की तैयारियाँ हैं, तो साथ ही महानवमी की त्रिशूलनी पूजा और व्रत-पारण- अर्थात कर्मांत में किए जाने वाले हवन की आतुरता है। हवन में कम से कम नौ व्यक्तियों द्वारा श्री दुर्गासप्तशती का पाठ और नवार्णमंत्र का जाप होता है। श्री सूक्त की प्रतिध्वनित होती मधुरता मन मोह लेती है- तो साथ ही श्री हनुमान जी को ध्वजा अर्पित करना शास्त्रोक्त माना गया है। शारदीय नवरात्र का प्रारंभ भी श्री राम द्वारा माँ की आराधना से ही माना जाता है। माँ की आराधना में कौमारी पूजन को प्रधानता दी जाती है। अतः नवमी को हवन तथा सरस्वती पूजन के पश्चात नव कुमारिकाओं को पूजन, सम्मान, भोजन और दक्षिणा- माँ के ही नव रूपों के प्रतीक के रूप में की जानी अभीष्ट है।
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मी मातृणा रूपधारिणीम्।
नव दुर्गात्मिका साक्षात कन्यावामाहध्याम्यहम्।।

''स्त्रियः समस्तास्तव देवि भेदः'' के चलते पारण और नारियल प्रसाद के साथ-साथ कन्या पूजन अनिवार्य कहा गया है। 'सकला जगत्सु' के आधार पर ये सभी नौ कन्यायें माता जगदंबा का ही रूप और प्रतीक मानी जाती है। नित्य नवीन भावों, रूपों और चरित्रों वाली अंबे माँ की भक्ति में डूबे भक्तों के जयकारों, गायन, मंत्रोच्चारणों से तो मंदिरों, पांडालों व जागरण स्थलों पर साज-सज्जा और मूर्तिकारों की कला स्वयमेव निखरी दिखती है।
ओम नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्।।
(श्री दुर्गासप्तशती ५१९)