Showing posts with label माँ. Show all posts
Showing posts with label माँ. Show all posts

माँ


किसी की ख़ातिर अल्‍ला होगा, किसी की ख़ातिर राम
लेकिन अपनी ख़ातिर तो है, माँ ही चारों धा
जब आँख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा-सा आँचल मुझको भूमण्‍डल से प्‍यारा था
उसके चेहरे की झलक देख चेहरा फूलों-सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोचा, पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमको जी भर के प्‍यार किया
मैं उसका राजा बेटा था वो आँख का तारा कहती थी
मैं बनूँ बुढ़ापे में उसका बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड़ चलाया था पढ़ने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज अन्‍तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्‍नों का वो फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के काँटे चुन वो ख़ुद ग़ुलाब बन जाती थी
मैं बड़ा हुआ तो कॉलेज से इक रोग प्‍यार का ले आया
जिस दिल में माँ की मूरत थी वो रामकली को दे आया
शादी की, पति से बाप बना, अपने रिश्‍तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूँ माँ की ममता को भूल गया
हम भूल गए उसकी ममता, मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गए अपना जीवन, वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गए वो ख़ुद भूखी रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्‍तर देकर ख़ुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गए उसने ही होठों को भाषा सिखलाई थी
मेरी नींदों के लिए रात भर उसने लोरी गाई थी
हम भूल गए हर ग़लती पर उसने डाँटा-समझाया था
बच जाऊँ बुरी नज़र से काला टीका सदा लगाया था
हम बड़े हुए तो ममता वाले सारे बन्‍धन तोड़ आए
बंगले में कुत्ते पाल लिए माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आए
उसके सपनों का महल गिरा कर कंकर-कंकर बीन लिए
ख़ुदग़र्ज़ी में उसके सुहाग के आभूषण तक छीन लिए
हम माँ को घर के बँटवारे की अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से गाली की भाषा तक ले आए
माँ की ममता को देख मौत भी आगे से हट जाती है
गर माँ अपमानित होती, धरती की छाती फट जाती है
घर को पूरा जीवन देकर बेचारी माँ क्‍या पाती है
रूखा-सूखा खा लेती है, पानी पीकर सो जाती है
जो माँ जैसी देवी घर के मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें इंसान नहीं बन सकते हैं
माँ जिसको भी जल दे दे वो पौधा संदल बन जाता है
माँ के चरणों को छूकर पानी गंगाजल बन जाता है
माँ के आँचल ने युगों-युगों से भगवानों को पाला है
माँ के चरणों में जन्नत है गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी ऊँचाई है, सागर जैसी गहराई है
दुनिया में जितनी ख़ुशबू है माँ के आँचल से आई है
माँ कबिरा की साखी जैसी, माँ तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली ख़ुसरो की अमर रुबाई है
माँ आंगन की तुलसी जैसी पावन बरगद की छाया है
माँ वेद ऋचाओं की गरिमा, माँ महाकाव्‍य की काया है
माँ मानसरोवर ममता का, माँ गोमुख की ऊँचाई है
माँ परिवारों का संगम है, माँ रिश्‍तों की गहराई है
माँ हरी दूब है धरती की, माँ केसर वाली क्‍यारी है
माँ की उपमा केवल माँ है, माँ हर घर की फुलवारी है
सातों सुर नर्तन करते जब कोई माँ लोरी गाती है
माँ जिस रोटी को छू लेती है वो प्रसाद बन जाती है
माँ हँसती है तो धरती का ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में चन्‍दा-सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में बस केवल माँ की मूरत है
माँ सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, दुर्गा, अनुसूया, मरियम, सीता है
माँ पावनता में रामचरितमानस् है भगवद्गीता है
अम्‍मा तेरी हर बात मुझे वरदान से बढ़कर लगती है
हे माँ तेरी सूरत मुझको भगवान से बढ़कर लगती है
सारे तीरथ के पुण्‍य जहाँ, मैं उन चरणों में लेटा हूँ
जिनके कोई सन्‍तान नहीं, मैं उन माँओं का बेटा हूँ
हर घर में माँ की पूजा हो ऐसा संकल्‍प उठाता हूँ
मैं दुनिया की हर माँ के चरणों में ये शीश झुकाता हूँ

माँ की पीड़ा कौन सुनेगा





एक दिन रास्ते में मुझे मेरे मित्र की माँ दिखीं। मैंने पूछा आंटी कहाँ जा रही हैं। बोलीं बेटा सतीश को देखने जा रही हूँ। कहीं पीकर पड़ा होगा। उसकी उम्र बमुश्किल 18 साल होगी। मैंने कहा लेकिन उसे तो यह आदत नहीं थी। अब बेटा घर से कलाली दूर ही कितनी रह गई है।

एक दिन सुबह-सुबह मुझे सिरदर्द हुआ डिस्प्रिन के लिए चौराहे तक निकल गया। समय था सुबह 8 बजे का। देखता हूँ मेडिकल तो बंद पड़ा है लेकिन शराब की दुकान खुल गई है। मुँह से यही आह निकली वाह रे मालिक दवा तो नहीं दारू की व्यवस्था जरूर है।

प्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह जी ने बचपन में यह तो देखा ‍क‍ि माँ ने खुले स्थान पर बच्चे को जन्म दिया और फिर कुछेक घंटों बाद अपने काम पर चल दी। उनके दुख-दर्द को समझते हुए उन्होंने महिलाओं के लिए अस्पतालों में प्रसूति की व्यवस्था करा दी। लेकिन क्या उन्होंने दारू के लिए भटकते युवाओं को भी देखा था जो आज चौराहे-चौराहे पर इन दुकानों को खोलने की अनुमति दे दी है।

आज मेरे प्रदेश (मध्यप्रदेश) में माँ अपने बच्चों को खेल के मैदान से पहले चौराहों पर लगी शराब की दुकानों की तरफ रास्ते भर ढूँढती हुई जाती है कि मेरा बेटा कहीं रास्ते में नशे की हालत में तो नहीं पड़ा है।

वे माँएँ कोस रही हैं राज्य सरकार को ‍कि एक तरफ तो मुख्‍यमंत्री की भांजी (उनकी बेटी) के लिए लाडली लक्ष्मी योजना है तो दूसरी ओर भांजों (उनके बेटों) और भांजा दामादों (बेटियों के पति) के लिए कुकुरमुत्तों की तरह खुली हुई दुकानें हैं। अभी तक तो संगत ही बुरी थी लेकिन घूमते-फिरते कितनी दुकानों के सामने अपने मन को समझाएगा आखिर किसी पर रुक गया तो गिरते-पड़ते घर आएगा।

शिवराज सिंह जी, प्रदेश को आगे ले जाने का सपना तो साकार तब होगा जबकि युवा शक्ति अपनी तन, मन और धन का इस्तेमाल जरूरी कामों में करेगी। स्कूल, कॉलेज विद्यार्थी पढ़ने जाएगा तब प्रदेश का विकास संभव है न कि रास्ते भर दिख रही इन दुकानों से होकर गुजरने पर। नशे की हालत से मुक्त होने पर ही तो कर्मचारी ऑफिस या व्यवसायी दुकान जा सकेगा।

प्रदेश की तरक्की तभी संभव है जब यह अपनी शक्ति सार्थक कामों में लगाएँ न कि केवल आपके मंत्रिमंडल के विधानसभा भवन पहुँचने से। राज्य के लोगों ने 'शिवराज' के हाथों में सत्ता की बागडोर इसलिए ही सौंपी थी कि प्रदेश का उद्‍धार होगा न कि बंटाढार। मुख्‍यमंत्री जी, इन माँओं की पीड़ा तो सुन रहे हैं ना आप?

औरत का सच्चा रूप है माँ







बचपन में लोरियाँ सुनाती माँ
हर आहट पर जाग जाती माँ
आज गुनगुनाती है तकिये को लेकर
भिगोती है आँसू से उसे बेटा समझकर

स्कूल जाते समय प्यार से दुलारती माँ
बच्चे के आने की बाट जोहती माँ
अब रोती है चौखट से सर लगाकर
दुलारती है पड़ोस के बच्चे को करीब बुलाकर

कल तक चटखारे लेकर खाते थे दाल-भात को
और चुमते थें उस औरत के हाथ को
आज फिर प्यार से दाल-भात बनाती है माँ
बच्चे के इंतजार में रातभर टकटकी लगाती माँ

लाती है 'लाडी' बड़े प्यार से लाडले के लिए
अपनी धन-दौलत औलाद पर लुटाती माँ
आज तरसती है दाने-पानी को
यादों और सिसकियों में खोई रहती माँ

लुटाया बहुत कुछ लुट गया सबकुछ
फिर भी दुआएँ देती है माँ
प्यार का अथाह सागर है वो
औरत का सच्चा रूप है माँ
औरत का सच्चा रूप है माँ ....

तेरा "वजुद" मुझ में है "माँ"


मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे परदेस जाने पर।


में चुराकर लाई हुं तेरे हाथों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी।


मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी।


मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु हम सब से अलग छूपाए रख़ती थी।


मैं चुराकर लाई हुं वो बिस्तर, जिस पर तूं सोया करती थी।


मैं चुराकर लाई हुं कुछ रुपये जिस पर तेरे पान ख़ाई उँगलीयों के नशाँ हैं।


मैं चुराकर लाई हुं तेरे सुफ़ेद बाल, जिससे मैं तेरी चोटी बनाया करती थी।


जी चाहता है उन सब चीज़ों को चुरा लाउं जिस जिस को तेरी उँगलीयों ने छुआ है।


हर दिवार, तेरे बोये हुए पौधे,तेरी तसबीह , तेरे सज़द,तेरे ख़्वाब,तेरी दवाई, तेरी रज़ाई।


यहां तक की तेरी कलाई से उतारी गई वो, सुहागन चुडीयाँ, चुरा लाई हुं “माँ”।


घर आकर आईने के सामने अपने को तेरे कपडों में देख़ा तो,


मानों आईने के उस पार से तूं बोली, “बेटी कितनी यादोँ को समेटती रहोगी?


मैं तुझ ही में तो समाई हुई हुं।


“तुं ही तो मेरा वजुद है बेटी”

'माँ' The mother (part 1)



मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जाकर ‘रज़ा‘ थोड़ा सुकूं पाती है माँ

फ़िक्र में बच्चे की कुछ इस तरह घुल जाती है माँ

नौजवाँ होते हुए बूढ़ी नज़र आती है माँ

रूह के रिश्तों की गहराईयाँ तो देखिए

चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ

ओढ़ती है हसरतों का खुद तो बोसीदा कफ़न

चाहतों का पैरहन बच्चे को पहनाती है माँ

एक एक हसरत को अपने अज़्मो इस्तक़लाल से

आँसुओं से गुस्ल देकर खुद ही दफ़नाती है माँ

भूखा रहने ही नहीं देती यतीमों को कभी

जाने किस किस से, कहाँ से माँग कर लाती है माँ

हड्डियों का रस पिला कर अपने दिल के चैन को

कितनी ही रातों में ख़ाली पेट सो जाती है माँ

जाने कितनी बर्फ़ सी रातों में ऐसा भी हुआ

बच्चा तो छाती पे है गीले में सो जाती है माँ

जब खिलौने को मचलता है कोई गुरबत का फूल

आँसुओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ

फ़िक्र के श्मशान में आखिर चिताओं की तरह

जैसे सूखी लकड़ियाँ, इस तरह जल जाती है माँ

भूख से मजबूर होकर मेहमाँ के सामने

माँगते हैं बच्चे जब रोटी तो शरमाती है माँ

ज़िंदगी की सिसकियाँ सुनकर हवस के शहर से

भूखे बच्चों को ग़िजा, अपना कफ़न लाती है माँ

मुफ़लिसी बच्चे की ज़िद पर जब उठा लेती है हाथ

जैसे हो मुजरिम कोई इस तरह शरमाती है माँ

अपने आँचल से गुलाबी आँसुओं को पोंछकर

देर तक गुरबत पे अपनी अश्क बरसाती है माँ

सामने बच्चों के खुश रहती है हर इक हाल में

रात को छुप छुप के लेकिन अश्क बरसाती है माँ

कब ज़रूरत हो मिरी बच्चे को, इतना सोचकर

जागती रहती हैं आँखें और सो जाती है माँ

पहले बच्चों को खिलाती है सुकूनो चैन से

बाद में जो कुछ बचा, वो शौक़ से खाती है माँ

माँगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह से

अपने बच्चों के लिए दामन को फैलाती है माँ

दे के इक बीमार बच्चे को दुआएं और दवा

पाएंती ही रख के सर क़दमों पे सो जाती है माँ

जाने अन्जाने में हो जाए जो बच्चे से कुसूर

एक अन्जानी सज़ा के डर से थर्राती है माँ

गर जवाँ बेटी हो घर में और कोई रिश्ता न हो

इक नए अहसास की सूली पे चढ़ जाती है माँ

हर इबादत, हर मुहब्बत में निहाँ है इक ग़र्ज़

बेग़र्ज़ , बेलौस हर खि़दमत को कर जाती है माँ

अपने बच्चों की बहारे जिंदगी के वास्ते

आँसुओं के फूल हर मौसम में बरसाती है माँ

ज़िंदगी भर बीनती है ख़ार , राहे ज़ीस्त से

जाते जाते नेमते फ़िरदौस दे जाती है माँ

बाज़ुओं में खींच के आ जाएगी जैसे कायनात

ऐसे बच्चे के लिए बाहों को फैलाती है माँ

एक एक हमले से बच्चे को बचाने के लिए

ढाल बनती है कभी तलवार बन जाती है माँ

ज़िंदगानी के सफ़र में गर्दिशों की धूप में

जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है माँ

प्यार कहते है किसे और मामता क्या चीज़ है

कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ

पहले दिल को साफ़ करके खूब अपने खून से

धड़कनों पर कलमा ए तौहीद लिख जाती है माँ

सफ़हा ए हस्ती पे लिखती है उसूले ज़िंदगी

इस लिए इक मकतबे इस्लाम कहलाती है माँ

उसने दुनिया को दिए मासूम राहबर इस लिए

अज़्मतों में सानी ए कुरआँ कहलाती है माँ

घर से जब परदेस जाता है कोई नूरे नज़र

हाथ में कुरआँ लेकर दर पे आ जाती है माँ

दे के बच्चे को ज़मानत में रज़ाए पाक की

पीछे पीछे सर झुकाए दूर तक जाती है माँ

काँपती आवाज़ से कहती है ‘बेटा अलविदा‘

सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है माँ

रिसने लगता है पुराने ज़ख्मों से ताज़ा लहू

हसरतों की बोलती तस्वीर बन जाती है माँ

जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेस में

आँसुओं को पोंछने ख़्वाबों में आ जाती है माँ

लौट कर वापस सफ़र से जब घर आते हैं हम

डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ

ऐसा लगता है कि जैसे आ गए फ़िरदौस में

भींचकर बाहों में जब सीने से लिपटाती है माँ

देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब हमें

रेत पर मछली हो जैसे ऐसे घबराती है माँ

मरते दम बच्चा न आ पाए अगर परदेस से

अपनी दोनों आँखें चैखट पे रख जाती है माँ

बाद मर जाने के फिर बेटे की खि़दमत के लिए

भेस बेटी का बदल कर घर में आ जाती है माँ
(...जारी)
शायर-‘रज़ा‘ सिरसवी,
ब्रांच सिरसी, मुरादाबाद, उ. प्र.

शब्दार्थ;

बोसीदा-पुराना, पैरहन-लिबास,
अज़्मो इस्तक़लाल-इरादा और मज़बूती
ग़िज़ा-भोजन, अश्क-आँसू, बेलौस-बिना लालच
ज़ीस्त-ज़िंदगी, नेमते फ़िरदौस-जन्नत की नेमत
कलमा ए तौहीद-ईश्वर के एकत्व की शिक्षा
सानी ए कुरआँ-कुरआन जैसे सम्मान की हक़दार
----------------------------------------------------------------------------
जनाब ‘रज़ा‘ सिरसवी साहब का कलाम उनकी सोच की गहराई का खुद ही सुबूत है। मैंने बरसों पहले इस नज़्म को पढ़ा था जो कि ‘माँ‘ के नाम से उर्दू में किताबी शक्ल में मुझे मेरे एक मेरे एक ऐसे दोस्त से मिली थी जो कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के वंशज हैं और फ़ने शायरी में मैं उन्हें अपने उस्ताद का दर्जा देता हूँ। इस ब्लाग ‘प्यारी माँ‘ के वुजूद में आने की वजह यह किताब भी है। यह नज़्म बहुत लंबी है। इसका हरेक शेर दिल की गहराईयों से निकला है और दिल की गहराईयों तक ही पहुंचता भी है। ‘माँ‘ के तमाम रूप और तमाम जज़्बों को ही नहीं बल्कि एक औरत की हक़ीक़त को भी इस नज़्म में जनाब रज़ा साहब ने बड़े सलीक़े से पेश कर दिया है। ‘माँ‘ पर बहुत से छोटे बड़े शायरों और कवियों की रचनाएं मैंने पढ़ी हैं लेकिन इससे ज़्यादा पूर्ण और सुंदर कोई एक भी मुझे नज़र नहीं आई। जब आप इस नज़्म को पूरा पढ़ लेंगे तो आप भी यही कहेंगे। इस प्यारी नज़्म को इस ब्लाग पर क़िस्तवार अंदाज़ में पेश किया जाएगा, इंशा अल्लाह।

माँ The mother (Urdu Poetry Part 2)







हम बलाओं में कहीं घिरते हैं तो बेइख्तियार
‘ख़ैर हो बच्चे की‘ कहकर दर पे आ जाती है माँ


दूर हो जाता है जब आँखों से गोदी का पला
दिल को हाथों से पकड़कर घर को आ जाती है माँ


दूसरे ही दिन से फिर रहती है ख़त की मुन्तज़िर
दर पे आहट हो हवा से भी तो आ जाती है माँ


चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जाएँ दोस्तो !
जब मुसीबत सर पे आती है तो याद आती है माँ


दूर हो जाती है सारी उम्र की उस दम थकन
ब्याह कर बेटे की जब घर में बहू लाती है माँ


छीन लेती है वही अक्सर सुकूने ज़िंदगी
प्यार से दुल्हन बनाकर जिसको घर लाती है माँ


हमने यह भी तो नहीं सोचा अलग होने के बाद
जब दिया ही कुछ नहीं हमने तो क्या खाती है माँ


ज़ब्त तो देखो कि इतनी बेरूख़ी के बावुजूद
बद्-दुआ देती है हरगिज़ और न पछताती है माँ


अल्लाह अल्लाह, भूलकर हर इक सितम को रात दिन
पोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है माँ


बेटा कितना ही बुरा हो, पर पड़ोसन के हुज़ूर
रोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ


शादियाँ कर करके बच्चे जा बसे परदेस में
दिल ख़तों से और तस्वीरों से बहलाती है माँ


अपने सीने पर रखे है कायनाते ज़िंदगी
ये ज़मीं इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है माँ


साल भर में या कभी हफ़्ते में जुमेरात को
ज़िंदगी भर का सिला इक फ़ातिहा पाती है माँ


गुमरही की गर्द जम जाए न मेरे चाँद पर
बारिशे ईमान में यूँ रोज़ नहलाती है माँ


अपने पहलू में लिटाकर रोज़ तोते की तरह
एक बारह, पाँच, चैदह हमको रटवाती है माँ


उम्र भर ग़ाफ़िल न होना मातमे शब्बीर से
रात दिन अपने अमल से हमको समझाती है माँ


मरतबा माँ का हो ज़ाहिर इसलिए फ़िरदौस से
अपने बच्चों के लिए पोशाक मंगवाती है माँ


याद आता है शबे आशूर को कड़ियल जवाँ
जब कभी उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सुलझाती है माँ


सबसे पहले जान देना फ़ातिमा के लाल पर
रात भर औनो मुहम्मद को ये समझाती है माँ


जब तलक ये हाथ हैं , हमशीर बेपरदा न हो
इक बहादुर बावफ़ा बेटे से फ़रमाती है माँ


नौजवाँ बेटा अगर दम तोड़ दे आग़ोश में
ज़िंदगी भर सर को दीवारों से टकराती है माँ


फ़ातिमा के लाल पर कुरबान करने के लिए
बाँध कर सेहरा जवाँ बेटे को ले आती है माँ


ख़ून में डूबे हुए आते हैं जब सेहरे के फूल
एक इक टुकड़े को अपने दिल से लिपटाती है माँ


लाशे क़ासिम पे कहा ज़िंदा रही तो आऊँगी
अब तो सूए शाम दुल्हन को ले जाती है माँ


लाश पर बेटे की पढ़ती है जवानी मरसिया
शुक्र का सज्दा इस आलम में बजा लाती है माँ


अल्लाह अल्लाह इत्तिहादे सब्र ए लैला व हुसैन
बाप ने खींची सिनाँ, सीने को सहलाती है माँ


ये बता सकती है हमको बस रबाबे ख़स्ता तन
किस तरह बिन दूध के बच्चे को बहलाती है माँ


भेजकर बच्चे को तीरों में सुकूने क़ल्ब से
फिर शहादत के लिए दामन को फैलाती है माँ


दे के अपने लाल को इस्लाम की आग़ोश में
गोद ख़ाली फिर सूए जन्नत पलट जाती है माँ


गर सुकूने ज़िंदगी घिर जाए फ़ौजे ज़ुल्म में
छोड़कर फ़िरदौस को मक़तल में आ जाती है माँ


शिम्र के ख़ंजर से या सूखे गले से पूछिए
‘माँ‘ इधर मुंह से निकलता है उधर आती है माँ


ऐसा लगता है किसी मक़्तल से अब भी वक्ते अस्र
इक बुरीदा सर से ‘प्यासा हूँ‘ सदा आती है माँ


अपने ग़म को भूलकर रोते हैं जो शब्बीर को
उनके अश्कों के लिए जन्नत से आ जाती है माँ


जिनको पाला था पराये घर पका कर रोटियाँ
उफ़ उन्हीं बच्चों पे इक दिन बोझ बन जाती है माँ


डिग्रियाँ दिलवाईं जिनको, अपने अरमाँ बेचकर
अब उन्हीं की बीवियों की झिड़कियाँ खाती है माँ


दश्ते गुरबत में तयम्मुम करके जलती रेत पर
ज़िंदगी की लाश को ज़ख्मों से कफ़नाती है माँ


बेकसी ऐसी हो, कि इक बूंद पानी भी न हो
आँसुओं पर फ़ातिहा बच्चों को दिलवाती है माँ


सब को देती है सुकूँ और ख़ुद ग़मों की धूप में
रफ़्ता रफ़्ता बर्फ़ की सूरत पिघल जाती है माँ


उम्र भर रखे रही सर पर ज़रूरत का पहाड़
थक गईं साँसें तो अब आराम फ़रमाती है माँ


जो ज़बाँ पर भी न आए, दिल में घुट कर रह गए
ऐसे कुछ अरमाँ अपने साथ ले जाती है माँ


जिस को पढ़ने के लिए बच्चों को फुर्सत ही नहीं
एक दिन वो अजनबी तारीख़ बन जाती है माँ


शायर - रज़ा सिरसवी, किताब- माँ


शब्दार्थ
मुंतज़िर-प्रतीक्षारत, ज़ब्त-क़ाबू , शिकस्ता दिल-टूटा हुआ दिल,
मरतबा-पद, हैसियत, रूतबा; औनो मुहम्मद- औन और मुहम्मद, इमाम हुसैन की बहन जनाबे ज़ैनब के बेटे ,
फ़ातिमा का लाल-इमाम हुसैन, हमशीर-बहन,
सिनाँ-भाला,
रबाब ए ख़स्ता तन-कमज़ोर बदन वाली रबाब (इमाम हुसैन की पत्नी)
सूए शाम-मुल्क शाम की दिशा की तरफ़,
इत्तिहादे सब्र ए लैला व हुसैन-इमाम हुसैन और उनकी पत्नी उम्मे लैला के सब्र का एक हो जाना
सूकूने क़ल्ब-दिल का सुकून, सदा-आवाज़, मक़्तल-क़त्ल किए जाने की जगह
दश्ते गुरबत-अजनबी रेगिस्तान, वक्ते अस्र-अस्र की नमाज़ के वक़्त

शिम्र-इमाम हुसैन का क़ातिल (वाक़या ए करबला);इस नज़्म में उम्मे लैला, रबाब और ज़ैनब जैसी उन पाक माँओं की कुरबानियों का भी ज़िक्र है जिनके बयान के लिए कई किताबें भी कम हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना इन शेरों का अर्थ नहीं समझा जा सकता। जो लोग इस नज़्म को सही तौर पर समझना चाहते हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि वे ‘वाक़या ए करबला‘ में कुरबानी देने वालों के बारे में जानकारी हासिल करें।

माँ तो माँ है...




माँ शब्द में संसार का सारा प्यार भरा है.वह प्यार जिस के लिए संसार का हर प्राणी भूखा है .हर माँ की तरह मेरी माँ भी प्यार से भरी हैं,त्याग की मूर्ति हैं,हमारे लिए उन्होंने अपने सभी कार्य छोड़े और अपना सारा जीवन हमीं पर लगा दिया.

शायद सभी माँ ऐसा करती हैं किन्तु शायद अपने प्यार के बदले में सम्मान को तरसती रह जाती हैं.हम अपने बारे में भी नहीं कह सकते कि हम अपनी माँ के प्यार,त्याग का कोई बदला चुका सकते है.शायद माँ बदला चाहती भी नहीं किन्तु ये तो हर माँ की इच्छा होती है कि उसके बच्चे उसे महत्व दें उसका सम्मान करें किन्तु अफ़सोस बच्चे अपनी आगे की सोचते हैं और अपना बचपन बिसार देते हैं.हर बच्चा बड़ा होकर अपने बच्चों को उतना ही या कहें खुद को मिले प्यार से कुछ ज्यादा ही देने की कोशिश करता है किन्तु भूल जाता है की उसका अपने माता-पिता की तरफ भी कोई फ़र्ज़ है.माँ का बच्चे के जीवन में सर्वाधिक महत्व है क्योंकि माँ की तो सारी ज़िन्दगी ही बच्चे के चारो ओर ही सिमटी होती है.माँ के लिए कितना भी हम करें वह माँ के त्याग के आगे कुछ भी नहीं है .माँ बदला नहीं चाहती चाहती है केवल बच्चों का प्यार ओर हम कितने स्वार्थी होते हैंकि हम वह भी माँ को नहीं दे पाते.विश्व में हम देखते हैंकि जितने सफलता के उच्च शिखर पर पहुंचे हैं उनकी सफलता में माँ का महत्व है.

"माँ ममता और बचपन"


माँ की ममता एक बच्चे के जीवन की अमूल्य धरोहर होती है । माँ की ममता वो नींव का पत्थर होती है जिस पर एक बच्चे के भविष्य की ईमारत खड़ी होती है । बच्चे की ज़िन्दगी का पहला अहसास ही माँ की ममता होती है । उसका माँ से सिर्फ़ जनम का ही नही सांसों का नाता होता है । पहली साँस वो माँ की कोख में जब लेता है तभी से उसके जीवन की डोर माँ से बंध जाती है । माँ बच्चे के जीवन के संपूर्ण वि़कास का केन्द्र बिन्दु होती है । जीजाबाई जैसी माएँ ही देश को शिवाजी जैसे सपूत देती हैं ।

जैसे बच्चा एक अमूल्य निधि होता है वैसे ही माँ बच्चे के लिए प्यार की , सुख की वो छाँव होती है जिसके तले बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है । सारे जहान के दुःख तकलीफ एक पल में काफूर हो जाते हैं जैसे ही बच्चा माँ की गोद में सिर रखता है ।माँ भगवान का बनाया वो तोहफा है जिसे बनाकर वो ख़ुद उस ममत्व को पाने के लिए स्वयं बच्चा बनकर पृथ्वी पर अवतरित होता है ।

एक बच्चे के लिए माँ और उसकी ममता का उसके जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । मगर हर बच्चे को माँ या उसकी ममता नसीब नही हो पाती । कुछ बच्चे जिनके सिर से माँ का साया बचपन से ही उठ जाता है वो माँ की ममता के लिए ज़िन्दगी भर तरसते रहते हैं । या कभी कभी ऐसा होता है कि कुछ बच्चों के माँ बाप होते हुए भी वो उनसे अलग रहने को मजबूर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं । ऐसे में उन बच्चों के वि़कास पर इसका बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है । कुछ बच्चे माँ की माता न मिलने पर बचपन से ही कुंठाग्रस्त हो जाते हैं तो कुछ आत्मकेंद्रित या फिर कुछ अपना आक्रोश किसी न किसी रूप में दूसरों पर उतारते रहते हैं । बचपन वो नींव होता है जिस पर ज़िन्दगी की ईमारत बनती है और यदि नींव डालने के समय ही प्यार की , सुरक्षा की , अपनत्व की कमी रह जाए तो वो ज़िन्दगी भर किसी भी तरह नही भर पाती ।

कोशिश करनी चाहिए कि हर बच्चे को माँ का वो सुरक्षित , ममत्व भरा आँचल मिले जिसकी छाँव में उसका बचपन किलकारियां मारता हुआ ,किसी साज़ पर छिडी तरंग की मानिन्द संगीतमय रस बरसाता हुआ आगे बढ़ता जाए, जहाँ उसका सर्वांगी्ण विकास हो और देश को , समाज को और आने वाली पीढियों को एक सफल व सुदृढ़ व्यक्तित्व मिले ।



जिस मासूम को मिला न कभी
ममता का सागर
फिर कैसे भरेगी उसके
जीवन की गागर
सागर की इक बूँद से
जीवन बन जाता मधुबन
ममता की उस छाँव से
बचपन बन जाता जैसे उपवन
बचपन की बगिया का
हर फूल खिलाना होगा
ममता के आँचल में
उसे छुपाना होगा
ममत्व का अमृत रस
बरसाना होगा
हर बचपन को उसमें
नहलाना होगा

माँ के आँचल सी छाँव
गर मिल जाए हर किसी को
तो फिर कोई कंस न
कोशिश करे मारने की
किसी भी कृष्ण को
अब तो हर कंस को
मरना होगा और
यशोदा सा आँचल
हर कृष्ण का
पलना होगा
आओ एक ऐसी
कोशिश करें हम

माँ,मेरी माँ,


माँ,मेरी माँ,
खुद को क्यों न देखती हो?
बच्चे कुछ बन जाये मेरे,
हरदम ये ही सोचती हो.


बच्चे खेलें तो तुम खुश हो,

पढ़ते देखके व्यस्त काम में,
बच्चे सोते तब भी जगकर,
खोयी हो बस इस ख्याल में,
चैन से बच्चे सोये मेरे इसीलिए तुम जगती हो!
बच्चे कुछ बन जाये मेरे हरदम ये ही सोचती हो.


बच्चे जो फरमाइश करते,

आगे बढ़ पूरी करती.
अपने खाने से पहले तुम ,
बच्चों का हो पेट भरती .
बच्चे पर कोई आंच जो आये,आगे बढ़कर झेलती हो!
बच्चे कुछ बन जाएँ मेरे हरदम ये ही सोचती हो.


बच्चे केवल खुद की सोचें,

तुम बस उनको देखती हो.
तुम्हारे लिए कुछ करें न करें,
तुम उनका सब करती हो.
अच्छे जीवन के सपने तुम,बच्चों के लिए बुनती हो!
बच्चे कुछ बन जाये मेरे,हरदम ये ही सोचती हो.

माँ


माँ शब्द दिल से कहते ही मानों हमारा सारे दुःख दूर हो जाते है |
मानों हमें दुनिया का सुख मिल जाता है !"माँ " हमें सबसे जयादा
प्यार करती है ||
माँ घर मे सबसे पहले उठती है /सबके लिय खाना आदि बनाती है /
सबके जरुरत का ध्यान रखती है/समय समय पर सब का काम करती है
माँ प्यार , दया और ममता की मूर्ति है ! माँ कभी अपने कर्तब्यो
से मुह नाहे मोड़ती |वह घर मे सबको मिलकर रहना है |बच्चो के सुख
को ही अपना सुख मानतीहै |वह कभी किसी से गुस्सा नही करती |
कोई गलत बात बोले तो भी चुप हीरहती है |फिर भी उसका भला हीचाहती है|
हमने भगवान को नही देखा |पर हम अपनी माँ में ही भगवान को देखसकते ह''