Showing posts with label Gandhi ji. Show all posts
Showing posts with label Gandhi ji. Show all posts

सुविचार


अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं।
महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 81
उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके ।

महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 180

सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है ।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 56

एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 159

मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है।

महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 180

चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 367


विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं।
महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 257

अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है |

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 367

सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं |

महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 243

अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 251

निःशस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी।

महात्मा, भाग 4 के पृष्ठ 252

आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 3

जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है।


माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 302

वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 302

क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है।


महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 399


एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है।

महात्मा, भाग 4 के पृष्ठ 158

आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वर्ड्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 376

वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है।

एविल रोट बाइ द इंग्लिश मिडीयम, 1958 पृष्ठ 18

स्वच्छता, पवित्रता और आत्मगसम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती।


माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 356

निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वतः अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 57

जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 43

सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 192

अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 179

उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 286

रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 349

गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 72

जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 , पृष्ठ 1

मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है।

द मैसेज ऑफ द गीता, 1959, पृष्ठ 4

गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 278

मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 311

हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है।

महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 252

साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 61

संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं।


महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 23

हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की .....भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 230

मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 168
सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 248

शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 153

हमारा जीवन सत्य का एक लंबा अनुसंधान है और इसकी पूर्णता के लिए आत्मा की शांति आवश्यक है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 61

यदि समाजवाद का अर्थ शत्रु के प्रति मित्रता का भाव रखना है तो मुझे एक सच्चा समाजवादी समझा जाना चाहिए।

महात्मा, भाग 8 के पृष्ठ 37

आत्मा की शक्ति संपूर्ण विश्व के हथियारों को परास्त करने की क्षमता रखती है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 121

किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सोने की बेडियां, लोहे की बेडियों से कम कठोर नहीं होगी। चुभन धातु में नहीं वरन् बेडियों में होती है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 313

ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 234

नारी को अबला कहना अपमानजनक है। यह पुरुषों का नारी के प्रति अन्याय है।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 33

गति जीवन का अंत नहीं हैं। सही अर्थ़ों में मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवित रहता है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 417

जहां प्रेम है, वही जीवन है। ईर्ष्या-द्वेष विनाश की ओर ले जाते हैं।
माइंड ऑफ महात्मा गांधी, ए तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 417

यदि अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है तो द्वेष भी प्रेम में परिवर्तित हो सकता है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 417


प्रेम और एकाधिकार एक साथ नहीं हो सकता है।


महात्मा, भाग 4 के पृष्ठ 11

प्रतिज्ञा के बिना जीवन उसी तरह है जैसे लंगर के बिना नाव या रेत पर बना महल।


महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 264

यदि आप न्याय के लिए लड रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 206

मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है।


ट्रुथ इज गॉड, 1999 पृष्ठ 45


यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी।


महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 182


युद्धबंदी के लिए प्रयत्नरत् इस विश्व में उन राष्ट्रों के लिए कोई स्थान नहीं है जो दूसरे राष्ट्रों का शोषण कर उन पर वर्चस्व स्थापित करने में लगे हैं।

महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 2

जिम्मेदारी युवाओं को मृदु व संयमी बनाती है ताकि वे अपने दायित्त्वों का निर्वाह करने के लिए तैयार हो सकें।



महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 371


विश्व को सदैव मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है।


माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 33

बुद्ध ने अपने समस्त भौतिक सुखों का त्याग किया क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के साथ यह खुशी बांटना चाहते थे जो मात्र सत्य की खोज में कष्ट भोगने तथा बलिदान देने वालों को ही प्राप्त होती है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 295


हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किंतु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 227

अपने कर्तव्यों को जानने व उनका निर्वाह करने वाली स्त्री ही अपनी गौरवपूर्ण मर्यादा को पहचान सकती है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 294


स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है।


महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 51


जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता।

महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 16

समुौ जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं।


ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 147

पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंत–दृष्टि खोल देती है।


महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 182

किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है।

महात्मा, भाग 8 के पृष्ठ 165

विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नपव ठोस हो।

एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, 1958 पृष्ठ 27

मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 24

ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है।


ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 24


प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है ।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 24

सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है।

महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 264

हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें।

एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, 1958 20

सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 189
अंततः अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है।
महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 102

हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमपदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 255


किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 67

यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है ।

महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामर्थ्य प्राप्त है ।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 292

जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 298

धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 227

स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। \

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 293

महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है।


ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 97

स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है।

महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 227

भारतीयों के एक वर्ग को दूसरे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनाने में ही उपयुक्त होगी।

महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 352

स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे ।

माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 311

आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है।

ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 60

मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा।

महात्मा, भाग 4 के पृष्ठ 36
अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे ।





महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 223
धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है।





महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 223














सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है।





माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 82














अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना।





माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 292














मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता।





महात्मा, भाग 7 के पृष्ठ 33














अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है।





महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 84














पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है।





महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 84

'हिंद स्वराज्य' की कुंजी'



इस आश्चर्यकारक रूप से सरल पुस्तिका (इतनी सरल कि एक मूर्ख की कृति लगे) को समझने की कुंजी यह बात ध्यान में रखने में है कि तथाकथित अज्ञानमय अंधकार युग में वापस जाने का यह प्रयत्न है स्वैच्छिक सादगी, गरीबी तथा धीमी गति में सौंदर्य-दर्शन करने का। इस पुस्तक में मैंने अपने आदर्श को रेखांकित किया है। मैं स्वयं वह आदर्श प्राप्त नहीं कर सकूंगा, इसलिए देश उसे प्राप्त करे ऐसी मेरी अपेक्षा नहीं है। परन्तु नयेपन, हवाईयात्रा तथा अपनी आवश्यकताएं बढ़ाते जाना आदि जो बातें आज आधुनिक युग को चाहिये, उनका मुझे रंचमात्र आकर्षण नहीं है। इन बातों से अपनी अंतरात्मा मृतवत् होती है। मनुष्य जितना उंचा उडने का प्रयत्न करता है, उतना ही वह ईश्वर से दूर होता जाता है

- गांधी (1939)
'हिंद स्वराज्य' की कुंजी

इस आश्चर्यकारक रूप से सरल पुस्तिका (इतनी सरल कि एक मूर्ख की कृति लगे) को समझने की कुंजी यह बात ध्यान में रखने में है कि तथाकथित अज्ञानमय अंधकार युग में वापस जाने का यह प्रयत्न है स्वैच्छिक सादगी, गरीबी तथा धीमी गति में सौंदर्य-दर्शन करने का। इस पुस्तक में मैंने अपने आदर्श को रेखांकित किया है। मैं स्वयं वह आदर्श प्राप्त नहीं कर सकूंगा, इसलिए देश उसे प्राप्त करे ऐसी मेरी अपेक्षा नहीं है। परन्तु नयेपन, हवाईयात्रा तथा अपनी आवश्यकताएं बढ़ाते जाना आदि जो बातें आज आधुनिक युग को चाहिये, उनका मुझे रंचमात्र आकर्षण नहीं है। इन बातों से अपनी अंतरात्मा मृतवत् होती है। मनुष्य जितना उंचा उडने का प्रयत्न करता है, उतना ही वह ईश्वर से दूर होता जाता है

- गांधी (1939)

गांधी की हत्या : सत्य का वध



रमेश ओझा
बचपन से ही मेरे मन में नाथूराम गोडसे नाम के आदमी के लिए एक अजीब-सा कौतूहल था। गांधीजी जैसे महात्मा का इस आदमी ने खून क्यों किया ? यह प्रश्न मन में उठता था। मुम्बई में, कॉलेज में पढते समय मेरे एक हिन्दुत्ववादी मराठी मित्र ने नाथूराम गोडसे की लिखी 'पन्नास कोटीचे बली' 1पचास करोड की बलि1 और उसके भाई गोपाल गोडसे की लिखी 'गांधी हत्या आणि मी' 'गांधी हत्या और मैं', ये दो पुस्तकें मुझे पढने के लिए दी थी 'पन्नास कोटीचे बली' नाथूराम का अदालत में दिया हुआ बचावनामा है, और 'गांधी आणि मी' गोपाल गोडसे की, आजीवन कैद की सजा होने के बाद लिखी गयी पुस्तक है। ये दोनों पुस्तकें पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे धर्मजनूनी जरूर था, मगर पागल नहीं था। हम जिसको सिरफिरा कहते हैं, ऐसा तो वह हरगिज नहीं था।
नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे कलेजे से गांधीजी की हत्या की थी। इन लोगों ने गांधीजी की हत्या क्यों की, इस प्रश्न के जवाब की तलाश में धीरे-धीरे गांधीजी की राजनीति और हिन्दुत्ववादियों की राजनीति के बीच का फर्क मुझे समझ में आने लगा। मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के प्रति गांधीजी ने नरम रुख अपनाया था, ऐसी दलीलें उन पुस्तकों में तथा अन्यत्र भी हिन्दुत्ववादी देते रहे हैं। उनकी नजर में, तब तो हद ही हो गयी, जब गांधीजी ने पाकिस्तान को, उसके हिस्से के, 55 करोड रुपये देने की जिद की, और उपवास की धमकी तक दे डाली। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार तथा कश्मीर पर हमला करनेवालों को 55 करोड रुपये देने की बात से उनेजित होकर नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की थी, ऐसा उन पुस्तकों में कहा गया है। आम तौर पर गांधीजी की हत्या के सम्बन्ध में, आम लोगों की भी धारणा ऐसी ही है। अनेक इतिहासकार और पत्रकार भी ऐसा ही मानते हैं। इतिहास की पाठय़पुस्तकों में भी हत्या का यही कारण बताया जाता है।
गोडसे-बन्धुओं की पुस्तकों को पढने के बाद हत्या का सही कारण जानने के लिए मैंने अन्य अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। प्यारेलाल लिखित 'द लास्ट फेज', गांधी हत्या का केस जिनकी अदालत में चला था उन न्यायमूर्ति खोसला की लिखी पुस्तक, ग्वालियर के बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट इनामदार के संस्मरण, और गोडसे- बन्धुओं का प्रतिवाद करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें पढने के बाद मुझे यकीन हो गया कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये के प्रकरण से उनेजित होकर नहीं की गयी थी। भारत का विभाजन और 55 करोड रुपये का प्रश्न खडा हुआ, उसके बहुत पहले ही इस टोली ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया था और कई बार गांधीजी की हत्या करने के प्रयास भी किये गये थे।
गांधी-हत्या केस के आरोपियों में से गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा अभी जीवित हैं।
आजादी की स्वर्ण-जयन्ती तथा गांधीजी की 50 व पुण्य-तिथि के निमिन गत वर्ष गोपाल गोडसे के साथ मैंने लम्बी बातचीत की थी। आठ घण्टे की लम्बी बातचीत में उनके साथ बहुत दलीलें हुइऔ। एक बार मदनलाल पाहवा के साथ भी बातचीत हुई। बातचीत के दौरान मदनलाल पाहवा ने ठण्डे कलेजे से कहा था कि उसने गांधीजी की हत्या करने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के लिए बम फेंका था। गोडसे-बन्धु की पुस्तक में भी यही कहा गया है। गोपाल गोडसे के पास अधिकांश प्रश्नों के उनर नहीं हैं। दूसरे की बात सुनी-अनसुनी करके वे अपनी ही बात कहते रहते हैं। पीछे पडो, तो प्रश्नों का जवाब देने के बदले उलटे-पुलटे बहाने बनाकर टालने का प्रयास करते हैं। अविश्वसनीय उलटी-सीधी दलीलें करते हैं। स्वयं कितने देशभक्त हैं, यही साबित करने की कोशिश बारगबार करते हैं। नाथूराम कितना बडा विद्वान और चरित्रवान था, इसका बखान करते हैं।

झूठ का प्रचार

गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा से मिलने के बाद मुझे यकीन हो गया कि ये लोग बिलकुल झूठ बोलते हैं। तथ्यों की तोड-मरोड करते हैं। वे पहले दर्जे के धूर्त लोग हैं। 'हा! आर. स. स. की तुलना में हिन्दू महासभा वाले मुझे कुछ कम धूर्त लगते हैं1। हिन्दुत्ववादियों में फरेबियों के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। गुजराती में 'गांधी विरुद्ध गोडसे' नाटक आ रहा है, इसकी जानकारी उन्होंने मुझे दी थी। गांधी की हत्या के विषय में हिन्दुत्ववादी अपनी बात अलग-अलग तरीके से घोंट-घोंटकर लोगों को पिलाने की कोशिश करते रहते हैं। 'असत्य' को अलग-अलग स्थानों में, अलग-अलग तरीकों से, बारगबार कहते रहने पर एक दिन वह 'असत्य'-'सत्य' हो जायेगा, ऐसी 'गोबेल्स थियरी' में इन फासीवादियों की श्रद्धा है। इसीलिए ये लोग तीन 'मिथ' प्रस्थापित करने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं। पहला 'मिथ' यह है कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के पक्षपाती थे। दूसरा 'मिथ' यह है कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपयों के कारण की गयी थी। तीसरा 'मिथ' यह है गांधी की हत्या करनेवाले बहादुर, देशभक्त और प्रामाणिक व्यक्ति थे। परन्तु सत्य यह है कि ये तीनों 'मिथ' बिलकुल गलत हैं।
गांधीजी क्या मुसलमानों के तरफदार और पक्षपाती थे ? क्या देश के विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार थे? गांधे की हत्या के सम्बन्ध में हिन्दुत्ववादियों की 'थिसिस' में कितना झूठ भरा पडा है, यह समझने के लिए सर्वप्रथम उक्त तीनों बातों की तह में जाना और समझना जरूरी है।
तिलक महाराज की मर्यादा
9 जनवरी, 1915 को गांधीजी जब हिन्दुस्तान वापस आये, तब कांग्रेस का नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे। लोकमान्य तिलक की रुझान हिन्दुत्ववादी, ब्रांणवादी और रूढिवादी सनातनी-जैसी थी। गोपालकृष्ण गोखले की अस्वस्थता के कारण प्रगतिशील, सुधारवादी शक्तिया कमजोर पड गयी थी। उस समय लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में कुछ हिन्दुत्ववादी कांग्रेसी खुला आन्दोलन चला रहे थे, तो कुछ विनायक दामोदर सावरकर-जैसे हिन्दुत्ववादी क्रान्तिकारी लोग भूमिगत रहकर हिंसक आन्दोलन की तैयारी कर रहे थे। इन दोनों प्रकार के आन्दोलनों की कुल ताकत कितनी थी वह समझ लेना जरूरी है।
लोकमान्य तिलक ने घोषणा की कि 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।' इसमें स्वराज्य शब्द आता है। उस समय इसका अर्थ पूर्ण स्वराज्य नहीं था। लोकमान्य के मन में 'स्वराज्य' का आशय था ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वायनता 'होमरूल' और, यही उनकी मा!ग थी। यह लोकमान्य तिलक के प्रति पूरा सम्मान-भाव रखते हुए लेकिन हिन्दुत्ववादी राजनीति की मर्यादाए! बताने के लिए लिखना पड रहा है। हिन्दुत्ववादी-ब्रांणवादी दृष्टिकोण के कारण तिलक महाराज कांग्रेस के प्रभाव का विस्तार नहीं कर सके थे। उधर महाराष्टं तथा अन्य प्रान्तों में ब्रांण-विरोधी आन्दोलन जोर पकडने लगा था, जिसने कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी नेतृत्व को प्रभावहीन बना दिया था।
.....और, क्रान्तिकारी क्या कर पाये ?
भारत में गेरिबाल्डी और मेजिनी जैसे क्रान्तिकारी बनने का ख्वाब देखनेवाले गेरिबाल्डी और मेजिनी द्वारा किये गये कामों का शतांश काम भी यहा! नहीं कर सके थे। भूमिगत रहकर हिंसक क्रान्ति करने का इरादा रखनेवाले भारत की वास्तविकताओं से बिलकुल अनभिज्ञ थे। वैसे भी भूमिगत आन्दोलन की एक मर्यादा होती है। सौ वर्ष बाद भी भूमिगत-आन्दोलनवाले आयरलैण्ड का प्रश्न हल नहीं कर सके थे, अभी हाल में बातचीत के द्वारा समस्या का समाधान हो पाया है। भारत एक बहु-अस्मितावाला देश है। हर समाज दूसरे को शंका की नजर से देखता है। कांग्रेस के नेताओं का झुकाव ब्रांणवादी होने के कारण बहुजन-समाज कांग्रेस तथा स्वराज-आन्दोलन से अलग रहता था। और, जहा! बहुजन-समाज साथ न हो, वहा! तो भूमिगत-आन्दोलन की विफलता अवश्यम्भावी होती है। अधिकतर क्रान्तिकारी एकादी छोटी-मोटी घटनाए! करने के बाद पकड लिये जाते थे। अलीपुर बम-केस में, अरविन्द घोष जैसे नेता भी, कोई योजना बनायें, उससे पहले ही पकड लिये गये थे।
सावरकर को जानें-समझें
ये लोग जिसको 'क्रान्तिवीर' के विशेषण से नवाजते हैं, वह विनायक दामोदर सावरकर लन्दन में रहकर 'अभिनव भारत' पत्रिका निकालते थे। भाषण तथा लेख की प्रभावी शैली होनेके के कारण कुछ युवक उनकी तरफ आकर्षित हुए थे। उनके अनुयायियों ने भूमिगत रहकर तोडफोड की कुछ कार्रवाइया! की थी, परन्तु अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक वोंह वे नहीं कर सके थे। अन्ततः परिस्थिति ऐसी बनी कि, 'वी.डी. सावरकर खुद कोई जोखिम नहीं उठाते!' ऐसा असन्तोष उनके अनुयायियों में पनपने लगा। यदि अब भी कुछ नहीं किया, तो 'अभिनव भारत' पत्रिका बन्द हो जायेगी, ऐसी आशंका उन्हें होने लगी थी। तब उन्होंने जिन्दगी में पहली बार, और अन्तिम बार, एक छोटा-सा साहस कर दिखाया। उन्हें जब ब्रिटेन से भारत लाया जा रहा था तब फ्रान्स की सीमा में उन्होंने समुं में कूद कर भागने की कोशिश की थी। लेकिन मात्र 10 मिनट में ही सावरकर पकड लिये गये थे। हकीकत तो यह है कि सावरकर फ्रान्स की सीमा में भागने का गुनाह करके फ्रांसिसे सरकार के गुनहगार बनना चाहते थे, ताकि अंग्रेज सरकार की सजा से बच जाय। बाद में सावरकर माफीनामा लिखकर अण्डमान की जेल से रिहा हुए थे। अंग्रेज सरकार द्वारा निर्धारित मुद्दत तक वे रत्नागिरी जिले की सीमा से बाहर नहीं जायेंगे, ऐसा लिखित शर्तनामा उन्होंने अंग्रेजों को दिया था। वी. डी. सावरकर की इस 'महान क्रान्ति' के बाद तीन दशक तक भारत की आजादी के किसी भी आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया हो या आजादी के लिए स्वयं कोई एक भी आन्दोलन उन्होंने चलाया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता।
गांधीजी को आम जनता का सहयोग
यह थी देश की राजनीतिक स्थिति, जब 9 जनवरी, 1915 के दिन गांधीजी बम्बई के बन्दरगाह पर उतरे। उस समय के अधिकांश नेता भारत की सामाजिक वास्तविकताओं से अनभिज्ञ थे, यह एक हकीकत है। भारत में पैर रखने के साथ ही, कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी-ब्रांणवादी झुकाव तथा भूमिगत-आन्दोलन की मर्यादाए! गांधीजी की समझ में आ गयी थी। गांधीजी ने कांग्रेस को व्यापक जन-संगठन में परिवर्तित करने का काम आरम्भ कर दिया। पहली बार, दलित, आदिवासी, पिछडे वर्ग के लोग,महिलाए! कांग्रेस को अपना समझने लगम्। राष्टं की राजनीति में हमारा भी कोई स्थान है, ऐसा विश्वास शोषित जनता के मन में सबसे पहले गांधीजी ने पैदा किया।
कांग्रेस की कायापलट
गांधीजी ने कांग्रेस नाम की संस्था को लोक-आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया। जब समग्र जनता आन्दोलित होती है तब भूमिगत क्रान्ति की कोई प्रासंगिकता ही नहीं रह जाती। चम्पारण से पहले, देश के किसी भी जिले में, किसी मुद्दे को लेकर जिला-व्यापीगजन-आन्दोलन नहीं हुआ था। सम्पूर्ण देश में आम हडताल हो सकती है इसकी कल्पना तक, गांधीजी से पहले के कांग्रेसी नेता नहीं कर पाये थे।   
खिलाफत-आन्दोलन को समर्थन देकर मुसलमानों को साथ लेने का प्रयास गांधीजी ने किया। पृथक्-पृथक् संकुचित अस्मिताओं की जगह राष्टींय अस्मिता गांधीजी ने ही पैदा की। यदि गांधीजी ने यह राष्टींय अस्मिता नहीं पैदा की होती, तो देश अभी तक आजाद नहीं हुआ होता। गांधीजी के सर्वसमावेशक उदार राष्टंवाद ने यह जादू कर दिखाया। गांधीजी को हिन्दू होने का गर्व था, मगर वे हिन्द के बापू थे। इसीलिए हिन्दुत्ववादियों के अनेक अनुयायी तथा भूमिगत-आन्दोलनवाले गांधीजी के उदार राष्टंवाद से प्रेरित होकर उनके साथ जुड गये थे, गांधीवादी बन गये थे।
कितनी देशहित में हैं हिन्दू सम्प्रदायवाद की प्रवृत्तिया!
जो अन्दर से पक्के सम्प्रदायवादी थे उनको गांधी कभी खुले रूप में स्वीकार्य नहीं थे। लेकिन गांधीजी के उदार राष्टंवाद के सामने संकुचित हिन्दू-राष्टंवाद टिक सके, ऐसा भी सम्भव नहीं था। इन्हम् परिस्थितियों में गांधी-विरोधी प्रवृनियों का आरम्भ हुआ था। कुछ लोग हिन्दू महासभा से जुड गये थे, तो कुछ ने 1925 में राष्टींय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। क्या किया इन महानुभावों ने ? जिन्दगी भर सिर्फ गांधीजी को तथा मुसलमानों को गालिया! देने का काम किया है इन्होंने। इन महान राष्टंवादियों ने आजादी के एक भी आन्दोलन में कभी भाग नहीं लिया। उनको गांधीजी का नेतृत्व मान्य नहीं था। लेकिन गांधीजी तथा कांग्रेस से अलग, स्वतंत्र रूप से कोई एक भी आजादी का आन्दोलन इन लोगों ने नहीं चलाया। विराटगआन्दोलन की तो बात ही क्या कहें, कोई छोटागसेगछोटा आन्दोलन भी चलाने की इन देशाभिमानियों ने कभी हिम्मत नहीं की। सावरकर के अलावा मातृभूमि के इन लाडलों में से किसी ने समाज-सुधार का काम भी नहीं किया। अरे, काम तो क्या, इसके लिए विचार-प्रचार तक नहीं किया। गुरु गोलवलकर की लिखीगश्अवर नेशनहुड डिफाइन्ड' शीर्षक पुस्तक तो हिटलर की भी तारीफ करने वाली एक गन्दी पुस्तक है। यद्यपि आर.एस.एस. ने इस पुस्तक का प्रकाशन अब बन्द कर दिया है, लेकिन इस पुस्तक में व्यक्त विचारों में संघ की आस्था अब नहीं रही, ऐसी  
घोषणा आर. स. स. ने आज तक नहीं की है।
पाकिस्तान का निर्माण किसने किया ?
1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद-अधिवेशन में खुद सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए प्रस्ताव किया, उससे तीन वर्ष पूर्व ही सावरकर ने हिन्दू और मुसलमान, ये दो अलग-अलग राष्टींयताए! हैं, यह प्रतिपादित किया था। जब दो साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने लगती हैं, तब दोनों एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होती हैं, और वह होता है आत्मविनाश का। हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने ऐसा करके अंग्रेजों और भारत-विभाजन चाहने वाले मुसलमानों को फायदा ही पहु!चाया था। इन महान देशप्रेमियों ने 1942 की आजादी के आन्दोलन में तो भाग नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी भी दी थी कि हम आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं। गांधीजी आये, उसके पहले राष्टींय राजनीति का नेतृत्व उनके पास ही था। लेकिन तब भी उन्होंने उन दिनों कोई बडा पराव्म नहीं किया था, यह हम सबकी जानकारी में है ही। गांधी के आने के बाद भी इन लोगों ने राष्टंहित में कोई मामूली काम करने की भी जहमत नहीं उठाई। गुरु गोलवलकर ने ऐडाल्फ हिटलर का अभिनन्दन किया, फिर भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार नहीं किया। कारण यह कि अंग्रेज मानते थे कि ये दो कौडी के निकम्मे लोग हैं। ये लोग तो तला पापड भी नहीं तोड सकते ! अंग्रेजों का यह आकलन था उनकी ताकत के बारे में।
भारत-विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग तथा अंग्रेज हैं, उतने ही ये मूर्ख हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं। आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे, ऐसा शोर मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के लिए एक ठोस आधार दे दिया था। ये विभाजनवादी लोग कहम् मुहम्मद अली जिन्ना, कहम् सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का भय दिखाकर उनका चालाकीपूर्वक उपयोग करते थे। हिन्दुत्ववादी अभी भी अपनी बेवकूफियों पर गर्व का अनुभव करते हैं। अंग्रेजों को जिन्हें कभी जेल में रखने की जरूरत ही नहीं पडी, उन गोलवलकर की अदृश्य ताकत का उपयोग अंग्रेज गांधीजी के खिलाफ करते थे। शहाबुद्दीन राठौड की भाषा में कहें तो उस समय की राष्टींय राजनीति में यो लोग जयचन्द थे। भारत का विभाजन गांधी के कारण नहीं हुआ है, इन लोगों के कारण हुआ है। गांधीजी ने तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था। गांधीजी ने अन्तिम समय तक इसके लिए जिन्ना के साथ क्रमबद्ध मंत्रणाए! कीं। गांधीजी ने पाकिस्तान को स्टेट माना था। (देखें प्यारेलाल लिखित 'लास्ट फेज') गांधीजी सर्वसमावेशक उदार राष्टंवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब कौमों को अपनाया था, मात्र मुसलमानों को ही नहीं। प्रत्येक छोटी अस्मिता व्यापक राष्टींयता में मिल जाय, यह चाहते थे गांधीजी। एक राष्टींय नेता की यह दूरदृष्टि थी। महात्मा का यह वात्सल्य-भाव था सबके प्रति। बदनसीबी से हिन्दू राष्टंवादी यह समझना ही नहीं चाहते थे।
सुभाषबाबू को भी सताया इन्होंने
सुभाष बाबू बंगाल-विभाजन के विरोधी थे। विभाजन न हो, इसके लिए सुभाष बाबू शहीद सुहरावर्दी के साथ समझौते की हिमायत करते थे। 'हमारे कलकना' में बैठक कर कोई मुसलमान 'भं बंगालियों' पर राज करे, यह हिन्दुत्ववादियों को स्वीकार्य नहीं था। प्रान्तीय कांग्रेस में एकतावादी सुभाषचन्द्र बोस को इन लोगों ने पराजित कर दिया। बंगाल में हिन्दू ऐसी संकीर्णता प्रदर्शित करें, और उसके पडोसी संयुक्त प्रान्त के मुसलमान विशाल और उदार मन रखें, क्या यह सम्भव था ?
विभाजन रोकने के लिए इन लोगों ने क्या किया ?
अब अन्तिम बात। गांधीजी को भारत-विभाजन रोकना चाहिए था, यह मा!ग ये लोग किस मु!ह से करते हैं ? गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए उपवास करना चाहिए था, ऐसी अपेक्षा करने का इनको क्या नैतिक-अधिकार है ? जिसको आप देश के लिए कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए! भी रखते हैं? आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ किया ? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध क्यों नहीं आमरण उपवास किया ? क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक आन्दोलन चलाया ? जिसको गालिया! देते हों, उसी से देश बचाने की गुहार भी लगाते हो ? और जब गांधीजी अकेले पड जाने के कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश रचते हो ? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता ?
मैंने गोपाल गोडसे तथा अन्य दूसरे अनेक हिन्दुत्ववादी विद्वानों के समक्ष ऐसे सवाल उठाये हैं, लेकिन किसी के पास इसका कोई उनर नहीं है। इन सबके बावजूद भी ये अपनी डम्ग हा!कने से बाज नहीं आते हैं। सत्य को जानते हुए भी जो असत्य का प्रचार करे, उसको धूर्त ही कहेंगे। हिन्दुत्ववादी पहले दर्जे के धूर्त हैं।
ये हिन्दुत्ववादी लगातार जो तीन झूठ बोल रहे हैं, उसमें से इस पहली झूठ की हकीकतों को हमने देखा।
भारत-विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार नहीं थे। भारत-विभाजन के लिए कई ऐतिहासिक तथा सामयिक तन्व एवं ताकतें जिम्मेदार थी। ब!टवारा चाहने वाले मुसलमान जिम्मेदार थे, अंग्रेज जिम्मेदार थे तथा उनके कारनामों के लिए अनुकूल राह बनाने-दिखाने वाले मूर्ख हिन्दुत्ववादी जिम्मेदार थे।
हिन्दू राष्टंवादियों को पहचानें
गांधी-द्वेष और मुस्लिम-द्वेष से ये हिन्दू राष्टंवादी इतने पीडित थे कि राष्टंहित किसमें है यह उनकी समझ में ही नहीं आता था। उनके पेट में दर्द तो इस बात का था कि गांधीजी के आने के बाद नेतृत्व उनके हाथ से चला गया था। इतना ही नहीं, उनकी 'हिन्दूगब्राण्ड राजनीति' भी कालबाह्य हो चुकी थी। ब्रांणवादी राष्टंवाद की जगह ले ली थी उदार गांधीवादी राष्टंवाद ने। जाति-पा!ति, पंथ, लिंग आदि भेदभावों को भूलकर जनता गांधीजी के पीछे चलने लगी थी। राजनीति की बुनियाद से साम्प्रदायिकता को हटाकर, गांधीजी ने उसकी जगह अध्यात्म को प्रस्थापित कर दिया था। अध्यात्म की बुनियाद पर मानवतावादी राजनीति की इस नयी धारा ने गांधीजी को महात्मा बना दिया और हिन्दुत्ववादी क्षीण होतेगहोते हासिये पर चले गये थे। जो बहुत महन्वाकांक्षी नहीं थे ऐसे कई साम्प्रदायिक लोग राजनीति से अलग हो गये। जनूनी और महन्वाकांक्षी सम्प्रदायवादियों की हालत पतली हो गयी। वे गांधीजी के साथ जा नहीं सकते थे और जनता उनके साथ आने के लिए तैयार नहीं थी।
गांधी-हत्या की प्रेरक शक्तिया!
जिस व्यक्ति के कारण अपने अस्तित्व पर संकट आता है, वह व्यक्ति का!टे की तरह चुभने लगता है और तब उस का!टे को निकलाने का प्रयत्न होता है। हिन्दुत्ववादी समाचार-पत्रों में गांधीजी की कटु आलोचनाए! छपती थी। गांधीजी को अभं गालिया! देने वाली छोटीगछोटी पत्र-पत्रिकाए!, प्रचारगपुस्तिकाए! तो इतनी छपवाते थे कि यदि उनका संग्रह किया जाता तो एक कमरा ही भर जाता। कुछ महान देशभक्त तो इतने शूरवीर थे कि अपना नाम भी छापने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी। गांधीजी सबकी पीठ पर हाथ फेरकर अपना स्नेह व्यक्त करते हैं, मात्र हमारी पीठ पर ही हाथ क्यों नहीं फेरते, इसका उन्हें दुख था। गांधीजी एक बार रत्नागिरी में सावरकर से मिले थे और वर्धा में आर.एस.एस. के स्वयंसेवकों को एक बार सम्बोधित किया था, इन दो घटनाओं का लाभ उठाने में हिन्दुत्ववादी कभी कोई कसर नहीं छोडते। जिन्हें दिन-रात गालिया! देते हो, सपने में भी जिसका चेहरा देखकर जल-भुन जाते हो, उसकी एक मधुर स्मृति इतनी मूल्यवान !
हिन्दुत्ववादियों की आ!ख में गांधीजी किरकिरी की तरह खटकते थे। 55 करोड रुपयों की तो बात ही क्या, पाकिस्तान किसी के सपने में नहीं था, तब से ये गांधीजी की हत्या करने के प्रयास में जुट गये थे। दुखद तथ्य यह है कि भारत में गांधीजी की हत्या के जो प्रयास हुए हैं, उनमें सबमें अधिक पूना के लोग ही शामिल थे। इस प्रकार के तीन प्रयासों में, और अन्त में हत्या में, खुद नाथूराम गोडसे शामिल था। 55 करोड रुपये का प्रश्न तो 12 जनवरी, 1948 को यानी गांधीजी की हत्या के 18 दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले, चार बार गांधीजी की- हत्या के प्रयास हिन्दुत्ववादियों ने क्यों किये थे, इसका उनर उनको देना चाहिए।
गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !
गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया। पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था। गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?
गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में किया गया। जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया। मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने वाले कपूर-कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे गुरुजी अभी जिन्दा हैं। 1944 में तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था। ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए ही करते रहे थे। जब पाकिस्तान का नामोनिशान भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या का प्रयास किया था ?
गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी वर्ष सितम्बर में, वर्धा में, किया गया था। गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी बम्बई न जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा। उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था। उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था। यह बात पुलिस-रिपोर्ट में दर्ज है। यह छुरा गांधीजी की मोटर के टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने अपने बचाव में दिया था। इस घटना के सम्बन्ध में प्यारेलाल (म.गांधी के सचिव) ने लिखा है : 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उसके बीच अकेला जा।!गा और वर्धा 1रेलवे स्टेशन1 तक पैदल चलू!गा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। कृबापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।
धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला। (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)
इस प्रकार प्रदर्शनकारी स्वयंसेवकों की यह योजना विफल हुई। 1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी दूर थी, जितनी जुलाई में थी।
गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था। गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर रखा गया था। उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधीजी बच गये। दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मु!ह से सकुशल वापस आया हू!। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहु!चाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया।'
नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गांधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद 'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा ? गांधीजी की हत्या से डेढ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित करता है कि वे गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे। 'अग्रणी' का यह अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है। 1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने की शक्यता तो दिखायी देने लगी थी, परन्तु 55 करोड रुपयों का तो उस समय कोई प्रश्न ही नहीं था। इसके बाद 20 जनवरी, 1948 को मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर, प्रार्थनागसभा में, बम फेंका और 30 जनवरी, 1948 के दिन नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।
55 करोड रुपयों के बारे में एक और हकीकत भी समझ लेना जरूरी है। देशगविभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पनि और नकद रकमों का, जनसंख्या के आधार पर, बटवारा किया गया था। उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल 75 करोड रुपये देना तय था। उसमें से 20 करोड रुपये दे दिये गये थे। और, 55 करोड रुपये देना अभी बाकी था। कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तान को यदि 55 करोड रुपये दिये गये, तो उसे वह सेना के लिए खर्च करेगा, यह कहकर 55 करोड रुपये भारत सरकार ने रोक लिए थे। लार्ड माउण्ट बेटन का कहना था कि यह रकम पाकिस्तान की है, अतः उन्हें दे दी जानी चाहिए। इस बात की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 55 करोड रुपये पाकिस्तान को दे देने की माउण्ट बेटन की बात का समर्थन किया। 12 जनवरी को गांधीजी ने प्रार्थना-सभा में अपने उपवास की घोषणा की थी, और उसी दिन 55 करोड रुपये की बात भी उठी थी। लेकिन गांधीजी का उपवास 55 करोड रुपये के लिए नहीं, दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए था।
जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में एक मौलाना ने आकर गांधीजी से कहा था कि पाकिस्तान का विरोध करने वाले हमारे जैसे राष्टंवादी मुसलमान पाकिस्तान जा नहीं सकते, और हिन्दू सम्प्रदायवादी हमें यहा! जीने नहीं देते। हमारे लिए तो यहा! नरक से भी बदतर स्थिति है। आप कलकना में उपवास कर सकते हैं, पर दिल्ली में नहीं करते ? ऐसी शिकायत भी उस मौलाना ने गांधीजी से की थी। गांधीजी मौलाना की बात सुनकर दुखी हो गये थे। दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए अनेक प्रयास होने के बावजूद शान्ति स्थापित नहीं हुई। अन्त में 13 जनवरी से गांधीजी ने उपवास आरम्भ कर दिया। यह उपवास साम्प्रदायिक शान्ति के लिए था, न कि 55 करोड रुपयों के लिए। 55 करोड रुपयों का सवाल तो संयोगवश उसी समय प्रस्तुत हो गया था। गांधीजी ने अपनी प्रार्थना-सभा में उपवास का हेतु स्पष्ट रूप से घोषित किया था और उसके बाद उनका उपवास समाप्त कराने के लिए हिन्दुत्ववादियों सहित तमाम सम्बन्धित पक्षों ने शान्ति की अपील पर हस्ताक्षर किये थे। इसके बावजूद भी हिन्दुत्ववादी झूठे प्रचार करते जा रहे हैं।
गांधीजी की हत्या करने वाले यह दावा करते हैं कि 55 करोड रुपये की घटना से उनेजित होकर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था। इसका अर्थ तो यह होता है कि यह षड्यंत्र 13 जनवरी के बाद रचा गया था। तो क्या मात्र सात दिनों में, गांधीजी पर बम फेंकने की घटना उस जमाने में सम्भव हो सकती थी ? मात्र 17 दिनों में ही हत्या करनेवाले इकट्ठे हो गये, षड्यंत्र रच लिया, ग्वालियर से पिस्तौल हासिल करके दिल्ली आये और गांधीजी की हत्या कर दी। इतने कम समय में षड्यंत्र रच लिया गया उस पर अमल भी हो गया, यह बात गले से नीचे उतरने लायक नहीं। 13 जनवरी को नाथूराम ने अपनी बीमे की पालिसी नाना आप्टे की पत्नी के नाम करा दी थी। अदालत ने भी अपने फैसले में 1 जनवरी, 1948 को षड्यंत्र-रचने का दिन माना है। कुछ क्षणों के लिए उनकी बात मान भी लें तो 55 करोड रुपयों का सवाल सामने आया उसके पहले से ही, गांधीजी की हत्या करने के प्रयास क्यों किये जाते रहे, यह प्रश्न अनुनरित ही रह जाता है। एक घटना को छोडकर, बाकी सभी प्रयास महाराष्टं में, और पूना के ही हिन्दुत्ववादियों द्वारा क्यों किये गये ? तीन प्रयास तो खुद नाथूराम गोडसे ने किये। इस तरह जाहिर है कि 55 करोड रुपये की बात तो बिलकुल झूठ है।
ऐसे होते हैं देशभक्त
गांधी की हत्या के साथ 55 करोड रुपयों का कोई सम्बन्ध नहीं हैं, इस बात की स्पष्टता के बाद अब हिन्दुत्ववादियों द्वारा प्रस्थापित तीसरे, 'मिथ' की भी चर्चा कर लें। यह तीसरा, 'मिथ' है कि गांधीजी के हत्यारे प्रामाणिक देशभक्त और बहादूर थे। जैसा कि इनके द्वारा प्रचारित किया जाता है। 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक में नाथूराम की ऐसी ही छवि उभारने की कोशिश की गयी है। जो लोग असत्य तथा अर्धसत्य का सहारा लेते हैं क्या उनको प्रामाणिक और बहादुर कहा जा सकता है ? जो लोग सन्दर्भ को तोड-मरोड कर झूठ फैलाते हैं उनको बदमाश कहते हैं या बहादूर ? इन लोगों ने गांधीजी की हत्या का असली कारण बताने का साहस किया होता तो जरूर उनको प्रामाणिक कहा जा सकता था। गांधीजी की हत्या के लिए किये गये पिछले निष्फल प्रयासों की जिम्मेदारी भी कबूल की होती, तो भी कुछ भिन्न बात होती। एक अहिंसानिष्ठ निःशस्त्र व्यक्ति की हत्या करना कोई मर्दानगी नहीं, कोरी नपुंसकता है। जो लोग तार्किक रीति से अपनी बात दूसरों को समझा नहीं सकते, वे ही लोग हिंसा का सहारा लेते हैं। हिंसा बुजदिलों का मार्ग है, शूरवीरों का नहीं। अपनी निष्फलता और हताशा में ही हिन्दुत्ववादियों ने गांधीजी की हत्या की थी। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या करने के प्रयास अधिकतर प्रार्थना-सभाओं में ही किये। जब सब लोग प्रार्थना में लीन हों, उस वक्त ये 'नरबा!कुरे' गांधीजी की हत्या करना चाहते थे। पूजा-प्रार्थना कर रहे आदमी पर हमला नहीं करना चाहिए, ऐसा हिन्दुत्ववादियों के प्रिय हिन्दू-युद्ध शास्त्र में कहा गया है। ये नामर्द तो अपनी संस्कृति का भी अनुसरण नहीं कर सकते। हजारों लोगों की उपस्थिति वाली, गांधीजी की प्रार्थना-सभा में बम फेंकने में भी इन लोगों को शर्म नहीं आयी। जिन लोगों के लिए निर्दोष व्यक्तियों की जान की कोई कीमत नहीं, उनको क्या प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ?

सरदार पटेल और आर.एस.एस.
ये लोग योजनाबद्ध तरीके से सरदार पटेल को हिन्दुत्ववादी साबित करने की नीच हरकतें कर रहे हैं। नाथूराम गोडसे का आर.एस.एस. से सम्बन्ध नहीं रहा है, ऐसा घोषित करने की भीख आर.एस.एस. के नेताओं ने नाथूराम से ही मा!गी थी। हकीकत यह है कि गांधी-हत्या के पाच वर्ष पहले तक नाथूराम आर.एस.एस. का प्रचारक था। आर.एस.एस. पर से प्रतिबन्ध उठाया जा सके, इसके लिए सरदार पटेल ने नाथूराम को ऐसा घोषित करने के लिए कहा था, यह दावा गोपाल गोडसे करते हैं। इस प्रकार सरदार पटेल हिन्दुत्ववादी थे, और आर.एस.एस. से मिले हुए थे, ऐसा गन्दा संकेत ये दो लोग बेशर्मी से करते हैं। आरम्भ में गुरु गोलवलकर की लिखी 'अवर नेशनहुड डिफाइन्डल् पुस्तक का उल्लेख किया गया है। इस पुस्तक का प्रकाशन 1939 में हुआ था। इस पुस्तक के कारण जब आर.एस.एस. के लिए कठिनाइया! बढने लगी, तब तुरन्त उससे छुटकारा पाने के लिए गुरु गोलवलकर ने इस पुस्तक के लेखक का नाम बदलकर बाबाराव सावरकर कर दिया। दूसरे के नाम की पुस्तक अपने नाम पर प्रकाशित कराने की बात हमने सुनी है। परन्तु इस आदमी ने तो अपनी चमडी बचाने के लिए अपनी ही पुस्तक दूसरे के नाम कर दी। ऐसे कायर और कपटी आदमी को क्या प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ? गोपाल गोडसे ने जेल से छूटने के लिए भारत सरकार को एकगदो बार नहीं, 22 बार अर्जी दी थी और ऐसे लोग अपने को शूरवीर कहते हैं। 1नेलसन मण्डेला तो 32 वर्ष जेल में रहे थे, और एक बार भी उन्होंने जेल से छूटने के लिए अर्जी नहीं दी थी।1 भारत सरकार ने गोपाल गोडसे को सजा की मुद्दत पूरी होने से पहले रिहा नहीं किया, इसलिए गोपाल गोडसे कहते हैं कि सरकार ने उनके साथ अन्याय किया। यह धूर्त आदमी, उसके तुरन्त बाद कहता हैं कि सरदार पटेल होते, तो हमारे ।पर यह अन्याय नहीं हुआ होता। एक निःशस्त्र इन्सान की प्रार्थना के वक्त हत्या करने वाले, सरासर झूठ बोलने वाले, निर्दोष व्यक्ति को अपने साथ कीचड में सानने की कोशिश करने वाले लोगों को क्या कभी भी प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त माना जा सकता है ?
भारतीय राजनीति में हिन्दुत्ववादी तो मूर्ख-शिरोमणि थे। गांधीजी की हत्या करके उन्होंने अपने ही पा!व पर कुल्हाडी मारी थी। गांधीजी की हत्या के साथ ही साम्प्रदायिक दंगे बन्द नहीं हुए होते, और उस स्थिति में हिन्दुत्ववादियों को शक्ति बढाने का मौका मिला होता। देश का साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक ताकतों का ध्रुवीकरण हुआ होता तो शायद भारत में सेक्यूलर संविधान और सेक्यूलर राज्य अस्तित्व में नहीं आया होता। गांधीजी ने तो अपने प्राणों की आहुति देकर भी देश की सेवा की, जबकि मूर्ख हिन्दुत्ववादियों ने महात्मा के प्राण लेकर अपने ही ध्येय को नुकसान पहचाया।
यह है गांधीगहत्या की वस्तुस्थिति। जैसे कि प्रारम्भ में ही कहा है कि नाथूराम गोडसे धर्म-जनूनी था, पागल नहीं। ठण्डे कलेजे से, षड्यंत्र रचकर उसने गांधीजी की हत्या की थी। दूसरी बात कि, गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये और मुसलमानों के प्रति उनके पक्षपाती रवैये के कारण नहीं, हताशा और ईर्ष्या के कारण की गयी थी। गांधीजी जब तक जीवित हैं तब तक अपना कुछ चलने वाला नहीं है, यह हकीकत उन्हें परेशान करती थी। इसी कारण कुछ लोग उन्हें गालिया! देते थे, कुछ लोग मौका देखकर तोडफोड करते थे, तो कुछ लोग उनकी हत्या करने का प्रयास करते थे। तीसरी बात कि, ये लोग प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त नहीं थे। काले-कारनामे करने वालों, झूठ फैलाने वालों, गन्दी शरारतें करने वालों तथा प्रार्थना करते हुए निःशस्त्र व्यक्ति की हत्या करने वालों को प्रामाणिक, बहादुर, देशप्रेमी तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। झूठगफरेब और षड्यंत्र साम्प्रदायिकता की राजनीति के अनिवार्य अंग हैं। साजिश करके ही इन्होंने सन् 1948 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में रामलीला की तसवीर रखवायी थी, षड्यंत्र करके ही मस्जिद तोडी गयी और अब मन्दिर बनाने की भी साजिश कर रहे हैं। देशप्रेम की चादर ओढे, हमारे आसपास घूमनेवाले, इन विकृत-कुण्ठित-मानस के षड्यंत्रकारियों को हमें अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू धन्य तेरी कुरबानी।
हो धन्य तेरी कुरबानी।
भूल नहीं सकती है दुनिया तेरी अमर कहानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
यह तेरा ही खून नहीं है मानवता का।
खून अमन का आजादी का दुखियारी जनता का।
सबके मुख पर आ!सू हैं सबके मुख पर वीरानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
हम सब तेरे कातिल हैं हम खूनी तेरे बापू।
पाप कभी यह धो न सकेंगे सारी कौम के आ!सू।
दाग कभी यह धो न सकेगा गंगा का भी पानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
तूने सीना तान के शाही ताकत को ललकारा।
'छोडो भारत' 'छोडो भारत' गज उठा था नारा।
जेलों में बन गयी बुढापा तेरी वीर जवानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
तू अ!धियारे भारत में उजियारा बनकर आया।
घर-घर जाकर तूने आजादी का दिया जलाया।
तुझसे ही हमने अपनी यह कीमत है पहचानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
तेरी कीमत पूछे कोई आज वह नोआखाली से।
कैसा फूल है टूटा अपने गुलशन की डाली से।
तूने सबका सुख-दुख बा!टा सबकी पीडा जानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
जलती आग में कूद के तूने फूटकी आग बुझाई।
अपनी जान ग!वाकर लाखों की जान बचाई।
आखिर सच की जीत हुई और हार झूठ ने मानी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
अमर रहेगा अमर रहेगा मौत से जो लडता है।
आजादी के नाम पे मरने वाला कब करता है ?
जब तक दुनिया है गजेगी तेरी अमृत वाणी।
धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....
                                अज्ञात

सत्य


सत्य का दिव्य संदेश
सत्य.... क्या है? यह एक कठिन प्रश्न है, लेकिन अपने लिए मैंने इसे यह कहकर सुलझा लिया है कि जो तुम्हारे अंतःकरण की आवाज कहे, वह सत्य है। आप पूछते हैं कि यदि ऐसा है तो भिन्न-भिन्न लोगों के सत्य परस्पर भिन्न और विरोधी क्यों होते हैं? चूंकि मानव मन असंख्य माध्यमों के जरिए काम करता हैऔर सभी लोगों के मन का विकास एक-सा नहीं होता इसलिए जो एक व्यक्ति के लिए सत्य होगा, वह दूसरे के लिए असत्य हो सकता है। अतः जिन्होंने ये प्रयोग किए हैं, वे इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि इन प्रयोगों को करते समय कुछ शर्तों का पालन करना जरूरी है।
ऐसा इसलिए है कि आजकल हर आदमी किसी तरह की कोई साधना किए बगैर अंतःकरण के अधिकार का दावा कर रहा है, और हैरान दुनिया को जाने कितना असत्य थमाया जा रहा है। मैं सच्ची विनम्रता के साथ तुमसे कहना चाहता हूं कि जिस व्यक्ति में विनम्रता कूट-कूट न भरी हो, उसे सत्य नहीं मिल सकता। यदि तुम्हें सत्य के सागर में तैरना है, तो तुम्हें अपनी हस्ती को पूरी तरह मिटा देना होगा ।
यंग, 31-12-1931, पृ. 428


केवल सत्य और प्रेम-अहिंसा-ही महत्वपूर्ण है। जहां ये हैं, वहां अंततः सब कुछ ठीक हो जाएगा। इस नियम का कोई अपवाद नहीं है।
यंग, 18-8-1927, पृ. 265
सर्वोच्च सिद्धांत
मेरे लिए सत्य सर्वोच्च सिद्धांत है, जिसमें अन्य अनेक सिंद्धांत समाविष्ट हैं। यह सत्य केवल वाणी का सत्य नहीं है अपितु विचार का भी है, और हमारी धारणा का सापेक्ष सत्य ही नहीं अपितु निरपेक्ष सत्य, सनातन सिद्धांत, अर्थात ईश्वर है। ईश्वर की असंख्य परिभाषाएं हैं, क्योंकि वह असंख्य रूपों में प्रकट होता है। ये असंख्य रूप देखकर मैं आश्चर्य और भय से अभिभूत हो जाता हूं और एक क्षण के लिए तो स्तंभित रह जाता हूं।
पर मैं ईश्वर को केवल सत्य के रूप में पूजता हूं। मैं अभी उसे प्राप्त नहीं कर सका हूं, पर निरंतर उसकी खोज में हूं। इस खोज में हूं। इस खोज में मैं अपनी सर्वाधिक प्रिय वस्तुओं का त्याग करने के लिए तैयार हूं। यदि मुझे इसके लिए अपने जीवन का भी उत्सर्ग करना पड़े तो मुझे आशा है कि मैं उसके लिए तैयार रहूंगा। लेकिन जब तक मुझे इस निरपेक्ष सत्य की प्राप्ति नहीं होती तब तक मुझे अपनी धारणा के सापेक्ष सत्य पर ही अवलंबित रहना होगा। तब तक यह सापेक्ष सत्य ही मेरा प्रकाशस्तंभ, मेरी ढाल और मेरी फरी है। यद्यपि सत्य की खोज का मार्ग कठिन और संकरा तथा तलवार की धार की तरह तेज है, पर मेरे लिए यह द्रqततम और सरलतम है। इस मार्ग पर दृढतापूर्वक चलते जाने के कारण, अपनी भयंकर भूलें भी मुझे नगण्य प्रतीत हुई है। इस मार्ग ने मुझे संताप से बचाया है और मैं अपनी प्रकाश-किरण का अनुगमन करते हुए आगे बढ़त गया हूं। मार्ग में चलते-चलते मुझे प्रायः निरपेक्ष सत्य-ईश्वर-की हल्की-सी झलक दिखाई दी है, और मेरा यह विश्वास दिनोंदिन दृढ़तर होता जाता है कि केवल ईश्वर ही वास्तविक है और शेष सब अवास्तविक।
सत्य की खोज
एक बात और मेरे मन में पक्की होती जा रही है कि जो कुछ मेरे लिए संभव है, वह एक बच्चे के लिए भी संभव है। यह बात मैं ठोस कारणों के आधार पर कह रहा हूं। सत्य की खोज के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं। अहंकारी व्यक्ति को वे काफी कठिन लग सकते हैं और अबोध शिशु को पर्याप्त सरल।
सत्य के खोजी को धूलि के कण से भी अधिक विनम्र होना चाहिए। धूलि के कणों को तो दुनिया अपने पैरों तले रौंदती है, लेकिन सत्य का खोजी इतना विनम्र होना चाहिए कि उसे धूलिकण भी रौंद सकें। तभी, और केवल तभी, उसे सत्य के दर्शन सम्भव होंगे।
ए, पृ. गअ


सत्य एक विशाल वृक्षकी तरह है। आप जितना उसका पोषण करेंगे, उतने ही ज्यादा फल यह देगा। सत्य की खान को जितना ही गहरा खोदेंगे, सेवा के नये-से-नये मार्गों के रूप में, यह उतने ही अधिक हीरे-जवाहरात देगा। वही, पृ. 159


मेरे विचार में, इस संसार में निश्चिंतताओं की आशा करना गलत है-यहां ईश्वर अर्थात सत्य के अलावा और सब कुछ अनिश्चित है। जो कुछ हमारे चारों ओर दिखाई देता है अथवा घटित हो रहा है, सब अनिश्चित है, अनित्य है। बस, एक ही सर्वोच्च सत्ता यहां है जो गोपन है किंतु निश्चित है, और वह व्यक्ति भाग्यशाली है जो इस निश्चित तत्व की एक झलक पाकर उसके साथ अपनी जीवन नैया को बांध देता है। इस सत्य की खोज ही जीवन का परमार्थ है।
वही, पृ. 184


सत्य की खोज में क्रोध, स्वार्थ, घृणा आदि विकार स्वभावतः छूटते जाते हैं अन्यथा सत्य की प्राप्ति असंभव ही हो जाए। जो व्यक्ति वासनाओं के वश में है, उसकी नीयत साफ होने पर भी वह कभी सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकेगा। सत्य की खोज में सफलता प्राप्त होने पर मनुष्य प्रेम और घृणा, सुख और दुख आदि के द्वंद्वों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
वही, पृ. 254-255
सत्य का दर्शन
सत्य की सार्वभौम एवं सर्वव्यापी भावना के प्रत्यक्ष दर्शन वही कर सकता है जो क्षुद्रतम प्राणी से भी उतना ही प्रेम कर सके जितना कि स्वयं को करता है। और जो ऐसा करने का आकांक्षी हो, वह जीवन के किसी क्षेत्र से अपने को असंपृक्त नहीं रख सकता। यही कारण है कि सत्य के प्रति मेरे अनुराग ने मुझे राजनीति के क्षेत्र में ला खड़ा किया है; और मैं बिना किसी हिचक के, किंतु विनम्रतापूर्वक यह नहीं जानते कि धर्म क्या है। वही, पृ. 370-71


सतत अनुभव ने मेरा यह विश्वास दृढ़ कर दिया है कि ईश्वर सत्य के अलावा और कुछ नहीं हैं.... सत्य की जो क्षणिक झलकियां..... मैं पा सका हूं, उनसे सत्य के अवर्णनीय तेज का वर्णन करना संभव नहीं है, सत्य का तेज नित्य दिखाई देने वाले सूर्य के प्रकाश से लाखों गुना प्रखर है।
यंग, 7-2-1929, पृ. 42


वस्तुतः मैं उस अतुल प्रभा की बहुत हल्की झलक ही पा सका हूं। लेकिन अपने अनुभव के बल पर मैं यह बात भरोसे के साथ कह सकता हूं कि सत्य का सर्वांग दर्शन वही कर सकता है जिसने अहिंसा को पूरी तरह अपना लिया हो। वही


सत्य प्रत्येक मनुष्य के हृदय में वास करता है, और मनुष्य को उसे वहीं खोजना चाहिए; सत्य जिसे जैसा दिखाई दे, वह उसी से निर्देशित हो। लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्य का जिस रूप में दर्शन करता है, उसके अनुसार चलने के लिए दूसरे लोगों पर जोर-जबर्दस्ती करे। हरि, 24-11-1933, पृ. 6
निरपेक्ष सत्य
निरपेक्ष सत्य को जानना मनुष्य के वश की बात नहीं है। उसका कर्तव्य है कि सत्य जैसा उसे दिखाई दे, उसका अनुगमन करे, और ऐसा करते समय शुद्धतम साधन अर्थात अहिंसा को अपनाए। वही


केवल ईश्वर ही निरपेक्ष सत्य को जानता है। इसीलिए मैंने प्रायः कहा है कि सत्य ही ईश्वर है। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य, जोकि सीमित क्षमता वाला प्राणी है, निरपेक्ष सत्य को नहीं जान सकता। हरि, 7-4-1946, पृ. 70


इस दुनिया में निरपेक्ष सत्य किसी को ज्ञात नहीं है। यह गुण केवल ईश्वर में है। हम सभी को सापेक्ष सत्य का ही ज्ञान है। इसलिए सत्य जैसा हमें दिखाई देता है, हम उसी का अनुगमन कर सकते हैं। सत्य का ऐसा अनुगमन किसी को भटका नहीं सकता। हरि, 2-6-1946, पृ. 167
सत्य और मैं
मैंने अपने जीवन में ऐसी बातें कहने की गलती कभी नहीं की है जिनका मेरा अभिप्राय न हो- मेरा स्वभाव बात की तह तक सीधे पहुंचने का है, और यदि मैं कुछ समय के लिए तह तक न पहुंच पाऊं तो भी मैं जानता हूं कि सत्य अंततः लोगों को अपनी वाणी सुनाने और महसूस कराने में सफल हो जाएगा। मेरे अनुभव में प्रायः ऐसा ही घटित हुआ है।
यंग, 20-8-1925, पृ. 285-86


मेरे जैसे सैकड़ों लोग नष्ट हो जाएं, पर सत्य की विजय हो। मेरे जैसे त्रुटिप्रवण मनुष्यों का मूल्यांकन करने के लिए सत्य के मानदंडों को लेशमात्र भी नीचा करने की आवश्यकता नहीं है।
ए, पृ. गअ


अपना मूल्यांकन करते समय मैं सत्य के समान कठोर बनने का प्रयास करूंगा और चाहता हूं कि अन्य लोग भी ऐसा ही करें। उस मानदंड से अपने को मापने पर मुझे सूरदास के सुर में मिलाकर कहना होगा...
"मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहि तनु दियो ताहि बिसरायो ऐसो नमकहरामी।।"
मेरी त्रुटियां
मैं कितना ही तुच्छ होऊं, पर जब मेरे माध्यम से सत्य बोलता है तब मैं अजेय बन जाता हूं।
वही, पृ. 71


मेरा अनुराग केवल सत्य के प्रति है, और मैं सत्य के अलावा किसी और का अनुशासन नहीं मानता। हरि, 25-5-1935, पृ. 115


मैं एक ही ईश्वर का दास हूं और वह है सत्य। हरि, 15-4-1939, पृ. 87


सत्य के प्रति आग्रह से जो शक्ति प्राप्त होती है, उसके अतिरिक्त मेरे पास कोई और शक्ति नहीं है। इसी आग्रह से अहिंसा का प्रस्फुटन होता है। हरि, 7-4-1946, पृ. 70


मैं सत्य का एक साधारण-सा किंतु बड़ा उत्साही खोजकर्ता हूं। अपनी खोज में मैं अपने साथी खोजकर्ताओं को अधिकतम विश्वास में लेकर चलता हूं ताकि मैं अपनी त्रुटियों को पहचान सकूं और उन्हें सुधार सकूं। मैं मानता हूं कि अपने अनुमानों और निर्णयों में मुझसे प्रायः गलतियां हुई हैं.... और चूंकि प्रत्येक ऐसे मामले में मैंने अपनी त्रुटि को सुधार लिया है, इसलिए कोई स्थायी हानि नहीं होने पाई है। बल्कि इससे अहिंसा का मौलिक सत्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उद्भासित हुआ है, तथा देश को किसी तरह की स्थायी हानि नहीं हुई है।
यंग, 21-4-1927, पृ. 128


मैं तो स्वयं ही नौसिखिया हूं, मुझे कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं करना, और मुझे जहां भी सत्य दिखाई देता है, मैं उसका पक्ष लेकर, उसके अनुसार कार्य करने का प्रयास करता हूं।
यंग, 11-8-1927, पृ. 250


मेरा विश्वास है कि पूरी नेकनीयती से काम करने पर भी यदि किसी से गलती हो जाए तो उससे वस्तुतः दुनिया की ही नहीं बल्कि किसी व्यक्ति की भी, कोई हानि नहीं होतीं अपने भीरु सेवकों की अनजाने में हुई गलतियों से ईश्वर दुनिया को कोई हानि नहीं पहुंचने देता।
मेरा अनुसरण करने के कारण जिनके गलत रास्ते पर चले जाने की आशंका है, उन्हें मेरे काम की जानकारी न भी होती तो भी वे उसी रास्ते पर जाते। कारण यह है कि मनुष्य अपने आचरण में अंततः अपनी अंतःप्रेरणा से ही परिचालित होता है, भले ही दूसरों के उदाहरण कभी-कभी उसका मार्गदर्शन करते प्रतीत होते हों। जो भी हो, मैं यह जानता हूं कि मेरी त्रुटियों के कारण दुनिया को कभी हानि नहीं उठानी पड़ी है क्योंकि ये त्रुटियां मुझसे अज्ञानवश हुई थीं। मुझे इस बात का दृढ़ विश्वास है कि मेरी जो त्रुटियां बताई जाती हैं, उनमें से एक भी त्रुटि मैंने जान-बूझकर नहीं की थी। यंग, 3-1-1929, पृ. 6


सच पूछा जाए तो, एक व्यक्ति को जो बात स्पष्टतया गलत लगती है, वह दूसरे को एकदम बुद्धिमत्तापूर्ण लग सकती है। वह विभ्रम में हो तब भी अपने को उसे करने से रोक नहीं सकता। तुलसीदास ने सच ही कहा है-
रजत सीप महुं भास जिमि जथा भानु कर बारि।
जदपि मृषा तिहुं काल सोइ भ्रम न सकइ काउ टारि।।
मेरे जैसे आदमियों के साथ, जो संभवतः महान विभ्रम से ग्रस्त हैं, यही होता रहेगा। ईश्वर निश्चित रूप से उन्हें क्षमा कर देग, पर दुनिया को ऐसे लागों को बरदाश्त करना चाहिए। अंततः सत्य की ही विजय होगी। वही


सत्य न्यायोचित ध्येय को कभी नुकसान नहीं पहुंचता। हरि, 10-11-1946, पृ. 389


जीवन एक आकांक्षा है। उसका ध्येय पूर्णता के लिए प्रयास करना है, जो आत्मसिद्धि ही है। अपनी दुर्बलताओं अथवा अपूर्णताओं के कारण ध्येय को नीचा नहीं करना चाहिए। मुझे इस बात का दुखद बोध है कि मेरे अंदर दुर्बलताएं भी हैं और अपूर्णताएं भी। मैं इन्हें दूर करने में सहायता देने के लिए प्रतिदिन सत्य के समक्ष मौन आर्तनाद करता हूं।
हरि, 22-6-1935, पृ. 145
सत्य का परित्याग नहीं
मेरा विश्वास करो, मैं अपने 60 वर्ष के व्यक्तिगत अनुभव से कहता हूं कि सत्य के मार्ग का परित्याग करना ही वास्तविक दुर्भाग्य है। यदि तुम इसे समझ सको तो ईश्वर से तुम्हारी एक ही प्रार्थना होगी कि सत्य का अनुसरण करते हुए तुम्हें कितनी भी परीक्षाओं और कठिनाइयों से गुजरना पड़े, ईश्वर तुम्हें उनसे पार पाने की सामर्थ्य दे। हरि, 28-7-1946, पृ. 243


केवल सत्य ही टिकेगा, बाकी सब कालकवलित हो जाएगा। इसलिए मुझे सभी त्याग दें तो भी मुझे सत्य का साक्षी बने रहना चाहिए। मेरी वाणी आज अरण्यरोदन हो सकती है, किंतु यदि यह सत्य की वाणी है तो शेष सभी वाणियां मूक हो जाने के  ांत मेरी वाणी ही सुनाई देगी।
हरि, 25-8-1946, पृ. 284


सारी दुनिया झूठ की चपेट में आती प्रतीत हो तो भी आस्थावान व्यक्ति सत्य का परित्याग नहीं करेगा। हरि, 22-9-1946, पृ. 322


प्रासंगिक होने पर, सत्य अवश्य कह देना चाहिए, चाहे वह कितना ही अप्रिय हो। जो अप्रासंगिक है, वह सदा असत्य है, और उसे कभी नहीं कहना चाहिए।
हरि, 21-12-1947, पृ. 473
10. सत्य ईश्वर है
ईश्वर है
एक ऐसी अपरिभाषेय रहस्यमय शक्ति है जो सर्वत्र व्याप्त है। मैं उसका अनुभव करता हूं, हालांकि वह दिखाई नहीं देती। यह अदृश्य शक्ति महसूस तो होती है लेकिन उसका कोई प्रमाण देना संभव नहीं है, क्योंकि यह इंद्रियग्राह्य वस्तुओं से सर्वथा भिन्न है। यह इंद्रियातीत है। लेकिन ईश्वर के अस्तित्व का थोड़ा-सा तर्क दिया जा सकता है।
मुझे एक क्षीण अनुभूति होती है कि जहां मेरे चारों ओर मौजूद सभी चीजें निरंतर परिवर्तनशील हैं, निरंतर नाशवान हैं, वहां इन सारे परिवर्तनों के पीछे एक ऐसी जीवंत शक्ति है जो परिवर्तनरहित है जो सबको धारण करती है, सबकी सृष्टि करती है, संहार करती है, और पुनः सृजन करती हैं सभी को अनुप्राणित करनेवाली यह शक्ति अथवा आत्मा ही ईश्वर है। और चूंकि केवल इंद्रियों से ग्राह्य अन्य कोई वस्तु अनश्वर नहीं हो सकती और न होगी, इसलिए केवल ईश्वर ही अनश्वर है।
यह शक्ति उपकारी है अथवा अपकारी? मुझे यह विशुद्ध रूप से उपकारी लगती है। कारण कि, मैं पाता हूं कि मृत्यु के बीच जीवन का सातत्य है, झूठ के बीच सत्य का सातत्य है और अंधकार के बीच प्रकाश का सातत्य है। इसलिए मैं समझता हूं कि ईश्वर जीवन है, सत्य है, प्रकाश है। वह साक्षात प्रेम है। वही सर्वोच्च शुभ है।
मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं.... तर्क के द्वारा.... तुमको आश्वस्त नहीं कर सकता। आस्था तर्क से ऊपर है। मैं यही परामर्श दे सकता हूं.... कि असंभव को संभव बनाने का प्रयास न करो। दुनिया में बुराई क्यों है, इसका कोई तर्कपूर्ण उत्तर मैं नहीं दे सकता। ऐसा प्रयास करना ईश्वर की बराबरी करना होगा। अतः मैं पूरी विनम्रता के साथ बुराई के अस्तित्व को मान लेता हूं, और कहता हूँ कि ईश्वर दीर्घकाल से पीड़ा भोग रहा है और धैर्य प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि उसने दुनिया में बुराई को चलते रहने की अनुमति दी है। मैं जानता हूं कि ईश्वर में बुराई का लेश भी नहीं है, पर फिर यदि दुनिया में बुराई है तो उसका सर्जक वही है, यद्यपि वह उसे छू नहीं सकती।
मैं यह भी जानता हूं कि यदि मैं बुराई से न लडूं और इस संघर्ष में प्राणों की बाजी न लगा दूं तो मैं कभी ईश्वर को नहीं जान पाऊंगा। मेरे साधारण और सीमित अनुभव ने मेरे इस विश्वास को और भी दृढ़ कर दिया है। मैं जितना ही शुद्ध बनने का प्रयास करता हूं, अपने को उतना ही ईश्वर के निकट अनुभव करता हूं। मेरी आस्था जब एक बहाना मात्र नहीं रह जाएगी, जैसी कि वह आज है, अपितु हिमालय की तरह अडिग और उसके शिखरों पर मंडित हिम के समान धवल तथा प्रकाशमान हो जाएगी तो मैं ईश्वर के कितने निकट पहुंच पाऊंगा।
यंग, 11-10-1928, पृ. 340-41
मेरी आस्था
संसार का परित्याग तो मेरे लिए सरल है। लेकिन मैं ईश्वर का परित्याग करूं, यह अविचारणीय है। यंग, 23-2-1922, पृ. 112


मैं जानता हूं कि मैं कुछ भी करने में समर्थ नहीं हूं। ईश्वर सर्वसमर्थ है। हे प्रभो, मुझे अपना समर्थ साधन बनाएं और जैसे चाहें, मेरा उपयोग करें। यंग, 9-10-1924, पृ. 329


मैंने ईश्वर के न तो दर्शन किए हैं और न ही उन्हें जाना है। मैंने ईश्वर के प्रति दुनिया की आस्था को अपनी आस्था बना लिया है, और चूंकि मेरी आस्था अमिट है, मैं उस आस्था को ही अनुभव मानता हूं। लेकिन यह कहा जा सकता है कि आस्था को अनुभव मानना तो सत्य के साथ छेड़छाड़ करना है; सचाई शायद यह है कि ईश्वर के प्रति अपनी आस्था का वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं। ए, पृ. 206


आप और मैं इस कमरे में बैठे हैं, इस तथ्य से भी ज्यादा पक्का भरोसा मुझे ईश्वर के अस्तित्व में है। इसलिए मैं यह भी निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि मैं वायु और जल के बिना तो जीवित रह सकता हूं, पर ईश्वर के बिना नहीं रह सकता। आप मेरी आंखें निकाल लें, पर मैं उससे मरूंगा नहीं। आप मेरी नाक काट लें, पर मैं उससे मरूंगा नहीं । पर ईश्वर के प्रति मेरी आस्था को ध्वस्त कर दें तो मैं मर जाऊंगा।
आप इसे अंधविश्वास कह सकते हैं, पर मैं स्वीकार करता हूं कि मैं इस अंधविश्वास को उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक गले लगाए हूं, जिस प्रकार कोई खतरा या संकट आने पर मैं अपने बचपन में राम नाम का श्रद्धापूर्वक जप करने लग जाता था। इसकी सीख मुझे एक बूढ़ी परिचारिका ने दी थी।
हरि, 11-5-1938, पृ. 109


मेरा विश्वास है कि हम सभी ईश्वर के संदेशवाहक बन सकते हैं, यदि हम मनुष्य से डरना छोड़ दें और केवल ईश्वर के सत्य की शोध करें। मेरा पक्का विश्वास है कि मैं केवल ईश्वर के सत्य की शोध कर रहा हूं और मनुष्य के भय से सर्वथा मुक्त हो गया हूं।
......मुझे ईश्वरीय इच्छा का कोई प्रकाट्य नहीं हुआ है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के सामने नित्य अपना प्रकटन करता है, लेकिन हम अपनी 'अंतर्वाणी' के लिए कान बंद कर लेते हैं। हम अपने सम्मुख दैदीप्यमान अग्निस्तंभ से आंख मींच लेते हैं। मैं उसे सर्वव्यापी पाता हूं।
यंग, 25-5-1921, पृ. 161-62


मुझे पत्र लिखने वालों में से कुछ यह समझते हैं कि मैं चमत्कार दिखा सकता हूं। सत्य के पुजारी होने के नाते मेरा कहना है कि मेरे पास ऐसी कोई सामर्थ्य नहीं है। मेरे पास जो भी शक्ति है, वह ईश्वर देता है। लेकिन वह सामने आकर काम नहीं करता। वह अपने असंख्य माध्यमों के जरिए काम करता है।
हरि, 8-10-1938, पृ. 285
ईश्वर की प्रकृति
मेरे लिए ईश्वर सत्य है और प्रेम है, ईश्वर आचारनीति है और नैतिकता है, ईश्वर अभय है। ईश्वर प्रकाश और जीवन का स्त्रोत  है और फिर भी इन सबसे ऊपर और परे है। ईश्वर अंतःकरण है। वह नास्तिक की नास्तिकता भी है, चूंकि अपने असीम प्रेमवश ईश्वर नास्तिक को भी रहने की छूट देता है। वह हृदयों का स्वयं हमसे बेहतर जानता है। वह हमारी कही हुई बातों को सच नहीं मानता, क्योंकि वह जानता है कि कई बार जान-बुझकर और कई बार अनजाने, हम जो बोलते हैं, हमारा अभिप्राय वह नहीं होता।
जिन्हें ईश्वर की व्यक्तिगत उपस्थिति की दरकार है, उनके लिए वह व्यक्तिगत ईश्वर है। जिन्हें उसका स्पर्श चाहिए, उनके लिए वह साकार है। वह विशुद्धतम तत्व है। जिन्हें आस्था है, उनके लिए तो बस वह है। वह सब मनुष्यों के लिए सब कुछ है। वह भीतर है, फिर भी हमसे ऊपर और परे है.....
उसके नाम पर घृणित दुराचार या अमानवीय क्रूरताएं की जाती हैं, पर इनसे उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हो सकता। वह दीर्घकाल से पीड़ा भोग रहा है। वह धैर्यवान है, पर भयंकर भी है। वह इस दुनिया और आने वाली दुनिया की सबसे कठोर हस्ती है। जैसा व्यवहार हम अपने पड़ौसियों-मनुष्यों और पशुओं-के साथ करते हैं, वैसा ही ईश्वर हमारे साथ करता है।
वह अज्ञानता को क्षमा नहीं करता। इसके बावजूद नित्य क्षमाशील है, क्योंकि वह हमें सदा पश्चाताप करने का अवसर देता है।
संसार में उस जैसा लोकतांत्रिक दूसरा नहीं है, क्योंकि वह हमको अच्छाई और बुराई में से चुनाव करने के लिए 'स्वतंत्र' छोड़ देता है। उस जैसा अत्याचारी भी आज तक नहीं हुआ जो प्रायः हमारे होठों से प्याला छीन लेता है और स्वेच्छा के नाम पर, हमें हाथ-पैर फेंकने के लिए अत्यंत संकुचित क्षेत्र देकर फिर हमारी विवशता पर हंसता है।
इसीलिए हिंदू धर्म में कहा गया है कि यह सब उसका खेल अर्थात उसकी 'लीला' है, अथवा भ्रम यानी माया है। हम नहीं हैं, मात्र वही है। यदि हम हैं तो हमें निरंतर उसका स्तुतिगान करना है और उसकी इच्छानुसार कार्य करना है। हम उसकी बंसी की धुन पर नाचें तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। यंग, 5-3-1925, पृ. 81


जहां तक मैं समझता हूं, ईश्वर दुनिया का सबसे कठोर अधिकारी है; वह तुम्हारी जमकर परीक्षा लेता है। और जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारी आस्था डिग रही है या तुम्हारा शरीर जवाब दे रहा है और तुम डूब रहे हो, वह किसी-न-किसी प्रकार तुम्हारी सहायता के लिए आ पहुंचता है और यह सिद्ध कर देता है कि तुम्हें अपनी आस्था नहीं छोड़नी चाहिए। वह सदा तुम्हारे इशारे पर दौड़ा चला आएगा, लेकिन अपनी शर्तों पर, तुम्हारी शर्तों पर नहीं। मैंने तो उसे ऐसा ही पाया है। मुझे एक भी उदाहरण ऐसा याद नहीं आता जब ऐन मौंके पर उसने मेरा साथ छोड़ दिया हो। स्पीरा, पृ. 1069


शैशवकाल में मुझे विष्णुसहत्रनाम का पाठ करना सिखाया गया था। लेकिन भगवान के ये हजार नाम ही नहीं हैं। हिंदुंओं का विश्वास है-और मैं समझता हूं कि यह सत्य है-कि संसार में जितने प्राणी हैं, उतने ही भगवान के नाम हैं। इसीलिए हम यह भी कहते हैं कि भगवान अनाम है, और चूंकि भगवान के अनेक रूप हैं इसलिए हम उसे निराकार मानते हैं कि वह अवाक है, इत्यादि। जब मैंने इस्लाम का अध्ययन किया तो मैंने पाया कि इस्लाम में भी खुदा के बहुत से नाम हैं।
जो कहते हैं कि ईश्वर प्रेम है, उनके साथ स्वर मिलाकर मैं भी कहूंगा कि ईश्वर प्रेम है। लेकिन अपने अंतरतम में मेरा मानना है कि यद्यपि ईश्वर प्रेम है, पर सर्वोपरि ईश्वर सत्य है। यदि मनुष्य की वाणी के लिए ईश्वर का पूरा-पूरा वर्णन करना संभव हो तो मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि, जहां तक मेरा संबंध है, ईश्वर सत्य है।
लेकिन दो वर्ष पहले मैंने एक कदम और आगे बढ़कर कहा कि सत्य ईश्वर है। इन दो कथनों-ईश्वर सत्य है और सत्य ईश्वर है- के सूक्ष्म भेद को आप समझें। मैं इस निष्कर्ष पर लगभग पचास वर्ष तक सत्य की निरंतर खोज करते रहने के बाद पहुंचा हूं।
मैंने तब पाया कि सत्य तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता प्रेम के माध्यम से है। लेकिन मैंने देखा कि कम-से-कम अंग्रेजी भाषा में, प्रेम के अनेक अर्थ हैं और वासना के अर्थ में मानव प्रेम पतनकारी प्रवृत्ति भी हो सकता है। मैंने यह भी देखा कि 'अहिंसा' के अर्थ में, प्रेम को मानने वाले लोग, इस दुनिया में बहुत कम हैं। लेकिन सत्य के कभी दो अर्थ मैंने नहीं देखें और नास्तिक भी सत्य की आवश्यकता अथवा शक्ति के विषय में आपत्ति नहीं करते।
लेकिन सत्य की खोज करने के उत्साह में, नास्तिकों ने ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है जो उनकी दृष्टि से सही है। इस तर्क के कारण ही मुझे लगा कि 'ईश्वर सत्य है' के स्थान पर मुझे 'सत्य ईश्वर है' कहना चाहिए। यंग, 31-12-1931, पृ. 427-28


ईश्वर सत्य है, पर वह और भी बहुत कुछ है। इसीलिए मैं कहता हूं कि सत्य ईश्वर है... केवल यह स्मरण रखें कि सत्य ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुण नहीं है। सत्य तो ईश्वर का जीवंत स्वरूप है, यही जीवन है, मैं सत्य को ही परिपूर्ण जीवन मानता हूं। इस प्रकार यह एक मूर्त वस्तु है, क्योंकि संपूर्ण सृष्टि, संपूर्ण सत्ता ही ईश्वर है और जो कुछ विद्यमान है- अर्थात सत्य- उसकी सेवा ईश्वर की सेवा है। हरि, 25-5-1935, पृ. 115


पूर्णता ईश्वर का गुण है, पर qिर भी वह कितना लोकतांत्रिक है। वह हमारी कितनी बुराइयों और छल-कपट को बरदाश्त करता है। वह यहां तक बरदाश्त करता हैं कि हम, जो उसी की अकिंचन सृष्टि हैं, उसके अस्तित्व पर ही शंका करें, यद्यपि वह हमारें चारों ओर और हमारे भीतर प्रत्येक अणु में विद्यमान है। लेकिन यह अधिकार उसने अपने पास सुरक्षित रखा है कि वह जिसे चाहता है, उसे अपना साक्षात कराता है। उसके न हाथ हैं, न पैर हैं, और न और कोई अंग हैं लेकिन वह जिसे अपना साक्षात कराना चाहे, वह उसका दर्शन कर सकता है।
हरि, 14-11-1936, पृ. 314
सेवा के द्वारा ईश्वर
यदि मैं अपने अंदर ईश्वर की उपस्थिति अनुभव न करता तो प्रतिदिन इतनी कंगाली और निराशा देखत-देखते प्रलापी पागल हो गया हात या हुगलनी में छलांग लगा लेता।
यंग, 6-8-1925, पृ. 275


यदि मुझे भारत के सबसे हीन, बल्कि विश्व के सबसे हीन, व्यक्तियों के दुख के साथ अपना तादात्म्य करना है तो मुझे अपनी देखरेख में रहने वाले साधारण व्यक्तियों के पापों के साथ तादात्म्य करना चाहिए। और, मुझे आशा है कि पूर्ण विनम्रता के साथ ऐसा करते-करते मैं किसी दिन ईश्वर-सत्य-का साक्षात कर सकूंगा। यंग, 3-12-1925, पृ. 422


मैं ईश्वर को मानवता की सेवा के जरिए पाने का प्रयास कर रहा हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि ईश्वर न स्वर्ग में है, न पाताल में, बल्कि हम सब में है। यंग, 4-8-1927, पृ. 247-48


मैं समष्टि का एक अंग हूं, और ईश्वर को श्sाष मानवता से पृथक ढूंढ नहीं सकता। मेरे देशवासी मेरे सबसे निकटस्थ पड़ोसी हैं। वे इतने असहाय, साधनहीन और जड़ हो गए हैं कि मुझे अपना पूरा ध्यान उनकी सेवा पर लगा देना चाहिए। यदि मैं अपने को यह विश्वास दिला सकता कि ईश्वर हिमालय की गुफा में मिलेगा तो मैं तत्काल वहां के लिए प्रस्थान कर देता। लेकिन मैं जानता हूं कि मानवता से दूर वह नहीं ढूंढा जा सकता। हरि, 29-8-1936, पृ. 226


मैं अपने लाखों-करोड़ों देशवासियों को जानता हूं। मै। दिन के चौबीसों घंटे उनके साथ रहता हूं। उनकी सेवा करना मेरा प्रथम और अंतिम कर्तव्य है, क्योंकि करोड़ों मूक लोगों के हृदयों के अलावा कहीं और ईश्वर की उपस्थिति मैं स्वीकार नहीं करता। इन मूक व्यक्तियों को ईश्वर की उपस्थिति का आभस नहीं होता, मुझे होता है। और, मै। इन लाखों-करोड़ों लोगों की सेवा के जरिए ईश्वर जो सत्य है अथवा सत्य जो ईश्वर है, उसकी पूजा करता हूं।
हरि, 11-3-1939, पृ. 44
पथप्रदर्शक और संरक्षक
मुझे आगे बढ़ना होगा... ईश्वर को अपना एकमात्र पथप्रदर्शक मानते हुए। वह बड़ा ईर्ष्यालु स्वामी है। अपने प्राधिकार में किसी की भागीदारी नहीं होने देगा। इसलिए उसके सम्मुख अपनी सभी दुर्बलताओं के साथ, खाली हाथ और पूर्ण समर्पण के भाव से उपस्थित होना होगा। और तब वह तुम्हें पूरी दुनिया का सामना करने की शक्ति देगा और सभी खतरोंसे तुम्हारी रक्षा करेगा।
यंग, 3-9-1931, पृ. 247


मैंने एक सबक सीखा है कि जो काम मनुष्य के लिए असंभव है, वह ईश्वर के लिए बच्चों का खेल है, और यदि हमें उस ईश्वर पर विश्वास है जो अपनी निकृष्टतम सृष्टि का भी भाग्यविधाता है तो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि सब कुछ संभव है; मैं इसी अंतिम आशा में जीता और अपना समय व्यतीत करता हूं तथा ईश्वर की इच्छा का पालन करने का प्रयास करता हूं।
यंग, 19-11-1931, पृ. 361


घोर निराशा में भी जब सारी दुनिया में न कोई सहायक दिखाई देता है, न सांत्वना देने वाला, तब उसी का नाम शक्ति प्रदान करके हममें प्रेरणा जगाता है और सभी शंकाएं तथा निराशाएं दूर भगा देता है। आज आकाश मेघाच्छन्न हो सकता है, पर ईश्वर से की गई भक्तियुक्त प्रार्थना उन्हें अवश्य छांट देगी। यह प्रार्थना का ही प्रभाव है कि मुझे कभी निराशा का मुंह नहीं देखना पड़ा है।
.....मैं कभी निराश नहीं हुआ हूं। तब तुम क्यों निराश होते हो? हम प्रार्थना करें कि यह हमारे हृदयों से क्षुद्रता, नीचता और छल को समाप्त करके उन्हें निर्मल कर दे; वह हमारी प्रार्थना अवश्य सुनेगा। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूं जिन्होंने शक्ति के इस अमोघ स्त्रोत  का सहारा लिया है। हरि, 1-6-1935, पृ. 123


मैंने देखा है, और मेरा विश्वास है, कि ईश्वर शरीर नहीं बल्कि कार्यरूप में प्रकट होता है और इसी से आपको घोर विपत्तियों से छुटकारा मिलता है। हरि, 10-12-1938, पृ. 373


व्यक्तिगत आराधना का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। यह निरंतर और यहां तक कि अचेतन रूप से, चलती रहती है। एक क्षण भी ऐसा नहीं जाता जब मैं उस साक्षी की उपस्थिति का अनुभव न करूं जिसकी आंख से कोई चीज चूक नहीं सकती; मैं इसी साक्षी के अनुरूप चलने का प्रयास करता हूं।
मैंने कभी उसे बेखबर नहीं पाया। जेलों में कठिन परीक्षाओं के दौरान जब मेरी स्थिति ठीक नहीं थी और क्षितिज घोर अंधकारमय दिखाई देता था तब मैंने उसे अपने निकट खड़ा पाया। मुझे अपने जीवन का एक क्षण भी ऐसा याद नहीं हैं जब मुझे लगा हो कि ईश्वर ने मेरा साथ छोड़ दिया है। हरि, 24-12-1938, पृ. 395
आत्मसाक्षात्कार
मेरा विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य के लिए उस धन्य, अवर्णनीय एवं पापमुक्त स्थिति का प्राप्त करना संभव है जिसमें वह अपने अंतःकरण में ईश्वर-मात्र ईश्वर-की उपस्थिति का अनुभव करता है।
हरि, 17-11-1921, पृ. 368


मैं जो प्राप्त करना चाहता हूं- जिसके लिए प्रयासरत और लालायित हूं.... वह है आत्मसाक्षात्कार अर्थात ईश्वर का साक्षात, मोक्ष की प्राप्ती। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मैं जीता तथा चलता-फिरता हूं और अपना सत्व बनाए हुए हूं। मेरे सभी भाषण, समस्त लेखन और राजनीतिक क्षेत्र के सभी कार्य उसी लक्ष्य की और अभिमुख हैं। ए, पृ. गपअ


यह विचार मुझे निरंतर यंत्रणा देता रहता है कि जिसका मेरे जीवन की हर श्वास पर अधिकार है और जिसकी मैं संतान हूं, उससे अभी तक कितनी दूर हूं। मैं जानता हूं कि अपने अंदर की दुष्ट वासनाओं के कारण ही मैं उससे इतनी दूर हूं और फिर भी, मैं उन वासनाओं से अपने का मुक्त नहीं कर पाता। वही, पृ. गअप


ईश्वर में यह विश्वास आस्था पर आधारित होना चाहिए जो तर्कातीत है। वस्तुतः तथाकथित सिद्धि के मूल में भी आस्था का तत्व होता है जिसके अभाव में वह टिक नहीं सकती। ऐसा होना अनिवार्य है। अपने सत्व की सीमाओं का अतिक्रमण कौन कर सकता है?
मेरी धारणा है कि इस पार्थिव जीवन में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करना असंभव है। यह आवश्यक भी नहीं है। मनुष्य जिस पूर्ण आध्यात्मिक ऊंचाई तक पहुंच सकता है, उसे प्राप्त करने के लिए केवल एक जीती-जागती अटूट आस्था की आवश्यकता है। ईश्वर हमारी इस नश्वर देह से बाहर नहीं है। इसलिए, आवश्यकता हो तो भी, बाह्य प्रमाण का कोई विशेष लाभ नहीं है।
हम इंद्रियों के माध्यम से ईश्वर का अनुभव नहीं कर सकते, क्योंकि वह इंद्रियातीत है। हम चाहें तो इंद्रियों से अपने को मुक्त करके, ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं। हम सबके भीतर अनहद नाद हो रहा है, लेकिन हमारी इंद्रियों का कोलाहल उस कोमल संगीत को दबा देता है- यह वह संगीत है जो हमारी इंद्रियों के लिए ग्राह्य अथवा श्रव्य किसी भी संगीत से भिन्न एवं अत्यधिक श्रेष्ठ है।
हरि, 13-6-1936, पृ. 140-41
11. सत्य और सौंदर्य
कला की आंतरिकता
वस्तुओं के दो पक्ष होते है। ...बाह्य और आंतरिक... बाह्य का मूल्य केवल यह है कि वह आंतरिक की सहायता करे। इस प्रकार प्रत्येक सच्ची कला आत्मा की अभिव्यक्ति होती है। बाहय रूपों का मूल्य यही है कि वे मनुष्य की आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति हैं।
यंग, 13-11-1924, पृ. 377


मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं, और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है, लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता। वही


प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाहय रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।
हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों; मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश हो निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की स्वकृत कला कभी नहीं कर सकती।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गईZ कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इंकार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि ये प्राकृतिक सौंदर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। मानवकृत इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती है। वही
पहले सत्य
सत्य की शोध पहली चीज है, सौंदर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था; ऐसे ही मोहम्मद भी थे जिनकी कुरान संपूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है-कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौंदर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौंदर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा। यंग,220-11-1924, पृ. 386
करोड़ों के लिए कला
अन्य सभी बातों की तरह इसमें भी मैं करोड़ो जनता के संदर्भ में सोचता हूं। करोड़ो लोगों को अपने में ऐसा सौंदर्य-बोध पैदा करने का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता कि वे सौंदर्य में सत्य के दर्शन कर सकें। इसलिए पहले उन्हें सत्य के दर्शन कराओ, सौंदर्य के दर्शन वे बाद में कर लेंगे.....इन करोड़ों लोगों के लिए जो भी उपयोगी हो सकता है, मेरी दृष्टि में वही सुंदर है। पहले उन्हें जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुं दो, शोभा और अलंकरण की वस्तुं बाद में आ जाएंगी। वही


मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। हरि, 14-11-1936, पृ. 315


वही कला कला है जो सुखकर हो। यंग, 27-5-1926, पृ. 196


आखिर, कला बड़े पैमाने पर उत्पादन करनेवाली निर्जीव विद्युतचालित मशीनों के जरिए तो प्रकट की नहीं जा सकती, उसके लिए तो पुरुषों और त्रियों के हाथों का कोमल सजीव स्पर्श चाहिए। यंग, 14-3-1929, पृ. 86
आंतरिक शुचिता
सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठीभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केंौित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है..... सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए।
यंग,
11-8-1921, पृ. 253


आखिर, सच्चा सौंदर्य हृदय की शुचिता में ही तो निहित है। ए, पृ. 228


मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं, लेकिन मैं उनको उतना महत्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर, मैं उन कार्यकलापों के महत्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है।
जीवन सब कलाओं से बढ़ कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या? एग्रे, पृ. 65-66


हमने किसी तरह यह विश्वास पाल लिया है कि कला व्यक्तिगत जीवन की शुचिता से स्वतंत्र है। मैं अपने संपूर्ण अनुभव के बल पर कह सकता हूं कि इससे ज्यादा झूठी बात और कोई नहीं हो सकती। अब जबकि मैं अपने ऐहिक जीवन की अंतिम अवस्था में हूं, मेरा कहना है कि जीवन की शुचिता सबसे ऊंची ओर सबसे सच्ची कला है। आवाज का परिष्कार करके अच्छा संगीत उत्पन्न करने की कला बहुत-से लोग अर्जित कर सकते हैं, लेकिन शुचितापूर्ण जीवन के सामंजस्य से वैसा संगीत पैदा करने की कला बिरले ही लोगों में आ सकती है।
हरि,
19-2-1938, पृ. 10
सत्य में सौंदर्य
मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौंदर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी-अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौंदर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौंदर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौंदर्य के दर्शन करने लगेंगे तब सच्ची कला का उदय होगा। यंग, 13-11-1924, पृ. 377


सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाहय रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य के आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौंदर्य.... नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन, कहते हैं कि, उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में, सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया, और आपकी याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अंदर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौंदर्य के दर्शन का अभ्यस्त था। वही


सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं। वही


ये सुंदर दृश्य (सूर्यास्त अथवा तारों भरी रात में जगमगता अर्धचंद्र') सत्यमय हैं, क्योंकि इन्हें देखकर मेरा ध्यान इनके सर्जक की ओर आकर्षित होता है। इनकी सृष्टि के केंद्र में सत्य है, इसीलिए तो ये सुंदर हैं। जब मैं सूर्यास्त के अद्भुत दृश्य अथवा चंद्रमा के सौंदर्य की सराहना करता हूं तो मेरी आत्मा विकसित होकर इनके सर्जक की आराधना में तल्लीन हो जाती है। मैं इन सभी दृश्यों में ईश्वर और उनकी अनुकंपाओं के दर्शन करता हूं। लेकिन ये सूर्यास्त और सूर्योदय भी यदि मुझे ईश्वर के स्मरण में सहायक न हों तो मात्र अवरोध ही सिद्ध होंगे। आत्मा की उड़ान में अवरोध पैदा करने वाली हर चीज एक भ्रम है और पाश है; देह भी ऐसी ही चीज है जो प्रायः मुक्ति के पथ में अवरोध पैदा करती है।
हरि,
13-11-1924, पृ. 378


तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है। लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष्य के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है। हरि, 7-4-1946, पृ. 67
(स्त्रोत  : महात्मा गांधी के विचार)