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आज कई लोग जन लोकपाल बिल के साथ खड़े नहीं हैं उनका मानना है कि किसी एक कानून से बदलाव नहीं लाया जा सकता या फिर देश में पहले ही भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये कई कानून हैं ज़रूरत है उनको मज़बूत बनाने की. अन्ना को नौटंकी बताने वाले अलग अलग तबकों से हैं जैसे ओबामा के भारत आने पर सड़कों पर उतरने वाले लोग, नक्सल कार्यवाई के विरोध में ग्रहमंत्री को काले झंडे दिखाने वाले लोग, इंडिया के क्रिकेट मैच हार जाने पर भिन्नाने वाले लोग. कई लोगों का ये भी मानना है कि अन्ना के पीछे विदेशी ताकतें हैं वर्ना कोई समाजिक कार्यकर्ता इतना समर्थन कैसे जुटा सकता है. कई ये भी कहते हैं कि ये आंदोलन ब्राहमणवादी है इसमे दलितों और अल्पसंख्यकों की जगह नहीं है. यहां तक कि ससंद पर भरोसा करने की हिदायत भी दी जा रही है.
पहली बात, किसी भी बड़े बदलाव की शुरूआत एक छोटे से कदम से ही होती है, ऐसा नहीं है कि एक कानून बना, कुछ कागज़ात साइन हुए और समाज बदल जाएगा, देश में हर कोई स्वस्थ और सुखी हो जाएगा. सवाल है पहला कदम बढ़ाने की. राइट टू इन्फ़ॉरमेशन या इलेक्शन कमिशन का अपने पैरों पर खड़ा होना इस बात का सुबूत है. संविधान में बेशक ऐसे कानून हैं जो भ्रष्टाचार की नकेल खींच सकते हैं पर एक छोटा सा छेद भी नाव को डुबाने के लिए काफ़ी होता है. उस छेद को ’लूप होल’ कहते हैं.
दूसरी बात, अमरीका हमारा दुश्मन है या चीन हम पर भारी हो रहा है मानने वाला तबका ये क्यूं भूल जाता है कि घर का भेदी लंका ढाए. जब तक हम खुद अपने बीच से अपनी ही जड़ें खोखली करने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर नहीं निकाल लेते तब तक किसी भी दुश्मन से लड़ने में हम नाकाम ही होंगे. हर शख़्स यही मानता है कि भ्रष्टाचार एक दीमक है पर इसके लिए हमें आपसी मतभेद को किनारे रखना होगा, दो अलग अलग सोच रखने वाले भाई अगर अपनी मां को मौत की कगार पर देखें तो पहला हाथ उसे अस्पताल ले जाने के लिए बढ़ना चाहिए नाकि ये तय करने के लिए कि पड़ोसी हमारे आंगन में पैर पसार रहा है.
तीसरी बात, लोगों के बीच जोश भरना सबसे आसान काम भी है और सबसे मुश्किल भी. नौकरी पेशा लोग जब अपने ऑफ़िस के बाद कंधे पर बैग लटकाए केंडलमार्च करते हैं, घर में बैठ कर टीवी पर सास-बहू सीरियल देखने वाली औरतें या फिर छात्र-छात्राएं कॉलेज कैंपस की जगह तिहाड़ जेल के सामने रात बिताते हैं तो इतना तो तय हो जाता है कि ये लड़ाई सबकी है. शहर के आस-पास बसे गांव से लोग जब खुद चल कर अन्ना को देखने आते हैं. बूढ़ी औरतें, मां-बाप अपने बच्चों को साथ लिए जब एक इन्सान में उम्मीद की किरन देखते हैं तो ये भी साफ़ होता है कि भ्रष्टाचार वाकई आम इंसान को चोट देता है. ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि जन लोकपाल के लिए हो रहे आंदोलन में शामिल सभी लोग इसकी पेचीदगियों को समझें, इनकी सीधी समझ तो इतना ही बताती है कि जब मैं किसी सरकारी दफ़्तर में जाऊं तो सौ रुपय चपरासी को और हज़ार रुपय अफ़सर को ना देने पड़ें. राजनितिक पार्टियां अगर ’राजनैतिक’ पार्टियां होतीं तो वो ज़रूर समझतीं कि भाषण सुनने के लिए लोगों को पैसा देकर बुलाना ज़रूरी नहीं होता.
चौथी बात, जैसे हर मुसलमान उग्रवादी नहीं होता वैसे ही हर ब्राहमण गोल पेट वाला खाऊ इन्सान नहीं होता. जब हम स्त्रियों, मुसलमानों या दलितों के लिए किसी भी तरह के पुर्वाग्रहों का विरोध करते हैं तो उच्चजाति के लिए दीवार क्यूं नहीं तोड़ सकते. कुर्सी पर बैठने वाला किसी क्षेत्र और जाति का नहीं होता, वो बस अपनी जेबें भरना जानता है यही उसका मज़हब है.
पांचवी बात, किसी भी बड़े आंदोलन में एक नेता ज़रूर होता है. जिसे देख कर आम जन समूह आगे बढ़ सके. अन्ना और उनके सहयोगी इस बात को बखूबी जानते हैं. लोगों के बीच कोई भी फ़ैसला अन्ना के नाम से ही जाना चाहिए वो इस बात की बारीकी को समझते हैं, यहां ’पहले मैं’ की होड़ नहीं है. इतिहास के पन्नों पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलेगा कि हर बड़े आन्दोलन के पीछे एक आवाज़ होती है जो उसे दिशा देती है. बिना आवाज़ के समूह का मतलब ही नहीं रह जाता.
ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार को खुद से मिटाने की ज़रूरत है तभी समाज से इसका खात्मा हो सकेगा लेकिन हम ये क्यूं भूल जाते हैं कि यहां आरटीआई के लिए काम करने वालों को गोली मारी जाती है, यहां अपनी ज़मीन के लिए लड़ने वाले किसानों की दिन-दहाड़े पिटाई होती है, यहां मंत्रियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनती हैं और आम इन्सान को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, पढ़ाई के लिए लोन मांगने पर बैंक मैनेजर को घूस खिलानी पड़ती है, यहां मिड-डे मील अफ़सर खा जाते हैं और सारी इमानदारी सड़कों के गढ्ढों में लुड़क जाती है. ऐसे में आप अकेले इमानदारी की मशाल कब तक जलाए रख सकते हैं. ज़रूरत है एक-जुट होने की नाकि एक दूसरे पर टूटने की.
किसी इन्सान की अच्छाई या बुरायी को कैसे आंका जाता है? उसके काम से, उसके पिछले कर्मों से या उसके सामाजिक जीवन की उप्लब्धियों से. रालेगांव सिद्धि की कामयाबी में अन्ना की लगन को लोग याद नहीं करना चाहते ना करें, 1990 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण पाने में भी गड़बड़ी देखते हैं तो भी ठीक है, उनके अनशनों के सबब आज तक 4 से 5 मंत्रियों को मंत्रीपद से हटाया जा चुका है वो भी लोग चाहें तो नकार सकते हैं. सूचना के अधिकार कानून में भी उनके योगदान को भुलाना चाहते हैं तो भुला दें. पर क्या मेग्सेसे पुरुस्कार पाने वाले, आरटीआई के मूवमेंट में अहम भूमिका निभाने वाले और टाटा स्टील में अपनी नौकरी छोड़ कर समाज के लिए काम करने वाले अरविन्द केजरीवाल को भी शक की नज़र से ही देखेंगे. या दिल्ली पुलिस में जान फूंकने वाली, सैंकड़ों पुरस्कार पाने वाली और हमेशा सही और सटीक बात कहने-करने वाली किरन बेदी को भी अगर शक्की निगाहों से देखेंगे तो बस एक ही बात कही जा सकती है. मेरी मां हमेशा कहती है ’जिसका खुद का इमान कमज़ोर होता है वो हर किसी पर शक करता है’.