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dill mera soz-e nihaa.n sey be....


dill mera soz-e nihaa.n sey be-mahaba jal gaya
Aatish-e khamosh ki manind goya jal gaya

dill main zouq-e vasl o yaad-e yaar tak baaqi nahi
Aag is ghar main lagi aisi k jo tha jal gaya

main adam sey bhi parey hoon warna ghafil barha
meri Aah-e Aatishee.n sey baal-e a'nqa jal gaya

arz kejeye johar-e andesha ki garmi kaha.n!
kuch khayyal aya tha wehshat ka k sehra jal gaya

dill nahi tujh ko dikhata warna daghoo.n ki bahar
as charaghaa.n ka kya karoo.n kya kaar-e farma jal gaya

main hoon aur afsurdagi ki Aazro Ghalib k dill
dekh kar tarz-e tapaak_e ahe'l duniya jal gaya

Naqsh far yadi hai kis...



Naqsh far yadi hai kis ki shokh'i tahrir ka
kaghazi hai pairahan her paikar e tasvir ka

jirahat tohfah almas armughan dagh e jigar hadiyah
mubarakbad Asad ghamkh var e ljan e dardmand aya

juz Qais aur koi nah aya bah ruekar
sahra magar bah tangi chashm e husud tha

kahte ho nah den ge ham dil agar para paya
dil kahan kin gum kije ham ne muddaa paya

dil mera soz e nihan se be mahaba jal gaya
atish e khamosh ke manind goya jal gaya

aa ke meri jaan mein qaraar nahin hai....


aa ke meri jaan mein qaraar nahin hai
taaqat-e-bedaad-e-intazaar nahin hai

dete hain jannat hayaat-e-dahar ke badale
nashshaa baa_andaazaa-e-khumaar nahin hai

giriyaa nikaale hai teri bazm se mujh ko
haaye! ki rone pe ikhtiyaar nahin hai

ham se abas hai gumaan-e-ranjish-e-khaatir
khaak mein ushshaq ke gubaar nahin hai

dil se uthaa lutf-e-jalvaa haye ma_ani
gair-e-gul aaiinaa-e-bahaar nahin hai

qatl kaa mere kiyaa hai ahad to baare
vaaye! agar ahad ustavaar nahin hai

tu ne qasam maikashi ki khaai hai ‘Ghalib’
teri qasam ka kuchh aitabaar nahin hai

Kab se hooN, kya bataaooN jahaan-e-KHaraab mein...



miltee hai KHoo-e-yaar se naar iltihaab meiN
kaafir hooN gar na miltee ho raahat ‘azaab meiN

kab se hooN, kya bataaooN jahaan-e-KHaraab meiN ?
shab haaye hijr ko bhee rakhooN gar hisaab meiN

taa fir na intezaar meiN neeNd aaye ‘umr bhar
aane ka ‘ahad kar gaye aaye jo KHwaab meiN

qaasid ke aate-aate KHat ik aur likh rakhooN
maiN jaanta hooN jo woh likhenge jawaab meiN

mujh tak kab unkee bazm meiN aata tha daur-e-jaam
saaqee ne kuchch mila na diya ho sharaab meiN

jo munkir-e-wafa ho fareb us pe kya chale ?
kyooN badGHumaaN hooN dost se dushman ke baab meiN ?

maiN muztarib hooN wasl meiN KHauf-e-raqeeb se
Daala hai tumko weham ne kis pech-o-taab meiN

mai aur haz’z-e-wasl, KHudaa_saaz baat hai
jaaN nazr denee bhool gaya iztiraab meiN

hai tevaree chaDee huee andar naqaab ke
hai ik shikan paDee huee tarf-e-naqaab meiN

laakhauN lagaav, ik churaana nigaah ka
laakhauN banaav, ik bigaaDna itaab meiN

woh naala_dil meiN KHas ke baraabar jagah na paaye
jis naale se shigaaf paDe aaftaab meiN

woh sehar muddaa talbee meiN na kaam aaye
jis sehar se safina ravaaN ho saraab meiN

‘GHalib’ chutee sharaab, par ab bhee kabhee-kabhee
peeta hooN roz-e-abr -o- shab-e-maahtaab meiN

केसे जिए


बददुआएं  इतनी लिए कब तक जिए , केसे जिए
ऐ दोस्त दम निकल जाये जो मेरा ,आज अचरज ना करना |

साथियों के साथ से  जिंदा रहा हू आज तक
साथियों की  घात से मर जाऊ अचरज ना करना |

एक भी दुश्मन नहीं है दूर तक इस जिन्दगी में
स्वजनों की हाय से बुझ जाऊ अचरज ना करना |

मेरे चारो और एक आडम्बर लपेटा जा रहा है
हार कर इस कफन को में ओढु तो अचरज न करना |

जिनके कंधो का सहारा था हमारी सोच में
सर उन्ही पैरो तले कुचलाये तो अचरज न करना |

साँस साँस आती है रफ्ता रफ्ता वक्त कट जायेगा ही
डोर कब टूटे रुके कब साँस    अचरज न करना |

गलती थी मेरी ही  अपना अक्स आईने  में देखा
खुद से नफरत जिन्दगी भर की  ये  अचरज न करना |

दर्द में दिल के ज़ख्म गाते रहे




फिर हाज़िर हूँ आप सबके सामने एक और छोटी सी ग़ज़ल लेकर .... बहर वही ''फायलातुन, फायलातुन, फायलुन' ...

दर्द में दिल के ज़ख्म गाते रहे ।
इस तरह वो हर सितम ढाते रहे ॥

राह में तो मुश्किलें आती रहीं ।

साथ जो थे छोड़कर जाते रहे ॥

याद जो आये थे पीछे छोड़कर ।
उस को अब हर मोड़पर पाते रहे ॥

वो किया न फिर यकीं हम पर कभी ।
अपने सर की हम कसम खाते रहे ॥

‘सैल’ जितनी दूर उनसे हो चले ।

याद उतनी वो हमें आते रहे ॥

क्या करें !





हर पल यही उलझन है कि क्या करें .... फिरते रहे जिंदगीभर यूँ ही उलझनों की अंधी गलियों में ... पर कुछ उलझन ऐसी भी होती हैं जो खूबसूरत होती हैं ... और कभी जी करता है कि फिर ये उलझन कभी न सुलझे ...

क्या करें उनसे शिकायत, क्या करें ।
जो है कातिल, वो अदालत, क्या करें ॥
हमने पूछा चाहिए क्या ये बता ।
मांग ली उसने मुहब्बत, क्या करें ॥
राह तकते हो गए आखिर फना ।
आ गया रोज़े क़यामत, क्या करें ॥
है बड़ी कातिल अदा, उनकी कसम ।
मार डालेगी शरारत, क्या करें ॥
वो सदा में सर्द मेहरी, क्या कहूँ ।
उफ़ नज़र की ये हरारत, क्या करें ॥
ज़ख्म सारे ज़र्द दिल में हैं रखे ।
जैसे हुज्जते इनायत, क्या करें ॥
‘सैल’ मैंने देखकर बेहिस् जहां ।

छोड़ दी है अब शराफत, क्या करें ॥

उजले कपड़ो में ढका है तन देखो



भारत में तकनिकी विकास के साथ साथ नैतिक और सामाजिक अधःपतन एक विकराल रूप धारण कर चूका है । आदमी जितना शिक्षित होते जा रहा है उसमें उतना ही नैतिक गिरावट परिलक्षित हो रही है । पहले अनपढ़ लोगों में भी व्यवहार कुशलता होती थी, पर आज के ज़माने में उच्च शिक्षित लोगों में भी अहंकार और कुंठा बहुतायत में देखने को मिल रहा है । वहीँ बृहत्तर समाज में भ्रष्टाचार एक भयंकर समस्या के रूप में उभरा है । खासकर राजनैतिक क्षेत्र में अब ईमानदारी लगभग लुप्त हो चुकी है । जिस खादी के दम पर गांधीजी स्वाधीनता का संग्राम लढे थे, वही खादी आज भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चूका है । सच्चे समाज सेवक भले ही अनशन करते हुए मर जाएँ पर इन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को कोई फर्क नहीं पड़ता है । जिस जनता के वोट से वो सत्ता में आये हुए हैं उसी जनता को लूटने में व्यस्त हैं । इन्ही विचारों से सजी यह ग़ज़ल पेश है आप सबके लिए ।


उजले कपड़ो में ढका है तन देखो ।
विष का प्याला भी भरा है मन देखो ॥

कितना शिक्षित हो गया है हर कोई ।
बस्ती बस्ती बन गया है वन देखो ॥

जिसको पाला था जिगर के टुकड़ों से ।
उसने है मुझपर उठाया फन देखो ॥

हाथों को जोड़े खड़े हैं नेतागण ।
खादी में लिपटा है काला धन देखो ॥

भ्रष्टाचारी ना मिटेंगे राष्ट्र से ।
अनशन करते मिट गया जीवन देखो ॥

ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?



ये चित्र मेरा अपना लिया हुआ है !

आज फिर आप सबके लिए एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने "मुफायलुन् मुफायलुन्" बहर में कहने की कोशिश की है ... बताइए ज़रूर कि आपको कैसी लगी मेरी ये कोशिश ...


ये जिंदगी, पता है क्या ?
न खत्म हो, सज़ा है क्या ?

है आँख क्यूँ भरी भरी ?
किसी ने कुछ कहा है क्या ?

दिखाते हो हरेक को ।
ज़ख़्म अभी हरा है क्या ?

नसीब फिर जला मेरा ।
कि राख में रखा है क्या ?


है रंग फिर उड़ा उड़ा ।
मेरी खबर सुना है क्या ?

सज़ा तो मैंने काट ली ।
बता दे अब खता है क्या ॥

रगड़ लो हाथ लाख तुम ।
लिखा है जो मिटा है क्या ?

समझ गया पढ़े बिना ।
कि खत में वो लिखा है क्या ॥

जो टूटे वो जुड़े नहीं ।
ज़ख़्म कभी भरा है क्या ?


खुदा है वो पता उसे ।
कि दिल की अब रज़ा है क्या ॥

ज़रा सा गम मिलाया है ।
ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

समझ सका न “सैल” ये ।अजीब सिलसिला है क्या ॥

ग़ज़ल गायकी के सम्राट 'जगजीत सिंह' को विशेष श्रद्धॉंजलि


ग़ज़ल क्‍या होती है, यह समझ भी नहीं थी जब पहली बार जगजीत सिंह की मंत्रमुग्‍ध कर देने वाली आवाज़ सुनी थी। फिर सुनता रहा, सुनता रहा और जब ग़ज़ल कहना आरंभ किया, दिल ने कहा एक ग़ज़ल ऐसी कहनी है जिसे जगजीत सिंह अपनी आवाज़ से नवाज़ना स्‍वीकार करें। उस आवाज़ लायक कुछ न कह सका और एकाएक आवाज़ से जग जीतने वाले जगजीत ने यह जग छोड़ दिया। ब्रेन हैमरेज से अस्‍पताल में भर्ती थे लेकिन लगता था अभी कोई कारण नहीं है जगजीत के जाने का, वो और जियेंगे और फिर कुछ और सुनने को मिलेगा। बस यहीं आदमी और उपर वाले के फ़ैसले का अंतर होता है शायद। उसने वही किया जो उसे ठीक लगा। कल दिन भर जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल लौट-लौट कर ज़ेह्न में आ रही थी। बहुत तलाशा नेट पर, नहीं मिली। रुका नहीं गया और एक ग़ज़ल हुई।
आज जगजीत हमारे बीच देह-स्‍वरूप नहीं लेकिन स्‍वर-स्‍वरूप जिंदा हैं और उनके इस स्‍वर स्‍वरूप को समर्पित है यह ग़ज़ल।

आज फिर तू, कुछ नया दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी

अब मुझे रब से मिला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

नस्‍ल-ओ-मज्‍़हब के बखेड़ों से अलग मैं रह सकूँ

एक ऐसा आसरा दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

बंधनों के इस कफ़स में जी चुका इक उम्र मैं

इस से आज़ादी दिला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

जन्‍म से सोया हुआ हूँ, ख्‍़वाब सारे जी चुका

नींद से मुझको उठा दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

छोड़कर मिट्टी चला हूँ, पूछता हूँ बस यही

क्‍यूँ मिली मिट्टी, बता दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

साथ जितना था हमारा, कट गया, जैसा कटा

आज ख़ुश हो कर, विदा दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

सोचना क्‍या वक्‍ते रुख्‍़सत, क्‍या मिला, क्‍या खो गया

भू जा, सब कुछ भुला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

जा रहा हूँ, छोड़कर रिश्‍ते कई ऑंसू भरे

दे सके तो हौसला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

उम्र भर भटका मगर, मंजि़ल न 'राही' को मिली

आज मंजि़ल का पता दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।

ला इल्मी का पाठ पढाएँ अन पढ़ मुल्ला योगी


ला इल्मी का पाठ पढाएँ, अन पढ़ मुल्ला योगी,
दुःख दर्दों की दवा बताएँ खुद में बैठे रोगी.

तन्त्र मन्त्र की दुन्या झूठी, बकता भविश्य अयोगी,
अपने आप में चिंतन मंथन सब को है उपयोगी.

आँखें खोलें, निंद्रा तोडें, नेता के सहयोगी,
राम राज के सपन दिखाएँ सत्ता के यह भोगी.

बस ट्रकों में भर भर के ये भेड़ बकरियां आईं,
ज़िदाबाद का शोर मचाती नेता के सहयोगी.

पूतों फलती, दूध नहाती रनिवास में रानी,
अँधा रजा मुकुट संभाले, मारे मौज नियोगी.

"मुकिर' को दो देश निकला, चाहे सूली फांसी,
दामे, दरमे,क़दमे, सुखने, चर्चा उसकी होगी.
*****
दामे,दरमे,क़दमे,सुखने=हर अवसर पर

स्वार्थ की अंधी गुफाओं तक रहे .



स्वार्थ की अंधी गुफाओं तक रहे .
लोग बस अपनी व्यथाओं तक रहे

काम संकट में नहीं आया कोई,
मित्र भी शुभकामनाओं तक रहे.

क्षुब्ध था मन देवताओं से मगर
स्वर हमारे प्रार्थनाओं तक रहे.

लोक को उन साधुओं से क्या मिला,
जो हमेशा कंदराओं तक रहे.

सामने ज्वालामुखी थे किन्तु हम
इन्द्रधनुषी कल्पनाओं तक रहे.