परस्पर आदर-भाव से देखना


परस्पर के दोषों को देखकर आलोचना करना अनुचित है । सभी मनुष्यों में कमजोरियाँ है । भूल करना भी मनुष्य का स्वभाव है प्रत्येक व्यक्ति आपके घर का सदस्य होने के कारण उसका भी उस घर पर पूरा अधिकार है । यदि रुचि में साम्य न हो अथवा मत विभिन्नता हो तो वह निरादर का पात्र नहीं है । यह संभव नहीं है कि आपकी रुचि सबे मिल सके ।
कड़वी बात जहर से भी बुरी होती है । यदि आपकी वाणी मधुर नहीं है, तो जीवन में कटुता बढ़ती ही चली जाएगी । घर के किसी सदस्य की तीखी आलोचना भ्रांत धारणा, चाहे वह भ्रांत न होकर सत्य ही हो तो भी, दूसरे पर तीखी चोट कर सकती है और तब वाणी का वह घाव बड़ी कठिनाई से भर सकता है । मनुष्य तलवार के घव से नहीं घबड़ाता, वह उसे हँसते-हँसते सह लेता है, परन्तु वाणी का घाव कलेजे में गहरा होता जाता है और वह जीवनभर भरने में नहीं आता ।