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तू नाहक ही परेशान
थी चाँद के
गिरने से.. खुद को
बेवजह कसूरवार
ठहरा डाला..
वो ख़ता तेरी नही थी
जब गुरूर टूट ता है तो
अच्छे अच्छे गिर
जाते है..
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इक रोज़ बारिश के
मौसम में तुम..
जा खड़ी हुई थी
इक पेड़ के नीचे...
बड़ी देर तलक एक डाल
झुकी रही थी
तुम पर..
कभी फिर जाओ वही
तो देखना..
उस डाल पर बूंदे
अब भी जमी हुई है...
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