श्रम और समय के समन्वय को नियमितता कहा गया है । समय ही जीवन है . उसका एक-एक पल हीरे-मोतियों से तोलने योग्य है । एक क्षण भी बेकार नहीं गँवाना चाहिये । ईश्वर प्रदत्त दिव्य-संपदा समय ही है । उसके मूल्य पर हर स्तर की विभूतियाँ एवं सफलताएँ प्राप्त हो सकती है । समय गँवाना अर्थात् जीवन के ऐश्वर्य एवं आनंद को बरबाद करना । परिवार की परंपरा में इस आदर्श का सावधानी के साथ समावेश होना चाहिए कि कोई भी व्यर्थ समय न गँवाए । इसे श्रम के साथ जोड़े रहें । श्रम से जी चुराना, व्यर्थ के कामों में समय गुजारना, परिश्रम में असम्मान अनुभव करना, ऐसे दुर्गुण है जिनके रहते पिछड़ेपन से, दरिद्रता से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है । शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रसाद यही दो सबसे बड़े शत्रु है, जिन्हें प्रश्रय देने वाला दुर्भाग्यग्रस्त रहता और दुर्गति के गर्त में गिरता है ।
श्रमशीलता मनुष्य की उच्चस्तरीय सत्प्रवृत्ति है । काम को ईश्वर की पूजा माना जाए । श्रम में सम्मान अनुबव किया जाए । श्रम में शरीर घिसता नही, वरन परिपुष्ट होता है । अपने कार्यों का स्तर एवं स्वरुप प्रशंसनीय बनाए रहने में मनुष्य की प्रतिष्ठा है । स्फूर्तिवान मनुष्य दीर्घजीवी होते है । परिश्रमी के पास दरिद्रता नहीं फटकती और न दुर्गुणों को अपनाने, दुर्व्यसनों से ग्रसित होने का अवसर मिलता है । समृद्घि, प्रगति और सफलता की सिद्घियाँ साधना से ही उपलब्ध होती है । जो समय की बरबादी को बचा सके और उसे अभीष्ट दिशा में क्रमबद्घ रुप से लगाए रहे, सफलताओं ने उन्ही का चरण चूमा है । आलसी और प्रमादी, कामचोर, हरामखोर और समय गँवाने वाले ऐसे अभागे है जो अनपे पैरों आप कुल्हाड़ी मारते और आत्मप्रताड़ना, लोकभर्त्सना का त्रास सहते है । भविष्य तो उनका अंधकारमय रहता ही है ।
परिवार की परंपरा यह रहनी चाहिये कि हर सदस्य अपनी दिनचर्या बनाए । परिश्रम में जुटा रहे । बीच-बीच में जितना विश्राम नितांत आवश्यक है, उतना ही ले । मंदगति से काम न करें । प्रमादवश कामों को अधूरा न छोड़े । समाप्त करने या बीच में रोकने के समय वस्तुओं को बिखरा न पड़ा रहने दें । जो भी काम हाथ में हो, उसे पूरे मनोयोग एवं परिश्रम के साथ, प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर संपन्न करें । श्रमशील रहने और समय का सदुपयोग करने का महत्व जिसने जान लिया और दिनचर्या बनाकर योजनाबद्घ रुप से काम करने का अभ्यास कर लिया, समझना चाहिये कि उज्जवल भविष्य का निर्माण करने की कुंजी उसके हाथ आ गई ।
व्यस्त रहने का स्वभाव बनाना ही चाहिए । हर काम समय पर और क्रमबद्घ रुप में होना चाहिए । इस आवश्यकता को परिवार के सभी लोग अनुभव करें । उसके लिये सफल मनुष्यों की दिनचर्या का समय-समय पर उल्लेख करते रहना चाहिए । हर काम का समय निर्धारित हो । सभी अपना काम नियत समय पर नियमित रुप से करें । विशिष्ट परिस्थिति में, अनिवार्य कारण होने पर ही व्यतिक्रम के अपवाद होने चाहिए । आत्मानुशासन का अभ्यास इसी प्रकार होता है कि शरीर को श्रम में और मन को उत्कृष्ट स्तर का बनाने के लिये उत्कृष्ट चिंतन में लगाए रखा जाए । जिसने समय का मूल्य समझा है, उसी ने जीवन लाभ लिया है
जो परिश्रमी रहा है उसी को व्यक्तित्व निखारने और सफलताएँ पाने का श्रेय मिला है ।
महिलाओं के समय की बरबादी इसीलिये होती है कि उनसे संबंधत काम दूसरो केसमय पर न आने के कारण अस्त-व्यस्त पड़े रहते है । उनका तीन-चौथाई समय इसी में नष्ट होता है । अन्यथा वे गृह कार्यों को कुछ ही घंटों में निबटा कर अन्य उपयोगी कामों में लग सकती है ।
श्रमशीलता मनुष्य की उच्चस्तरीय सत्प्रवृत्ति है । काम को ईश्वर की पूजा माना जाए । श्रम में सम्मान अनुबव किया जाए । श्रम में शरीर घिसता नही, वरन परिपुष्ट होता है । अपने कार्यों का स्तर एवं स्वरुप प्रशंसनीय बनाए रहने में मनुष्य की प्रतिष्ठा है । स्फूर्तिवान मनुष्य दीर्घजीवी होते है । परिश्रमी के पास दरिद्रता नहीं फटकती और न दुर्गुणों को अपनाने, दुर्व्यसनों से ग्रसित होने का अवसर मिलता है । समृद्घि, प्रगति और सफलता की सिद्घियाँ साधना से ही उपलब्ध होती है । जो समय की बरबादी को बचा सके और उसे अभीष्ट दिशा में क्रमबद्घ रुप से लगाए रहे, सफलताओं ने उन्ही का चरण चूमा है । आलसी और प्रमादी, कामचोर, हरामखोर और समय गँवाने वाले ऐसे अभागे है जो अनपे पैरों आप कुल्हाड़ी मारते और आत्मप्रताड़ना, लोकभर्त्सना का त्रास सहते है । भविष्य तो उनका अंधकारमय रहता ही है ।
परिवार की परंपरा यह रहनी चाहिये कि हर सदस्य अपनी दिनचर्या बनाए । परिश्रम में जुटा रहे । बीच-बीच में जितना विश्राम नितांत आवश्यक है, उतना ही ले । मंदगति से काम न करें । प्रमादवश कामों को अधूरा न छोड़े । समाप्त करने या बीच में रोकने के समय वस्तुओं को बिखरा न पड़ा रहने दें । जो भी काम हाथ में हो, उसे पूरे मनोयोग एवं परिश्रम के साथ, प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर संपन्न करें । श्रमशील रहने और समय का सदुपयोग करने का महत्व जिसने जान लिया और दिनचर्या बनाकर योजनाबद्घ रुप से काम करने का अभ्यास कर लिया, समझना चाहिये कि उज्जवल भविष्य का निर्माण करने की कुंजी उसके हाथ आ गई ।
व्यस्त रहने का स्वभाव बनाना ही चाहिए । हर काम समय पर और क्रमबद्घ रुप में होना चाहिए । इस आवश्यकता को परिवार के सभी लोग अनुभव करें । उसके लिये सफल मनुष्यों की दिनचर्या का समय-समय पर उल्लेख करते रहना चाहिए । हर काम का समय निर्धारित हो । सभी अपना काम नियत समय पर नियमित रुप से करें । विशिष्ट परिस्थिति में, अनिवार्य कारण होने पर ही व्यतिक्रम के अपवाद होने चाहिए । आत्मानुशासन का अभ्यास इसी प्रकार होता है कि शरीर को श्रम में और मन को उत्कृष्ट स्तर का बनाने के लिये उत्कृष्ट चिंतन में लगाए रखा जाए । जिसने समय का मूल्य समझा है, उसी ने जीवन लाभ लिया है
जो परिश्रमी रहा है उसी को व्यक्तित्व निखारने और सफलताएँ पाने का श्रेय मिला है ।
महिलाओं के समय की बरबादी इसीलिये होती है कि उनसे संबंधत काम दूसरो केसमय पर न आने के कारण अस्त-व्यस्त पड़े रहते है । उनका तीन-चौथाई समय इसी में नष्ट होता है । अन्यथा वे गृह कार्यों को कुछ ही घंटों में निबटा कर अन्य उपयोगी कामों में लग सकती है ।