परिवार निर्माण में प्रधानतया सदविचारों और सदगुणों का प्रयोग करना पड़ता है । यह प्रशिक्षण मात्र वाणी से नहीं हो सकता है, शिक्षक को अनिवार्यतः अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होता है । गीली मिट्टी से सुन्दर खिलौने ढलते जिन्होंने देखे है, वे जानते है कि यह चमत्कार वस्तुतः उस साँचे का है जिसमें खिलौने की छवि पहले से ही साफ सुथरे ढंग से उभरी हुई है । इसमें कमी रहेगी, तो जो बनेगा वह भी काना-कुबड़ा ही होगा । व्यक्ति-निर्माण में कभी भी मात्र बौद्घिक प्रशिक्षण कारगर सिद्घ नहीं हुआ है । प्रभावी प्रवचनों और प्रदर्शनों से यदि व्यक्तित्वों को ढालना संभव रहा होता, तो यह काम कब का हो गया होता और इसे समर्थ लोगों ने कब का कर लिया होता । ज्योति-से-ज्योति जलती है और तेजस्वी व्यक्तियों के प्रभाव से नए व्यक्तित्व ढलते बदलते है । अस्तु परिवार के जिन मूर्धन्य लोगों को अपने क्षेत्र में नव सृजन करना है, उन्हें वह सब कुछ पहले अपने स्वभाव में उतारना होगा, जो उन्हें परिजनो से कराना है । समझाने भर से काम चल जाता, तो कितना अच्छा होता, तब समझ की तूती बोलती और चरित्रनिष्ठा के द्घार खटखटाने की आवश्यकता न पड़ती, किन्तु विवशता का क्या किया जाए । परिवार मे उत्कृष्टता का वातावरण बनाना इस दृष्टि से थोड़ा कठिन भी है, पर उसकी तुलना में जो लाभ मिलता है, उसे देखते हुए कठिनाई अथवा परिश्रम रत्तीभर भी नहीं है ।
उत्तराधिकारियों के लिये धन-वैभव छोड़ सकना उतना सुखद नहीं हो सकता, जितना उन्हें सुसंस्कारी बना देना । यह संपति ऐसी है, जो उनको सदा गौरवान्वित रखेगी और पग-पग पर श्रेय-सहयोग से लाभान्वित करेगी । सफलताएँ किसी भी श्रेत्र की क्यों न हो, उन्हें व्यक्तित्व संपन्न लोग ही प्राप्त करते है .
दूसरों की आदतें बदलने के लिये अपनी आदतें बदलनी होती है । दूसरों का स्वभाव सुधारने के लिये पहले अपना सुधार करना होता है । उपदेशों से जानकारी भर दी जा सकती है । व्यक्ति को सुधारना उन्हीं के लिये संभव है, जो अपने आपको आदर्श के रुप में विकसित कर सकते है । शिक्षा तो सहज ही सुनी जा सकती है । पर प्रेरणा तभी मिलती है, जब अनुकरण के लिये प्रभावशाली आदर्श सामने हो । जर्योतिवान दीपक ही दूसरे नयों को जलाता है । साँचे के अनुरुप ही खिलौने या पुर्जे ढलते है । दूसरे को कुछ सिखाना-बताना भर हो तो बात दूसरी है, अन्यथा ढालने का लक्ष्य सामने हो तो सर्वप्रथम स्वयं ढलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं ।
परिवार को सुसंस्कारी बनाने के प्रयास में उसके लिये अग्रणी लोगों को सर्वप्रथम अपनी ही गढ़ाई करनी पड़ती है । इस संदर्भ में जो जितनी सफलता प्राप्त कर लेंगे, उन्हें परिवार निर्माण में उसी अनुपात में सफलता मिलेगी । जो गुण सहचरों में उत्पन्न करने है, वे सर्वप्रथम अपने में उत्पन्न करने होंगे । अनुकरण प्रिय मनुष्य प्राणी जो कुछ समझता है, उसमे तो शिक्षको के परिश्रम का फल भी कहा जा सकता है, पर जो बनता है, उसमें प्रायः उन्हीं के चरित्रों का योगदान होता है, जो साथ रहते और प्रभावित करते है । कुसंग और सत्संग के परिणामों से सभी परिचित है । इनमें शिक्षण-परामर्श नहीं, वह प्रभाव काम करता है, जो इस सत्य को समझेंगे और परिवार निर्माण के लिये वस्तुतः इच्छुक होंगे, उन्हें यह प्रयास आत्मनिर्माण से आरम्भ करना होगा, ताकि ढलाई की जटिल प्रकि्या को सरल एवं संभव बनाया जा सके ।
उत्तराधिकारियों के लिये धन-वैभव छोड़ सकना उतना सुखद नहीं हो सकता, जितना उन्हें सुसंस्कारी बना देना । यह संपति ऐसी है, जो उनको सदा गौरवान्वित रखेगी और पग-पग पर श्रेय-सहयोग से लाभान्वित करेगी । सफलताएँ किसी भी श्रेत्र की क्यों न हो, उन्हें व्यक्तित्व संपन्न लोग ही प्राप्त करते है .
दूसरों की आदतें बदलने के लिये अपनी आदतें बदलनी होती है । दूसरों का स्वभाव सुधारने के लिये पहले अपना सुधार करना होता है । उपदेशों से जानकारी भर दी जा सकती है । व्यक्ति को सुधारना उन्हीं के लिये संभव है, जो अपने आपको आदर्श के रुप में विकसित कर सकते है । शिक्षा तो सहज ही सुनी जा सकती है । पर प्रेरणा तभी मिलती है, जब अनुकरण के लिये प्रभावशाली आदर्श सामने हो । जर्योतिवान दीपक ही दूसरे नयों को जलाता है । साँचे के अनुरुप ही खिलौने या पुर्जे ढलते है । दूसरे को कुछ सिखाना-बताना भर हो तो बात दूसरी है, अन्यथा ढालने का लक्ष्य सामने हो तो सर्वप्रथम स्वयं ढलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं ।
परिवार को सुसंस्कारी बनाने के प्रयास में उसके लिये अग्रणी लोगों को सर्वप्रथम अपनी ही गढ़ाई करनी पड़ती है । इस संदर्भ में जो जितनी सफलता प्राप्त कर लेंगे, उन्हें परिवार निर्माण में उसी अनुपात में सफलता मिलेगी । जो गुण सहचरों में उत्पन्न करने है, वे सर्वप्रथम अपने में उत्पन्न करने होंगे । अनुकरण प्रिय मनुष्य प्राणी जो कुछ समझता है, उसमे तो शिक्षको के परिश्रम का फल भी कहा जा सकता है, पर जो बनता है, उसमें प्रायः उन्हीं के चरित्रों का योगदान होता है, जो साथ रहते और प्रभावित करते है । कुसंग और सत्संग के परिणामों से सभी परिचित है । इनमें शिक्षण-परामर्श नहीं, वह प्रभाव काम करता है, जो इस सत्य को समझेंगे और परिवार निर्माण के लिये वस्तुतः इच्छुक होंगे, उन्हें यह प्रयास आत्मनिर्माण से आरम्भ करना होगा, ताकि ढलाई की जटिल प्रकि्या को सरल एवं संभव बनाया जा सके ।