दो क्षणिकाए - गाँधी और ईद...













तमाम गवाहो ओर
सबूतो के
मद्देनज़र और लगे रहो
मुन्नाभाई की लोकप्रियता
को देखते हुए..
समाज के हर वर्ग में
गाँधिगिरी के सफलता
पूर्वक प्रचलन
होने से ये अदालत
इस नतीज़े पर
पहुँचती है.. की गाँधी नामक
विचार अभी मरा नही है..
केवल देह मात्र
को ख़त्म करने से..
विचार ख़त्म नही
होता.. गाँधी एक विचार है..
जो अभी भी
ज़िंदा है... इसलिए ये अदालत..
मुज़रिम
नाथुराम गोडसे को बा-इज़्ज़त बरी करती है ...


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कितनी रातो को बाँध के रखा
हिज्र की गाँठे खुल रही है..
वो शोख मखमली.. परी के जैसी
अपनी छत पर उतर रही है..

आशिक़ का ईमान ना कोई..
उसका क्या मज़हब होता है..
मुझको अपना चाँद मिला है..
तुमको अपनी ईद मुबारक..

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