सुबह की लालीमा, छाई है मुझ पर
पर ढल गयी है रात,
ये कह नही सकता
होंठ सील दिए याद मिटा दी
पर भूल गया हर बात,
ये कह नही सकता
आँसू तो रुक गये दिल हुआ पत्थर
पर भूल गया जज़्बात
ये कह नही सकता
हाथ मेरे तो अब भी खुले है
पर मिल जाए कोई साथ
ये कह नही सकता
चारदीवारी बना दी, दिल के चारो ओर
पर ना हो कोई वारदात
ये कह नही सकता
सब अपने से लगते, इस भीड़ में सारे
लगाके कौन बैठा घात
ये कह नही सकता
मायूस सी कलम देखती मुझे
भर जाए फिर दवात
ये कह नही सकता
लिखना तो बहुत है इस मंच पे आकर
पर क्या है मेरी औकात
ये कह नही सकता....
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