मुझसे ना पूछिए

मुझसे ना पूछिए मेरी बरबादियों का जिक्र
मै अपनी वफाओ की सजा काट रहा हूँ


जो दर्द है उसको दबाये रक्खा है दिल में
जो है सुकून सब में उसे बाँट रहा हूँ


अब क्या कंहू की वो ही मुझे जानता नहीं
हर लम्हा जिंदगी में जिसके साथ रहा हूँ


कोई मुझे सुबह की तरह क्यूं करे सलाम
मै सदियों छत पे पसरी हुई रात रहा हूँ


जो हो सकी ना पूरी अधूरी ही रह गई
दुनिया की निगाहों में वही बात रहा हूँ


तनहाइयों में बैठ कर गुजरे हुए कल से
मै जिंदगी और मौत के पल छाँट रहा हूँ ....!